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ॐ नमः शिवाय

🕉️ Shaiva / Vedic·📿 108× जप·🕐 सूर्योदय और सूर्यास्त (संध्याकाल) / सोमवार का प्रातःकाल विशेष रूप से प्रभावशाली·🎵 ऑडियो सहित·📜 Shri Rudram (Yajurveda, Taittiriya Samhita)

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अर्थ

ॐ नमः शिवाय भगवान शिव का पंचाक्षर मंत्र है — पाँच पावन अक्षरों वाला। यह शिव को नमन है, उस शुभ, सर्वव्यापी चेतना को जो हमारा अपना गहनतम स्वरूप है। इसका जप मन को शांति देता है, भय हरता है और अंततः मोक्ष की ओर ले जाता है।

उत्पत्ति और कथा

Shri Rudram (Yajurveda, Taittiriya Samhita) · Vedic Rishis · 1200-1000 BCE

न-म-शि-वा-य ये पाँच पावन अक्षर श्री रुद्रम के ठीक मध्य में आते हैं — यजुर्वेद में पाया गया शिव का सबसे प्राचीन स्तोत्र। रुद्रम के हृदय में इनका यह स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यह शिव-उपासना का मूल सार है। बाद में आदि शंकराचार्य ने पंचाक्षर स्तोत्रम् की रचना की, जिसमें प्रत्येक अक्षर को एक तत्त्व, एक चक्र और शिव के पाँच ब्रह्मांडीय कर्मों में से एक से जोड़ा गया।

शास्त्रों में वर्णित

शिव पुराण में एक शिकारी अनजाने ही बिल्व वृक्ष पर बैठा सारी रात अपने बाण गिनते हुए 'नमः शिवाय' जपता रहा। उसे ज्ञात न था कि नीचे एक शिवलिंग है, और जो बिल्व पत्र वह अनजाने गिराता रहा वे अर्पण बन गए। प्रातः होते-होते, जीवन भर के पापों के बावजूद, भगवान शिव प्रकट हुए और उसे मोक्ष प्रदान किया। यह कथा बताती है कि इस मंत्र का अनजाने में किया गया जप भी आत्मा को पवित्र कर देता है।

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मंत्र

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नमः शिवाय

Om Namah Shivaya

अर्थ:मैं शिव को नमन करता हूँ — वह शुभ, सर्वव्यापी दिव्य चेतना जो मेरा अपना गहनतम स्वरूप है।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

🔊Omआदिनाद — स्वयं ब्रह्म का स्पंदन
नमः🔊Namahनमस्कार / मैं नमन करता हूँ / मैं समर्पण करता हूँ — 'नम्' धातु से (झुकना)
शिवाय🔊Shivayaशिव को / शिव के लिए / शिव के प्रति — चतुर्थी विभक्ति; शिव = मंगलमय जो समस्त अस्तित्व में व्याप्त हैं
न (Na)🔊Naपृथ्वी तत्त्व, मूलाधार चक्र, शिव का तिरोभाव (आवरण) कर्म
म (Ma)🔊Maजल तत्त्व, स्वाधिष्ठान चक्र, शिव का सृष्टि कर्म
शि (Shi)🔊Shiअग्नि तत्त्व, मणिपूर चक्र, स्वयं शिव, संहार कर्म
व (Va)🔊Vaवायु तत्त्व, अनाहत चक्र, शिव की प्रकट करने वाली कृपा, स्थिति कर्म
य (Ya)🔊Yaआकाश तत्त्व, विशुद्ध चक्र, जीवात्मा (जीव), अनुग्रह कर्म

ॐ नमः शिवाय पाठ के लाभ

पंचतत्त्वों की शुद्धि — मंत्र का प्रत्येक अक्षर शरीर के भीतर अपने संबंधित तत्त्व — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश — को शुद्ध करता है। यह स्थूल और सूक्ष्म दोनों स्तर की शुद्धि एक साथ गहरी समरसता उत्पन्न करती है।

चक्रों का जागरण — यह मंत्र ऊर्जा को मूलाधार से विशुद्धि तक पाँच निचले चक्रों में ऊपर की ओर ले जाता है, और ॐ उसे आज्ञा एवं सहस्रार तक पहुँचाता है। नियमित जप से समूचा चक्र-तंत्र धीरे-धीरे खुलता और संतुलित होता है।

आंतरिक शांति व स्पष्टता — मंत्र की लय स्वाभाविक रूप से श्वास के साथ मिल जाती है और मन के कोलाहल को शांत करती है। कुछ सप्ताह के नित्य जप से चिंता बहुत घट जाती है और मानसिक स्पष्टता बढ़ती है।

भय का नाश — शिव मृत्यु और काल के स्वामी हैं। उनके नाम का जप दिव्य से ऐसा घनिष्ठ संबंध बनाता है जो भय को — मृत्यु के गहनतम भय तक को — भक्ति और विश्वास में बदल देता है।

आरोग्य व रक्षा — शारीरिक और भावनात्मक दोनों प्रकार के उपचार के लिए यह सर्वत्र निर्दिष्ट है। मंत्र साधक के चारों ओर शिव की रक्षक ऊर्जा का एक क्षेत्र रच देता है।

मोक्ष — सबसे गहन प्रयोजन। निरंतर साधना से भक्त धीरे-धीरे यह पहचान लेता है कि जिन शिव को वह नमन कर रहा है वे उससे भिन्न नहीं। यही पहचान — शिवोऽहम्: मैं ही शिव हूँ — मोक्ष है।

ॐ नमः शिवाय जप विधि

जप संख्या108बार
उत्तम समयसूर्योदय और सूर्यास्त (संध्याकाल) / सोमवार का प्रातःकाल विशेष रूप से प्रभावशाली
दिशाEast or North

रीढ़ सीधी रखकर पूर्व (उगते प्रकाश की दिशा) या उत्तर (कैलास की दिशा) की ओर मुख करके बैठें। रुद्राक्ष की माला लें — 108 बार जप, एक मनके पर एक बार। आरंभ वाचिक जप (स्वर में) से करें, फिर उपांशु (फुसफुसाहट) और फिर मानसिक (मौन मानसिक) जप की ओर बढ़ें। श्वास के साथ मिलाएँ: श्वास भरते हुए 'ॐ नमः' और छोड़ते हुए 'शिवाय' जपें। प्रत्येक अक्षर को उसके चक्र में अनुभव करें — न रीढ़ के मूल में, म स्वाधिष्ठान में, शि नाभि में, व हृदय में, य कंठ में, और ॐ आज्ञा (तृतीय नेत्र) में। प्रातः और संध्या — दिन में दो बार — करना आदर्श है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ॐ नमः शिवाय का अर्थ है — मैं शिव को नमन करता हूँ, उस शुभ, सर्वव्यापी दिव्य चेतना को। ॐ आदिनाद है, नमः का अर्थ है नमन या समर्पण, और शिवाय का अर्थ है शिव के प्रति (चतुर्थी विभक्ति में)। इसका गहनतम अर्थ है: मैं अपने सीमित स्व को उस असीम दिव्य चेतना में समर्पित करता हूँ जो मेरा अपना सच्चा स्वरूप है।
न = पृथ्वी तत्त्व, मूलाधार चक्र, आवरण की कृपा। म = जल तत्त्व, स्वाधिष्ठान चक्र, सृष्टि। शि = अग्नि तत्त्व, मणिपुर चक्र, स्वयं शिव। व = वायु तत्त्व, अनाहत चक्र, प्रकटीकरण की कृपा। य = आकाश तत्त्व, विशुद्धि चक्र, जीवात्मा। ये सब मिलकर पाँचों तत्त्वों को शुद्ध करते हैं और पृथ्वी-चेतना से शुद्ध चेतना तक का मार्ग सक्रिय करते हैं।
रुद्राक्ष की माला से प्रति बैठक 108 बार। सूर्योदय और सूर्यास्त के समय दिन में दो बार करना आदर्श है। पूर्ण ध्यान के साथ प्रतिदिन केवल 11 बार जप भी अत्यंत फलदायी है। दिन भर श्वास के साथ मिलाकर इसे निरंतर जप के रूप में भी किया जा सकता है।
पंचाक्षर का अर्थ है पाँच अक्षर। पंचाक्षर मंत्र है — नमः शिवाय, अर्थात ॐ के बिना न-म-शि-वा-य। यही श्री रुद्रम का मूल वैदिक रूप है। ॐ सहित ॐ नमः शिवाय षडक्षरी (छह अक्षरों वाला) रूप है।
इसका मूल श्री रुद्रम में है — कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता (4.5.8.1) में 'नमः शिवाय च शिवतराय च' के रूप में (ॐ के बिना)। यह शुक्ल यजुर्वेद के रुद्राष्टाध्यायी (अध्याय 5, श्लोक 41) में भी आता है। ॐ का उपसर्ग आगमिक-शैव परंपरा में जोड़ा गया। शिव पुराण घोषित करता है कि यह मंत्र सृष्टि के आदि में ही विद्यमान था।
नमः शिवाय श्री रुद्रम का मूल पंचाक्षर (पाँच अक्षरों वाला) रूप है — जिसे सबके लिए सुलभ माना गया है। ॐ नमः शिवाय में आदिनाद ॐ जुड़ जाता है, जिससे यह षडक्षरी (छह अक्षरों वाला) रूप बन जाता है। आधुनिक काल में लगभग सभी परंपराओं के गुरु सच्चे भक्तों को ॐ नमः शिवाय जपने की प्रेरणा देते हैं। दोनों रूपों में समान शक्ति है और दोनों एक ही अनुभूति तक ले जाते हैं।

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