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सिंहासन बत्तीसी

राजा विक्रमादित्य के सिंहासन की बत्तीस कथाएँ

राजा भोज को विक्रमादित्य का प्राचीन सिंहासन मिलता है, जिसकी बत्तीस पुतलियाँ जीवित होकर विक्रमादित्य की उदारता, पराक्रम और न्याय की कथाएँ सुनाती हैं — और भोज से पूछती हैं कि क्या वे इस आसन के योग्य हैं।

🧒ब्राह्मण के बेटे की रक्षासिंहासन बत्तीसी — दूसरी पुतलीसच्चा राजा अपनी धरती के हर बच्चे को अपना मानता है और सबसे दुर्बल के लिए स्वयं को संकट में डाल देता है।💃अप्सराओं का नृत्यसिंहासन बत्तीसी — चौथी पुतलीसच्ची कुशलता शोर और दिखावा नहीं, ऐसा पूर्ण संतुलन है जिससे कुछ भी न डगमगाए — और सच्चा न्याय उसे तौलने का उपाय खोज ही लेता है।💎समुद्र के चार रत्नसिंहासन बत्तीसी — छठी पुतलीजो उदारता नाप-तौलकर हिचकिचाती है, वह केवल व्यापार है; सच्चे महान एक दिल तोड़ने के बजाय चारों रत्न दे देते हैं।🥭अमर फलसिंहासन बत्तीसी — पहली पुतलीसच्ची महानता सदा जीने में नहीं, बल्कि जीते-जी निःस्वार्थ भाव से देने में है।🙏देवी को अर्पणसिंहासन बत्तीसी — तीसरी पुतलीसबसे दुर्लभ भेंट वह निःस्वार्थ हृदय है जो न इनाम चाहता है, न नाम।🐄कामधेनु गायसिंहासन बत्तीसी — पाँचवीं पुतलीकर्तव्य पारिश्रमिक नहीं माँगता, और सबसे महान हाथ वे हैं जो स्वर्ग के उपहार सीधे ज़रूरतमंद तक पहुँचा देते हैं।

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