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महामृत्युंजय मंत्र

🕉️ Vedic / Shaiva·📿 108× जप·🕐 ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से 1.5 घंटे पूर्व) / सोमवार सर्वाधिक पवित्र है·🎵 ऑडियो सहित·📜 Rigveda (7.59.12)

अन्य नाम / खोज: om tryambakam yajamahe · tryambakam yajamahe sugandhim · maha mrityunjaya mantra · mrityunjay mantra · om triyambakam yajamahe · tryambakam mantra

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अर्थ

महामृत्युंजय मंत्र ऋग्वेद से लिया गया भगवान शिव को समर्पित मंत्र है, जो उन्हें मृत्यु पर विजय पाने वाले के रूप में आराधता है। यह आरोग्य, रक्षा और मृत्यु के भय से मुक्ति के लिए सबसे शक्तिशाली वैदिक मंत्र माना जाता है।

उत्पत्ति और कथा

Rigveda (7.59.12) · Rishi Vasishtha · 1500 BCE

महामृत्युंजय मंत्र ऋषि वसिष्ठ को प्रकट हुआ और आगे चलकर बालक मार्कण्डेय की कथा का केंद्र बना। जब मार्कण्डेय की मृत्यु 16 वर्ष की आयु में निश्चित थी, तब उनके पिता ने उन्हें यह मंत्र सिखाया। 16वें जन्मदिन पर जब यमराज उन्हें लेने आए, तब मार्कण्डेय शिव लिंग से लिपटकर यह मंत्र जपते रहे। भगवान शिव प्रकट हुए, यम को पराजित किया और मार्कण्डेय को अमर जीवन का वरदान दिया। इसी से यह मंत्र मृत-संजीवनी मंत्र कहलाता है।

शास्त्रों में वर्णित

शिव पुराण में वर्णित है कि जब यमराज ने बालक मार्कण्डेय पर अपना पाश डाला, तब भगवान शिव अपने उग्र कालान्तक रूप में लिंग से प्रकट हुए, यम की छाती पर प्रहार किया और घोषणा की कि जो कोई इस मंत्र का श्रद्धापूर्वक जप करेगा वह अकाल मृत्यु से मुक्त रहेगा। आज भी यह मंत्र गंभीर रूप से रुग्ण व्यक्ति के निकट जपा जाता है, और असंख्य भक्त चमत्कारिक आरोग्य-लाभ की साक्षी देते हैं।

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मंत्र

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त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मा ऽमृतात्

Om Tryambakam Yajamahe Sugandhim Pushtivardhanam Urvarukamiva Bandhanan Mrityormukshiya Maamritat

अर्थ:हम तीन नेत्रों वाले (शिव) की पूजा करते हैं जो दिव्य सुगंध वाले हैं और सभी प्राणियों का पोषण और शक्ति बढ़ाते हैं। जैसे पका हुआ खीरा अपनी बेल से स्वाभाविक रूप से अलग हो जाता है — वैसे ही हमें मृत्यु के बंधन से मुक्त करें, अमरत्व से नहीं।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

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🔊Omपवित्र आदि नाद और ब्रह्म का प्रतीक — परम दिव्य सत्य
त्र्यम्बकम्🔊Tryambakamतीन नेत्रों वाले (शिव) — उनके तीन नेत्र सूर्य (दायाँ), चंद्र (बायाँ) और अग्नि (तीसरा नेत्र) हैं
यजामहे🔊Yajamaheहम पूजते हैं / सम्मान करते हैं / अर्पण करते हैं — सामूहिक, निरंतर उपासना
सुगन्धिम्🔊Sugandhimदिव्य सुगंध वाले / उत्तम सार वाले — समस्त सृष्टि में व्याप्त अंतरतम सार
पुष्टिवर्धनम्🔊Pushtivardhanamपोषण को बढ़ाने और सुदृढ़ करने वाले — समस्त वृद्धि, बल और समृद्धि का स्रोत
उर्वारुकम्🔊Urvarukamपका हुआ खीरा (या बड़ी ककड़ी) — मुख्य रूपक: परिपक्व आत्मा जो स्वाभाविक रूप से अलग हो जाती है
इव🔊Ivaजैसे / की भाँति — रूपक को प्रार्थना से जोड़ने वाला उपमा-शब्द
बन्धनात्🔊Bandhananअपने बंधन से / उस डंठल से जो उसे थामे है — आसक्ति, कर्म, अहंकार और भय
मृत्योः🔊Mrityohमृत्यु से — भौतिक मृत्यु, मृत्यु का भय और बाध्य पुनर्जन्म
मुक्षीय🔊Mukshiyaमुक्त करें / स्वतंत्र करें — केंद्रीय प्रार्थना, 'मोक्ष' के समान मूल से
मा🔊Maaनहीं / मत — सूक्ष्म निषेध
अमृतात्🔊Amritatअमरत्व से / अमर तत्व से — हमें दिव्य शाश्वत स्रोत से अलग न करें

महामृत्युंजय मंत्र पाठ के लाभ

आरोग्य और स्वास्थ्य-लाभ — सभी परंपराओं में इसका प्रमुख उपयोग। शिव को दिव्य वैद्य रूप में जागृत करता है। रोग के समय जप — विशेषकर 40 दिन तक प्रतिदिन 108 बार — सबसे प्रचलित पारंपरिक उपचार है।

अकाल मृत्यु से रक्षा — महामृत्युंजय का शाब्दिक अर्थ है मृत्यु पर महान विजय। संकट, दुर्घटना, शल्यक्रिया या प्राणघातक रोग के समय इसका जप किया जाता है।

भय और चिंता का नाश — मृत्यु का भय अधिकांश चिंता की जड़ है। इस मंत्र द्वारा साधक धीरे-धीरे भय को मूल से दूर कर सच्ची निर्भयता प्राप्त करता है।

मरणासन्न और दिवंगत के लिए — मरणासन्न व्यक्ति के निकट जप उसकी यात्रा सुगम करता है। किसी प्रियजन के देहांत के बाद 40 दिन तक 108 बार जप दिवंगत आत्मा को सहायता देने की पारंपरिक प्रथा है।

आध्यात्मिक मुक्ति — गहनतम स्तर पर यह मंत्र मुक्ति के लिए प्रार्थना है — कर्म और अज्ञान से उत्पन्न जन्म-मरण के चक्र से छुटकारा।

पोषण और जीवनशक्ति — 'पुष्टिवर्धनम्' अर्थात सबका पोषक के रूप में नियमित जप जीवनशक्ति बढ़ाता है, भीतरी बल और कल्याण की गहन अनुभूति देता है।

महामृत्युंजय मंत्र जप विधि

जप संख्या108बार
उत्तम समयब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से 1.5 घंटे पूर्व) / सोमवार सर्वाधिक पवित्र है
दिशाEast or North

रुद्राक्ष माला लेकर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें। शिव का आवाहन करने के लिए तीन बार 'ॐ नमः शिवाय' से आरंभ करें। पूर्ण उच्चारण के साथ 108 बार जप करें — विशेषकर त्र्यम्बकं, यजामहे, उर्वारुकमिव और मुक्षीय का सही उच्चारण करें। शांत, अविचल गति से जप करें। आरोग्य के लिए: 40 दिन तक प्रतिदिन 108 बार। पुरश्चरण के लिए: सप्ताहों से महीनों में 1,25,000 बार। सोमवार, प्रदोष और महाशिवरात्रि विशेष शुभ हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महामृत्युंजय मंत्र (ॐ त्र्यम्बकं यजामहे) ऋग्वेद (7.59.12) से लिया गया वैदिक मंत्र है जो भगवान शिव को मृत्युंजय रूप में समर्पित है। यह वैदिक परंपरा का सबसे शक्तिशाली आरोग्य और रक्षा मंत्र है, जो रोग, भय, दुर्घटना, अकाल मृत्यु पर विजय और आध्यात्मिक मुक्ति के लिए जपा जाता है।
ॐ = आदि नाद। त्र्यम्बकं = तीन नेत्रों वाले (शिव)। यजामहे = हम पूजते हैं। सुगन्धिम् = दिव्य सुगंध वाले। पुष्टिवर्धनम् = सबका पोषण और बल बढ़ाने वाले। उर्वारुकमिव = पके खीरे की भाँति। बन्धनात् = अपने बंधन (डंठल) से। मृत्योः = मृत्यु से। मुक्षीय = हमें मुक्त करें। मा अमृतात् = अमरत्व से नहीं — हमें दिव्य से अलग न करें।
108 बार पारंपरिक विधान है, श्रेष्ठतः रुद्राक्ष माला से। नियमित अभ्यास के लिए प्रतिदिन 11 बार अत्यंत लाभकारी है। महामृत्युंजय पुरश्चरण (सघन साधना) के लिए 1,25,000 बार विधान है। रोग या संकट के समय: 40 दिन तक प्रतिदिन 108 बार।
दोनों एक ही मंत्र हैं। मृत्युंजय का अर्थ है मृत्यु पर विजय पाने वाला। महा का अर्थ है महान — अतः महामृत्युंजय अर्थात मृत्यु पर महान विजय। यह रुद्र मंत्र, त्र्यम्बक मंत्र और मृत-संजीवनी मंत्र भी कहलाता है।
ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से 1.5 घंटे पूर्व) सबसे शक्तिशाली समय है। सोमवार सबसे पवित्र दिन है — शिव का दिन। प्रदोष और महाशिवरात्रि वर्ष के सर्वोत्तम अवसर हैं। रोग, भय, दुर्घटना, मृत्यु के निकट या किसी जीवन-संकट के समय जप करें।
दोनों श्रेष्ठ वैदिक मंत्र हैं किंतु भिन्न प्रयोजन वाले। गायत्री मंत्र (ऋग्वेद 3.62.10) सूर्य को दिव्य बुद्धि रूप में समर्पित है — यह मन को आलोकित कर ज्ञान देता है। महामृत्युंजय शिव को मृत्युंजय रूप में समर्पित है — यह आरोग्य, रक्षा और मुक्ति देता है। दोनों परस्पर पूरक माने जाते हैं।
हाँ, बिल्कुल। यह मंत्र सभी मनुष्यों के लिए है। ऋग्वेद में ऐसे मंत्र हैं जो दिव्य की खोज करने वाले सभी के लिए सुलभ हैं। मंत्र स्वयं 'यजामहे' — हम पूजते हैं — कहता है, जो बिना किसी लिंग-भेद के सामूहिक प्रार्थना है।
मुख्य उच्चारण-बिंदु: त्र्यम्बकं = त्र्य-अम्-ब-कं ('त्र्य' एक ही अक्षर है, 'त्रि-यम्' नहीं)। यजामहे = य-जा-म-हे। सुगन्धिम् = सु-गन्धि-म्। पुष्टिवर्धनम् = पुष्टि-वर्ध-नम्। उर्वारुकमिव = उर्-वा-रु-क-मि-व। मृत्योर्मुक्षीय = मृत्योर्-मुक्षी-य। माऽमृतात् = मा-अम्-रि-तात्।

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