एक और शुभ दिन राजा भोज फिर उस अद्भुत सिंहासन की ओर बढ़े। तभी दूसरी पुतली सजीव होकर बोली, "इतनी जल्दी नहीं, राजन्! पहले सुनिए कि विक्रमादित्य ने एक रोते हुए अजनबी के लिए क्या किया था — फिर तय कीजिए कि यह आसन आपका है या नहीं।"
और उसने यह कथा सुनाई। एक शाम विक्रमादित्य के दरबार में एक बूढ़ा ब्राह्मण लड़खड़ाता हुआ आया। यात्रा से उसके कपड़े फटे थे और आँखें आँसुओं से लाल थीं। वह पुकार उठा, "न्याय, महाराज! काले पहाड़ पर रहने वाला एक राक्षस मेरे इकलौते बेटे को उठा ले गया है। मैं बूढ़ा हूँ, लड़ नहीं सकता, और कोई मेरी सहायता का साहस नहीं करता। इस संसार में मेरा बेटा ही मेरा सब कुछ है।" कुछ दरबारी फुसफुसाए कि कुछ नहीं हो सकता — पहाड़ दूर है, राक्षस भयानक है, और लड़का ठहरा एक ग़रीब का बेटा। पर विक्रमादित्य तुरंत उठ खड़े हुए। "मेरे राज्य का हर बच्चा मेरा अपना है," उन्होंने कहा। "आप यहीं विश्राम कीजिए, ब्राह्मण देवता। आपके बेटे को मैं स्वयं घर लाऊँगा।"
राजा तीन दिन अकेले घोड़े पर चले, काले पहाड़ पर चढ़े और राक्षस को ललकारा। राक्षस काली घटा-सा उठ खड़ा हुआ और गरजा, "कौन है जो मुझे छेड़ने की हिम्मत करता है? लड़का मेरा है!" विक्रमादित्य ने तलवार नहीं खींची। शांत स्वर में बोले, "लड़का अभी छोटा है, और उसका बूढ़ा पिता उसके बिना जी नहीं पाएगा। यदि तुम्हें बंदी चाहिए ही, तो मुझे रख लो। मैं राजा हूँ — कहीं बड़ा मोल — और अपनी इच्छा से उसके बदले स्वयं को सौंपता हूँ।"
राक्षस देखता रह गया। अपने लंबे जीवन में उसने हथियारों और जालों के साथ आते योद्धा तो बहुत देखे थे, पर किसी अजनबी के बच्चे के लिए अपना जीवन देने वाला कोई नहीं देखा था। उसका कठोर हृदय धूप में बर्फ़-सा पिघल गया। सिर झुकाकर वह बोला, "हे राजन्, वीरता तो मैंने बहुत देखी है, पर ऐसी दया कभी नहीं। लड़के को ले जाइए — और मेरा वचन भी कि यह पहाड़ अब कभी आपकी प्रजा को नहीं सताएगा।" विक्रमादित्य ने बेटा पिता को लौटा दिया, और उस बूढ़े ब्राह्मण का आशीर्वाद जीवन भर राजा के साथ चला।
फिर पुतली ने पूछा, "एक ग़रीब अजनबी के बेटे के लिए वे अकेले राक्षस की परछाईं में चले गए, हे भोज। क्या आप ऐसा कर सकते हैं? यदि हाँ, तो सिंहासन पर विराजिए।" और राजा भोज लंबी साँस भरकर फिर पीछे हट गए।