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बजरंग बाण

🕉️ hindu·📿 7× जप·🕐 मंगलवार या शनिवार, विशेषकर रात्रि में अथवा हनुमान पूजा के समय·🎵 ऑडियो सहित·📜 Attributed to Tulsidas, from the tradition of Ramcharitmanas

अन्य नाम / खोज: nishchay prem pratit te · bajrang baan lyrics · bajrang ban path

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अर्थ

बजरंग बाण गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित हनुमान जी की अत्यन्त शक्तिशाली रक्षात्मक प्रार्थना है। 'बाण' का अर्थ है तीर — यह दुष्ट शक्तियों, भूत-प्रेत और काले जादू पर दिव्य तीर की भाँति प्रहार करता है। इसका पाठ निर्भयता, सुरक्षा और शत्रुओं पर विजय प्रदान करता है।

उत्पत्ति और कथा

Attributed to Tulsidas, from the tradition of Ramcharitmanas · Goswami Tulsidas · 16th century CE

बजरंग बाण की रचना गोस्वामी तुलसीदास ने हनुमान के उग्र रक्षक रूप का आह्वान करने वाले शक्तिशाली प्रार्थना-तीर के रूप में की। परम्परा के अनुसार तुलसीदास ने यह प्रार्थना तब रची जब वे स्वयं बुरी शक्तियों के खतरे का सामना कर रहे थे और उन्हें हनुमान के तत्काल हस्तक्षेप की आवश्यकता थी। 'बाण' का अर्थ है तीर, जो दर्शाता है कि यह प्रार्थना सभी नकारात्मक शक्तियों पर दिव्य तीर की भाँति प्रहार करती है।

शास्त्रों में वर्णित

सदियों से भक्त बताते आए हैं कि गम्भीर संकट के समय सच्ची श्रद्धा से बजरंग बाण का पाठ करने से तुरन्त बुरी आत्माएँ दूर हुईं, काले जादू के प्रभाव टूटे और जब अन्य सभी उपाय विफल हो गए तब चमत्कारिक रक्षा मिली।

सुनें और साथ में जपें

सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित

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श्लोक 1

निश्चय प्रेम प्रतीति ते, बिनय करै सनमान। तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करै हनुमान॥

Nishchaya prema pratiti te, binaya karai sanmana. Tehi ke karaja sakala shubha, siddha karai Hanumana.

अर्थ:दृढ़ प्रेम और विश्वास से जो आदरपूर्वक विनय करता है — हनुमान उसके समस्त शुभ कार्य सिद्ध करते हैं।

श्लोक 2

जय हनुमन्त सन्त हितकारी। सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी॥

Jaya Hanumanta santa hitakari, Suni lijai prabhu araja hamari.

अर्थ:जय हनुमन्त, सन्तों के हितकारी; हे प्रभु, हमारी विनती सुन लीजिए।

श्लोक 3

जन के काज विलम्ब कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै॥

Jana ke kaja vilamba na kijai, Atura dauri maha sukha dijai.

अर्थ:भक्तों के कार्य में विलम्ब न कीजिए; शीघ्र दौड़कर आइए और महान सुख दीजिए।

श्लोक 4

जैसे कूदि सिन्धु वहि पारा। सुरसा बदन पैठि बिस्तारा॥

Jaise kudi sindhu vahi para, Surasa badana paithi bistara.

अर्थ:जैसे आपने समुद्र को कूदकर पार किया, सुरसा के मुख में प्रवेश कर विस्तार किया;

श्लोक 5

आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुर लोका॥

Age jaya Lankini roka, Marehu lata gai sura loka.

अर्थ:आगे जाकर लंकिनी ने रोका, आपने लात मारी और वह सुरलोक चली गई।

श्लोक 6

जाय विभीषण को सुख दीन्हा। सीता निरखि परम पद लीन्हा॥

Jaya Vibhishana ko sukha dinha, Sita nirakhi parama pada linha.

अर्थ:विभीषण को सुख दिया; सीता का दर्शन कर परम पद पाया।

श्लोक 7

बाग उजारि सिन्धु महं बोरा। अति आतुर यम कातर तोरा॥

Baga ujari sindhu maham bora, Ati atura yama katara tora.

अर्थ:वाटिका उजाड़ी, लंका को भय में डुबोया; अति शीघ्र यम को भी कातर कर दिया।

श्लोक 8

अक्षय कुमार मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा॥

Akshaya Kumara mari samhara, Luma lapeti Lanka ko jara.

अर्थ:अक्षयकुमार का संहार किया; पूँछ लपेटकर लंका जला दी।

श्लोक 9

लाह समान लंक जरि गई। जय जय धुनि सुर पुर महं भई॥

Laha samana Lanka jari gai, Jaya jaya dhuni sura pura maham bhai.

अर्थ:लंका लाह-सी जल गई; देवपुर में जय-जय की ध्वनि हुई।

श्लोक 10

अब विलम्ब केहि कारण स्वामी। कृपा करहुं उर अन्तर्यामी॥

Aba vilamba kehi karana svami, Kripa karahu ura antaryami.

अर्थ:अब किस कारण विलम्ब, स्वामी? कृपा कीजिए, हे अन्तर्यामी।

श्लोक 11

जय जय लक्ष्मण प्राण के दाता। आतुर होइ दुःख करहुं निपाता॥

Jaya jaya Lakshmana prana ke data, Atura hoi dukha karahu nipata.

अर्थ:जय, लक्ष्मण के प्राणदाता; शीघ्र होकर दुःख का नाश कीजिए।

श्लोक 12

जय गिरिधर जय जय सुख सागर। सुर समूह समरथ भटनागर॥

Jaya Giridhara jaya jaya sukha sagara, Sura samuha samaratha bhatanagara.

अर्थ:जय गिरिधर, जय सुखसागर; देवसमूह में समर्थ वीरों के नायक।

श्लोक 13

हनु हनु हनु हनु हनुमन्त हठीले। बैरिहिं मारू बज्र की कीले॥

Om Hanu Hanu Hanu Hanu Hanumanta hathile, Bairihim maru bajra ki kile.

अर्थ:ॐ हनु हनु हनु हनुमन्त हठीले; शत्रु को वज्र की कील से मारो।

श्लोक 14

गदा बज्र लै बैरिहिं मारो। महाराज प्रभु दास उबारो॥

Gada bajra lai bairihim maro, Maharaja prabhu dasa ubaro.

अर्थ:गदा-वज्र लेकर शत्रु को मारो; हे महाराज प्रभु, दास की रक्षा करो।

श्लोक 15

ॐकार हुंकार महाप्रभु धावो। बज्र गदा हनु विलम्ब लावो॥

Omkara hunkara mahaprabhu dhavo, Bajra gada Hanu vilamba na lavo.

अर्थ:ॐकार-हुंकार के साथ, हे महाप्रभु, दौड़ो; वज्र-गदा हनु, विलम्ब न करो।

श्लोक 16

ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमन्त कपीसा। हुं हुं हुं हनु अरि उर शीशा॥

Om Hrim Hrim Hrim Hanumanta Kapisa, Om Hum Hum Hum Hanu ari ura shisha.

अर्थ:ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमन्त कपीश; ॐ हुं हुं हुं शत्रु के उर और शीश पर।

श्लोक 17

सत्य होउ हरि शपथ पायके। रामदूत धरु मारु धाय के॥

Satya hou Hari shapatha payake, Ramaduta dharu maru dhaya ke.

अर्थ:हरि (राम) की शपथ पाकर यह सत्य हो; हे रामदूत, दौड़कर शत्रु को पकड़ो और मारो।

श्लोक 18

जय जय जय हनुमन्त अगाधा। दुःख पावत जन केहि अपराधा॥

Jaya jaya jaya Hanumanta agadha, Dukha pavata jana kehi aparadha.

अर्थ:जय जय जय अगाध हनुमन्त; किस अपराध से तुम्हारा भक्त दुःख पा रहा है?

श्लोक 19

पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत कछु दास तुम्हारा॥

Puja japa tapa nema achara, Nahim janata kachhu dasa tumhara.

अर्थ:पूजा, जप, तप, नियम और आचार — तुम्हारा दास कुछ नहीं जानता।

श्लोक 20

वन उपवन मग गिरि गृह माहीं। तुमरे बल हम डरपत नाहीं॥

Vana upavana maga giri griha mahim, Tumare bala hama darapata nahim.

अर्थ:वन, उपवन, मार्ग, पर्वत या घर में — तुम्हारे बल से हम नहीं डरते।

श्लोक 21

पाय परौं कर जोरि मनावों। यह अवसर अब केहि गोहरावों॥

Paya paraum kara jori manavom, Yaha avasara aba kehi goharavom.

अर्थ:पैरों पड़ता हूँ, हाथ जोड़कर मनाता हूँ; इस अवसर पर अब किसे पुकारूँ?

श्लोक 22

जय अंजनि कुमार बलवन्ता। शंकर सुवन धीर हनुमन्ता॥

Jaya Anjani Kumara balavanta, Shankara suvana dhira Hanumanta.

अर्थ:जय अंजनिकुमार बलवन्त; शंकरसुवन, धीर हनुमन्त।

श्लोक 23

बदन कराल काल कुल घालक। राम सहाय सदा प्रतिपालक॥

Badana karala kala kula ghalaka, Rama sahaya sada pratipalaka.

अर्थ:कराल मुख वाले, काल के कुल का नाश करने वाले; राम के सदा सहायक और रक्षक।

श्लोक 24

भूत प्रेत पिशाच निशाचर। अग्नि बैताल काल मारीमर॥

Bhuta preta pishacha nishachara, Agni baitala kala marimara.

अर्थ:भूत, प्रेत, पिशाच और निशाचर; अग्नि, बेताल, काल और महामारी —

श्लोक 25

इन्हें मारु तोहि शपथ राम की। राखु नाथ मरजाद नाम की॥

Inhem maru tohi shapatha Rama ki, Rakhu natha marajada nama ki.

अर्थ:इन्हें मारो, तुम्हें राम की शपथ; हे नाथ, अपने नाम की मर्यादा रखो।

श्लोक 26

जनकसुता हरि दास कहावो। ताकी शपथ विलम्ब लावो॥

Janaka-suta Hari dasa kahavo, Taki shapatha vilamba na lavo.

अर्थ:तुम जानकी (सीता) और हरि के दास कहलाते हो; उनकी शपथ, विलम्ब न करो।

श्लोक 27

जय जय जय धुनि होत अकाशा। सुमिरत होत दुसह दुःख नाशा॥

Jaya jaya jaya dhuni hota akasha, Sumirata hota dusaha dukha nasha.

अर्थ:आकाश में जय-जय की ध्वनि होती है; स्मरण करते ही दुःसह दुःख का नाश होता है।

श्लोक 28

चरण शरण करि जोरि मनावों। यहि अवसर अब केहि गोहरावों॥

Charana sharana kari jori manavom, Yahi avasara aba kehi goharavom.

अर्थ:चरणों में, हाथ जोड़कर मनाता हूँ; इस अवसर पर अब किसे पुकारूँ?

श्लोक 29

उठु उठु चलु तोहिं राम दुहाई। पांय परौं कर जोरि मनाई॥

Uthu uthu chalu tohim Rama duhai, Pamya paraum kara jori manai.

अर्थ:उठो, उठो, चलो — तुम्हें राम की दुहाई; पैरों पड़ता हूँ, हाथ जोड़कर मनाता हूँ।

श्लोक 30

चं चं चं चं चपल चलन्ता। हनु हनु हनु हनु हनुमन्ता॥

Om Cham Cham Cham Cham chapala chalanta, Om Hanu Hanu Hanu Hanu Hanumanta.

अर्थ:ॐ चं चं चं चं चपल चलन्त; ॐ हनु हनु हनु हनुमन्त।

श्लोक 31

हं हं हांक देत कपि चञ्चल। सं सं सहम पराने खल दल॥

Om Ham Ham hanka deta kapi chanchala, Om Sam Sam sahama parane khala dala.

अर्थ:ॐ हं हं — चंचल कपि हाँक देता है; ॐ सं सं — दुष्ट दल भयभीत होकर भाग जाता है।

श्लोक 32

अपने जन को तुरत उबारो। सुमिरत होय आनन्द हमारो॥

Apane jana ko turata ubaro, Sumirata hoya ananda hamaro.

अर्थ:अपने भक्त को तुरन्त उबारो; स्मरण करते ही हमारा आनन्द हो।

श्लोक 33

यहि बजरंग बाण जेहि मारो। ताहि कहो फिर कौन उबारो॥

Yahi Bajaranga Bana jehi maro, Tahi kaho phira kauna ubaro.

अर्थ:जिसे यह बजरंग बाण मारे — कहो, फिर उसे कौन उबार सकता है?

श्लोक 34

पाठ करै बजरंग बाण की। हनुमत रक्षा करै प्राण की॥

Patha karai Bajaranga Bana ki, Hanumata raksha karai prana ki.

अर्थ:जो बजरंग बाण का पाठ करता है — हनुमान उसके प्राणों की रक्षा करते हैं।

श्लोक 35

यह बजरंग बाण जो जापै। तेहि ते भूत प्रेत सब कांपे॥

Yaha Bajaranga Bana jo japai, Tehi te bhuta preta saba kampe.

अर्थ:जो यह बजरंग बाण जपता है — उससे सब भूत-प्रेत काँप उठते हैं।

श्लोक 36

धूप देय अरु जपै हमेशा। ताके तन नहिं रहे कलेशा॥

Dhupa deya aru japai hamesha, Take tana nahim rahe klesha.

अर्थ:जो धूप देकर सदा जपता है — उसके शरीर में कोई क्लेश नहीं रहता।

श्लोक 37

प्रेम प्रतीतिहिं कपि भजै, सदा धरै उर ध्यान। तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करै हनुमान॥

Prema pratitihim kapi bhajai, sada dharai ura dhyana. Tehi ke karaja sakala shubha, siddha karai Hanumana.

अर्थ:प्रेम और विश्वास से जो कपि (हनुमान) का भजन करता और सदा हृदय में ध्यान धरता है — उसके समस्त शुभ कार्य सिद्ध होते हैं।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

निश्चय🔊Nishchayनिश्चय से, दृढ़ श्रद्धा से
प्रेम प्रतीति🔊Prem Pratitiप्रेम और विश्वास
बिनय🔊Binayविनम्र प्रार्थना
सिद्ध🔊Siddhसिद्ध, पूर्ण
संत हितकारी🔊Sant Hitkariसंतों के हितकारी
अरज🔊Arajअनुरोध, विनती
आतुर🔊Aaturउत्सुक, अति शीघ्र
सिंधु🔊Sindhuसमुद्र
सुरसा बदन🔊Surasa Badanराक्षसी सुरसा का मुख
लंकिनी🔊Lankiniलंका की रक्षक राक्षसी
बिभीषन🔊Bibhishanविभीषण, रावण के भाई
परम पद🔊Param Padपरम पद
अक्षय कुमार🔊Akshay Kumarरावण का पुत्र (अक्षयकुमार)
लूम लपेटि🔊Loom Lapetiपूँछ लपेटना
लंक जारा🔊Lank Jaraलंका जलाई
सुरपुर🔊Surpurस्वर्ग, देवताओं का लोक
अंतरयामी🔊Antaryamiअंतर्यामी, सर्वज्ञ
लखन प्रान के दाता🔊Lakhan Pran Ke Dataलक्ष्मण को प्राणदान देने वाले
गिरिधर🔊Giridharपर्वत धारण करने वाले (द्रोणगिरि उठाई)
बज्र की कीले🔊Bajra Ki Keeleवज्र की कीलें
कपीसा🔊Kapisaवानरों के स्वामी
बदन कराल🔊Badan Karalविकराल मुख
काल कुल घालक🔊Kaal Kul Ghalakकाल के कुल का नाश करने वाले
प्रतिपालक🔊Pratipalakपालक, रक्षक
भूत प्रेत पिशाच🔊Bhoot Pret Pishachभूत, प्रेत और पिशाच
निशाचर🔊Nishacharनिशाचर (रात्रि में विचरने वाले राक्षस)
बेताल🔊Betalबेताल (पिशाच आत्मा)
शपथ🔊Shapathशपथ, प्रतिज्ञा
मरजाद🔊Marjadमर्यादा, गौरव
जनक सुता🔊Janak Sutaजनक की पुत्री (सीता)
दुसह दुख🔊Dusah Dukhदुःसह दुःख
चरन शरण🔊Charan Sharanचरणों में शरण
कर जोरि🔊Kar Joriहाथ जोड़कर
नख शस्त्र🔊Nakh Shastraनख रूपी शस्त्र
बजरंग बली🔊Bajrang Baliवज्र के समान बल वाले (बजरंगबली)

बजरंग बाण पाठ के लाभ

काले जादू, बुरी नज़र और नकारात्मक ऊर्जा से शक्तिशाली रक्षा प्रदान करता है

मार्ग की बाधाओं और शत्रुओं को दूर करता है

विपत्ति के सामने निर्भयता और साहस प्रदान करता है

अलौकिक बाधाओं से उत्पन्न रोगों का निवारण करता है

भूत, प्रेत और आसुरी प्रभावों से रक्षा करता है

विरोधियों और शत्रुओं पर विजय दिलाता है

हर समय भगवान हनुमान का दिव्य संरक्षण प्रदान करता है

गहरे भय और चिन्ताओं का नाश करता है

बजरंग बाण जप विधि

जप संख्या7बार
उत्तम समयमंगलवार या शनिवार, विशेषकर रात्रि में अथवा हनुमान पूजा के समय

बजरंग बाण अत्यन्त शक्तिशाली प्रार्थना है, इसका पाठ पूर्ण भक्ति और अनुशासन से करना चाहिए। हनुमान प्रतिमा के सामने सरसों के तेल का दीपक जलाएँ, सिन्दूर का तिलक लगाएँ और दक्षिण या पूर्व की ओर मुख करके बैठें। तीव्र श्रद्धा और अटल एकाग्रता से पाठ करें। यह परम्परागत रूप से गम्भीर संकट के समय किया जाता है। अधिकतम फल हेतु 7 बार पाठ करें। पाठ के दिन ब्रह्मचर्य का पालन करें। इसे लापरवाही से न करें — यह एक आध्यात्मिक अस्त्र माना जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बजरंग बाण का पाठ अत्यधिक संकट, भय अथवा शत्रुओं या नकारात्मक शक्तियों से गम्भीर खतरे के समय करना चाहिए। यह मंगलवार और शनिवार को विशेष प्रभावशाली है। अनेक भक्त इसे रात्रि में पूर्ण फल के लिए करते हैं।
बजरंग बाण एक शक्तिशाली प्रार्थना है जो सच्ची भक्ति और उचित अनुशासन माँगती है। सच्ची श्रद्धा और आदर से किया जाए तो यह खतरनाक नहीं है। परन्तु इसका पाठ लापरवाही से या तुच्छ उद्देश्यों के लिए नहीं करना चाहिए। पाठ के समय शरीर और मन की पवित्रता बनाए रखें।
हनुमान चालीसा हनुमान के गुणों की स्तुति और सामान्य कल्याण हेतु उनका आशीर्वाद माँगने वाला भक्ति-भजन है। बजरंग बाण अधिक तीव्र, उग्र प्रार्थना है जो विशेष रूप से बुरी शक्तियों, शत्रुओं और अलौकिक खतरों से रक्षा के लिए प्रयुक्त होती है। चालीसा कोमल भक्ति है; बजरंग बाण एक आध्यात्मिक अस्त्र है।
गम्भीर सुरक्षा की आवश्यकता हो तो बजरंग बाण का पाठ एक बैठक में 7 बार करें। निरन्तर सुरक्षा के लिए इसे प्रतिदिन एक बार करें। 40 दिन की सिद्धि-साधना में कठोर अनुशासन और ब्रह्मचर्य के साथ इसे प्रतिदिन 7 या 11 बार करें।
हाँ, सच्ची भक्ति के साथ कोई भी बजरंग बाण का पाठ कर सकता है। भगवान हनुमान लिंग-भेद के बिना सभी भक्तों पर करुणा करते हैं। मुख्य आवश्यकता है सच्ची श्रद्धा, भक्ति और आदरपूर्ण पाठ।

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