शनि चालीसा
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✦ अर्थ
शनि चालीसा सूर्यपुत्र शनिदेव की चालीस पदों वाली स्तुति है, जो कर्म के महान न्यायाधीश शनि को प्रसन्न करती है। साढ़ेसाती, ढैया और शनि दशा के कष्टों में पाठ की जाने वाली यह स्तुति शनि की दृष्टि को कृपामय बनाती है और भक्त को धैर्य, न्याय तथा रक्षा देती है।
उत्पत्ति और कथा
Traditional Hindi devotional hymn · Traditional (signed 'Ram') · Devotional era
शनि चालीसा शनिदेव की चालीस पदों वाली हिंदी स्तुति है, जो सूर्य के पुत्र और शनि ग्रह के स्वामी — कर्म के महान न्यायाधीश हैं। यह स्मरण कराती है कि शनि की दृष्टि ने राम, रावण, विक्रमादित्य, हरिश्चन्द्र और पांडवों तक को झुकाया, फिर भी भक्तों को फल दिया। इसी कारण ग्रह की कृपा और रक्षा पाने हेतु इसका पाठ विशेषकर साढ़ेसाती और शनि दशा में किया जाता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
चालीसा शनि की महान शक्ति का वर्णन करती है — राम को वनवास भेजना, विक्रमादित्य को कोल्हू पर झुकाना, यहाँ तक कि सूर्य को निगल लेना जब तक शेष और देवताओं ने हस्तक्षेप न किया — फिर भी वचन देती है कि जो उनकी कथा गाता है उसे कभी कठोर काल नहीं सताता, और चालीस दिन की भक्ति आत्मा को भवसागर से पार ले जाती है।
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जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल । दीनन के दुःख दूर करि , कीजै नाथ निहाल ॥
Jaya ganesha girija suvana, mamgala karana kripala Dinana ke duhkha dura kari , kijai natha nihala
अर्थ:गिरिजा-पुत्र (गणेश) की जय हो, जो मंगलकारी और कृपालु हैं; हे नाथ, दीनों के दुःख दूर करें और उन्हें निहाल करें।
जय जय श्री शनिदेव प्रभु , सुनहु विनय महाराज । करहु कृपा हे रवि तनय , राखहु जन की लाज ॥
Jaya jaya shri shanideva prabhu , sunahu vinaya maharaja Karahu kripa he ravi tanaya , rakhahu jana ki laja
अर्थ:जय जय हे शनिदेव प्रभु; हे महाराज, मेरी विनती सुनें; हे रवि-पुत्र, कृपा करें और अपने भक्त की लाज रखें।
जयति जयति शनिदेव दयाला । करत सदा भक्तन प्रतिपाला ॥
Jayati jayati shanideva dayala Karata sada bhaktana pratipala
अर्थ:दयालु शनिदेव की जय हो, जय हो, जो सदा अपने भक्तों का पालन करते हैं।
चारि भुजा, तनु श्याम विराजै । माथे रतन मुकुट छवि छाजै ॥
Chari bhuja, tanu shyama virajai Mathe ratana mukuta chhavi chhajai
अर्थ:चार भुजाओं वाले, श्याम वर्ण देह से सुशोभित; उनके मस्तक पर रत्नजड़ित मुकुट की छवि शोभा देती है।
परम विशाल मनोहर भाला । टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला ॥
Parama vishala manohara bhala Tedha़i drishti bhrikuti vikarala
अर्थ:उनका भाल अत्यंत विशाल और मनोहर है; उनकी दृष्टि टेढ़ी और भृकुटि विकराल है।
कुण्डल श्रवन चमाचम चमके । हिये माल मुक्तन मणि दमकै ॥
Kundala shravana chamachama chamake Hiye mala muktana mani damakai
अर्थ:उनके कानों में कुण्डल चमचम चमकते हैं; उनके वक्षस्थल पर मोती और मणियों की माला दमकती है।
कर में गदा त्रिशूल कुठारा । पल बिच करैं अरिहिं संहारा ॥
Kara mem gada trishula kuthara Pala bicha karaim arihim samhara
अर्थ:उनके हाथों में गदा, त्रिशूल और कुठार है; क्षण भर में वे शत्रुओं का संहार कर देते हैं।
पिंगल, कृष्णो, छाया, नन्दन । यम, कोणस्थ, रौद्र, दुःख भंजन ॥
Pimgala, krishno, chhaya, nandana Yama, konastha, raudra, duhkha bhamjana
अर्थ:पिंगल, कृष्ण (श्याम), छायानन्दन (छाया-पुत्र); यम, कोणस्थ, रौद्र, दुःख का नाश करने वाले —
सौरी, मन्द शनी दश नामा । भानु पुत्र पूजहिं सब कामा ॥
Sauri, manda shani dasha nama Bhanu putra pujahim saba kama
अर्थ:— सौरी, मन्द, शनि: ये उनके दस नाम हैं। भानु (सूर्य) के पुत्र, पूजे जाने पर हर कामना पूर्ण करते हैं।
जापर प्रभु प्रसन्न हवैं जाहीं । रंकहुं राव करैं क्षण माहीं ॥
Japara prabhu prasanna havaim jahim Ramkahum rava karaim kshana mahim
अर्थ:जिस पर भी प्रभु प्रसन्न हो जाते हैं, उसे क्षण भर में रंक से राजा बना देते हैं।
पर्वतहू तृण होइ निहारत । तृणहू को पर्वत करि डारत ॥
Parvatahu trina hoi niharata Trinahu ko parvata kari darata
अर्थ:वे पर्वत को भी तिनके समान दिखा देते हैं, और तिनके को पर्वत बना डालते हैं।
राज मिलत वन रामहिं दीन्हयो । कैकेइहुँ की मति हरि लीन्हयो ॥
Raja milata vana ramahim dinhayo Kaikeihun ki mati hari linhayo
अर्थ:राज्याभिषेक के ठीक समय उन्होंने राम को वन भेज दिया, कैकेयी की बुद्धि हर ली।
वनहुं में मृग कपट दिखाई । मातु जानकी गई चुराई ॥
Vanahum mem mriga kapata dikhai Matu janaki gai churai
अर्थ:वन में उन्होंने कपट का (स्वर्ण) मृग दिखाया, जिससे माता जानकी (सीता) चुरा ली गईं।
लषणहिं शक्ति विकल करिडारा । मचिगा दल में हाहाकारा ॥
Lashanahim shakti vikala karidara Machiga dala mem hahakara
अर्थ:उन्होंने लक्ष्मण को शक्ति-बाण से विकल कर दिया; सेना में हाहाकार मच गया।
रावण की गति-मति बौराई । रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई ॥
Ravana ki gati-mati baurai Ramachandra som baira badha़ai
अर्थ:उन्होंने रावण की बुद्धि और मति को भ्रष्ट कर दिया, रामचन्द्र से उसका बैर बढ़ा दिया।
दियो कीट करि कंचन लंका । बजि बजरंग बीर की डंका ॥
Diyo kita kari kamchana lamka Baji bajaramga bira ki damka
अर्थ:उन्होंने स्वर्ण-लंका को भस्म करवा दिया; वीर बजरंग (हनुमान) का डंका बज उठा।
नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा । चित्र मयूर निगलि गै हारा ॥
Nripa vikrama para tuhi pagu dhara Chitra mayura nigali gai hara
अर्थ:उन्होंने राजा विक्रमादित्य पर पग धरा; चित्र का मयूर हार को निगल गया (सा प्रतीत हुआ)।
हार नौलखा लाग्यो चोरी । हाथ पैर डरवायो तोरी ॥
Hara naulakha lagyo chori Hatha paira daravayo tori
अर्थ:नौलखा हार की चोरी का आरोप उन पर लगा; आपके प्रभाव से उसके हाथ-पैर भय से काँप उठे।
भारी दशा निकृष्ट दिखायो । तेलहिं घर कोल्हू चलवायो ॥
Bhari dasha nikrishta dikhayo Telahim ghara kolhu chalavayo
अर्थ:उन्होंने भारी और निकृष्ट दशा दिखाई — उसे तेली के घर कोल्हू चलवाया।
विनय राग दीपक महँ कीन्हयों । तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हयों ॥
Vinaya raga dipaka mahan kinhayom Taba prasanna prabhu hvai sukha dinhayom
अर्थ:जब विक्रम ने दीपक राग में विनती की, तब प्रभु प्रसन्न होकर उसे सुख प्रदान किया।
हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी । आपहुं भरे डोम घर पानी ॥
Harishchandra nripa nari bikani Apahum bhare doma ghara pani
अर्थ:राजा हरिश्चन्द्र की पत्नी बिक गई, और स्वयं उन्होंने डोम के घर पानी भरा।
तैसे नल पर दशा सिरानी । भूंजी-मीन कूद गई पानी ॥
Taise nala para dasha sirani Bhumji-mina kuda gai pani
अर्थ:इसी प्रकार यह दशा राजा नल पर भी आई; भुनी हुई मछली पानी में कूदकर जीवित हो गई।
श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई । पारवती को सती कराई ॥
Shri shamkarahim gahyo jaba jai Paravati ko sati karai
अर्थ:जब इसने भगवान शंकर को पकड़ा, तब ऐसा कष्ट दिया कि पार्वती को सती-सी विकल दशा में पहुँचा दिया।
तनिक विकलोकत ही करि रीसा । नभ उड़ि गतो गौरिसुत सीसा ॥
Tanika vikalokata hi kari risa Nabha uda़i gato gaurisuta sisa
अर्थ:उनके तनिक क्रोध-भरी दृष्टि से ही गौरी-पुत्र (गणेश) का सिर आकाश में उड़ गया।
पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी । बची द्रोपदी होति उधारी ॥
Pandava para bhai dasha tumhari Bachi dropadi hoti udhari
अर्थ:आपकी यह दशा पाण्डवों पर भी आई; द्रौपदी बड़ी कठिनाई से अपमान से बची।
कौरव के भी गति मति मारयो । युद्ध महाभारत करि डारयो ॥
Kaurava ke bhi gati mati marayo Yuddha mahabharata kari darayo
अर्थ:उन्होंने कौरवों की भी बुद्धि-मति मार दी, और महाभारत का महायुद्ध करवा दिया।
रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला । लेकर कूदि परयो पाताला ॥
Ravi kahan mukha mahan dhari tatkala Lekara kudi parayo patala
अर्थ:तत्काल सूर्य (रवि) को मुख में धरकर, वे पाताल में कूद पड़े।
शेष देव-लखि विनती लाई । रवि को मुख ते दियो छुड़ाई ॥
Shesha deva-lakhi vinati lai Ravi ko mukha te diyo chhuda़ai
अर्थ:शेष और देवताओं ने विनती की, और सूर्य को उनके मुख से छुड़ाया।
वाहन प्रभु के सात सुजाना । जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना ॥
Vahana prabhu ke sata sujana Jaga diggaja gardabha mriga svana
अर्थ:प्रभु के वाहन सात और सुजान हैं: हाथी, गधा, मृग, श्वान —
जम्बुक सिह आदि नख धारी । सो फल ज्योतिष कहत पुकारी ॥
Jambuka siha adi nakha dhari So phala jyotisha kahata pukari
अर्थ:— सियार, सिंह आदि पर वे सवारी करते हैं; ज्योतिष प्रत्येक का फल पुकारकर कहता है।
गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं । हय ते सुख सम्पत्ति उपजावै ॥
Gaja vahana lakshmi griha avaim Haya te sukha sampatti upajavai
अर्थ:हाथी पर (सवारी हो तो) लक्ष्मी (धन) घर आती हैं; घोड़े पर सुख और सम्पत्ति उत्पन्न होती है।
गर्दभ हानि करै बहु काजा । सिह सिद्ध्कर राज समाजा ॥
Gardabha hani karai bahu kaja Siha siddhkara raja samaja
अर्थ:गधा कार्यों में बहुत हानि करता है; सिंह सिद्धि और राज-समाज प्रदान करता है।
जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै । मृग दे कष्ट प्राण संहारै ॥
Jambuka buddhi nashta kara darai Mriga de kashta prana samharai
अर्थ:सियार बुद्धि का नाश कर डालता है; मृग कष्ट देता है और प्राण हर लेता है।
जब आवहिं स्वान सवारी । चोरी आदि होय डर भारी ॥
Jaba avahim svana savari Chori adi hoya dara bhari
अर्थ:जब वे श्वान पर सवार होकर आते हैं, तब चोरी आदि होती है और भारी भय रहता है।
तैसहि चारि चरण यह नामा । स्वर्ण लौह चाँदी अरु तामा ॥
Taisahi chari charana yaha nama Svarna lauha chandi aru tama
अर्थ:इसी प्रकार उनके चार 'चरण' (दशाएँ) नाम धारण करते हैं: स्वर्ण, लोहा, चाँदी और ताम्र।
लौह चरण पर जब प्रभु आवैं । धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं ॥
Lauha charana para jaba prabhu avaim Dhana jana sampatti nashta karavaim
अर्थ:जब प्रभु लोह-चरण पर आते हैं, तब धन, जन और सम्पत्ति का नाश करवा देते हैं।
समता ताम्र रजत शुभकारी । स्वर्ण सर्वसुख मंगल भारी ॥
Samata tamra rajata shubhakari Svarna sarvasukha mamgala bhari
अर्थ:ताम्र और रजत मध्यम एवं शुभकारी हैं; स्वर्ण-चरण सर्वसुख और महा-मंगल लाता है।
जो यह शनि चरित्र नित गावै । कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै ॥
Jo yaha shani charitra nita gavai Kabahum na dasha nikrishta satavai
अर्थ:जो कोई सदा शनि का यह चरित्र गाता है — निकृष्ट दशा (कुदशा) उसे कभी नहीं सताती।
अद्भुत नाथ दिखावैं लीला । करैं शत्रु के नशि बलि ढीला ॥
Adbhuta natha dikhavaim lila Karaim shatru ke nashi bali dhila
अर्थ:प्रभु अद्भुत लीला दिखाते हैं; वे शत्रु के बल को क्षीण कर ढीला कर देते हैं।
जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई । विधिवत शनि ग्रह शांति कराई ॥
Jo pandita suyogya bulavai Vidhivata shani graha shamti karai
अर्थ:जो विद्वान, सुयोग्य पण्डित को बुलाकर शनि-ग्रह की शांति विधिवत करवाता है,
पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत । दीप दान दै बहु सुख पावत ॥
Pipala jala shani divasa chadha़avata Dipa dana dai bahu sukha pavata
अर्थ:— शनिवार को पीपल पर जल चढ़ाता है और दीप-दान करता है, वह बहुत सुख पाता है।
कहत राम सुन्दर प्रभु दासा । शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा ॥
Kahata rama sundara prabhu dasa Shani sumirata sukha hota prakasha
अर्थ:कवि राम, प्रभु का विनम्र दास, कहते हैं: शनि का स्मरण करने से सुख प्रकाशित होता है।
पाठ शनिश्चर देव को, की हों ‘भक्त’ तैयार । करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार ॥
Patha shanishchara deva ko, ki hom ‘bhakta’ taiyara Karata patha chalisa dina, ho bhavasagara para
अर्थ:शनिश्चर देव के इस स्तोत्र का पाठ करते हुए, जो भक्त तैयार होकर चालीस दिन इसका पाठ करता है, वह भवसागर पार कर जाता है।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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शनि चालीसा पाठ के लाभ
शनि चालीसा शनि के कष्टों — साढ़ेसाती, ढैया और शनि दशा — का सर्वोत्तम उपाय है, जो शनिदेव को प्रसन्न कर उनकी दृष्टि को कृपामय बना देती है।
बाधाएँ, विलंब, ऋण, मुकदमे, रोग तथा शनि की कठोर परीक्षा से उत्पन्न भय दूर करने हेतु पढ़ी जाती है।
स्मरण कराती है कि शनि ने राम, रावण, विक्रमादित्य, हरिश्चन्द्र, नल और पांडवों तक को झुकाया — और भक्तों को फल दिया।
सच्चे भक्त को अनुशासन, धैर्य, न्याय और अंततः समृद्धि प्रदान करती है।
शनिवार को सर्वाधिक प्रभावशाली; परम्परा से चालीस दिन लगातार पढ़ी जाती है।
प्रायः सरसों का तेल अर्पित करने, दीपक जलाने और पीपल के वृक्ष को जल चढ़ाने के साथ की जाती है।
शनि चालीसा जप विधि
शनिवार को स्नान के बाद शनिदेव के समक्ष सरसों या तिल के तेल का दीपक जलाएँ (प्रायः पीपल के वृक्ष के नीचे या शनि मंदिर में)। काले तिल, सरसों का तेल और नीले/काले फूल अर्पित करें तथा विनम्रता से चालीसा का पाठ करें। शास्त्र चालीस दिन के अनुष्ठान की सलाह देता है। शनिवार को पीपल को जल चढ़ाना और ज़रूरतमंदों को भोजन देना इसकी कृपा को कई गुना बढ़ाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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