Mantra.Tips
🪈

श्रीमद्भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता — कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को कहा गया "भगवान का गीत" — 18 अध्यायों में 700 श्लोक। कर्तव्य, आत्मा, भक्ति और जीवन जीने की कला का परम मार्गदर्शक।

🌐 अपनी भाषा में पढ़ें

आज का श्लोक · गीता 7.9

पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ। जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु॥

पृथ्वी में पवित्र गन्ध हूँ और अग्नि में तेज हूँ; सम्पूर्ण भूतों में जीवन हूँ और तपस्वियों में मैं तप हूँ।।

यह श्लोक पढ़ें →

गीता का सार

अपना कर्तव्य पूरे मन से करो, पर उसके फल की आसक्ति छोड़ दो — क्योंकि अधिकार केवल कर्म में है, फल में कभी नहीं (2.47)।

किसी के लिए शोक मत करो: आत्मा न कभी जन्म लेती है न मरती है; वह पुराने शरीरों को वैसे ही त्याग देती है जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र — उसे न शस्त्र काट सकते हैं, न अग्नि जला सकती है, न जल भिगो सकता है, न वायु सुखा सकती है (2.22–23)।

जब-जब धर्म की हानि होती है, तब-तब भगवान सज्जनों की रक्षा और धर्म की पुनर्स्थापना के लिए पुनः अवतार लेते हैं (4.7–8)।

और सबसे बड़ा रहस्य: सब आश्रय छोड़कर केवल भगवान की शरण में आ जाओ, और सब पापों व शोक से मुक्त हो जाओ (18.66)।

गीता के प्रसिद्ध श्लोक

कर्मण्येवाधिकारस्ते

गीता 2.47

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।

कर्मयोग का सार — कर्म करो, पर फल की आसक्ति के बिना।

वासांसि जीर्णानि

गीता 2.22

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।

आत्मा शरीर बदलती है जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र बदलता है।

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि

गीता 2.23

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।

आत्मा अविनाशी है — न शस्त्र, न अग्नि, न जल, न वायु उसे हानि पहुँचा सकते।

यदा यदा हि धर्मस्य

गीता 4.7–8

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।

जब-जब धर्म की हानि होती है, मैं अवतार लेता हूँ — "सम्भवामि युगे युगे"।

सर्वधर्मान्परित्यज्य

गीता 18.66

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।

चरम श्लोक — केवल मेरी शरण में आओ, मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त कर दूँगा।

विषय अनुसार पढ़ें

विषय के अनुसार संकलित श्लोक — कर्म, आत्मा, भक्ति, शांति, मन और बहुत कुछ।

18 अध्याय

किसी भी अध्याय पर टैप करें और उसके सभी श्लोक संस्कृत में, लिप्यंतरण व अर्थ सहित पढ़ें।

1

अर्जुनविषाद योग

47 श्लोक

अर्जुन का विषाद — युद्धभूमि पर अर्जुन का शोक और धर्मसंकट।

2

साङ्ख्य योग

72 श्लोक

ज्ञान का योग — अमर आत्मा और बुद्धि का मार्ग।

3

कर्म योग

43 श्लोक

कर्म का योग — फल की आसक्ति के बिना निष्काम कर्म।

4

ज्ञानकर्मसंन्यास योग

42 श्लोक

ज्ञान, कर्म और संन्यास — अवतार और कर्म में ज्ञान।

5

कर्मसंन्यास योग

29 श्लोक

संन्यास का योग — कर्म का त्याग बनाम कर्म में त्याग।

6

ध्यान योग

47 श्लोक

ध्यान का योग — मन का नियंत्रण और ध्यान का मार्ग।

7

ज्ञानविज्ञान योग

30 श्लोक

ज्ञान और विज्ञान — ईश्वर को तत्त्व और विभूति रूप में जानना।

8

अक्षरब्रह्म योग

28 श्लोक

अविनाशी ब्रह्म — मृत्यु के समय आत्मा की गति।

9

राजविद्याराजगुह्य योग

34 श्लोक

राजविद्या — भक्ति का परम रहस्य।

10

विभूति योग

42 श्लोक

दिव्य विभूतियाँ — जो कुछ श्रेष्ठ है उसमें ईश्वर का तत्त्व।

11

विश्वरूपदर्शन योग

55 श्लोक

विराट रूप — श्रीकृष्ण अर्जुन को अपना विश्वरूप दिखाते हैं।

12

भक्ति योग

20 श्लोक

भक्ति का योग — प्रेममयी भक्ति सर्वोच्च मार्ग के रूप में।

13

क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभाग योग

35 श्लोक

क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ — शरीर, आत्मा और भीतर का ज्ञाता।

14

गुणत्रयविभाग योग

27 श्लोक

तीन गुण — सत्त्व, रजस् और तमस्, और इनसे ऊपर उठना।

15

पुरुषोत्तम योग

20 श्लोक

पुरुषोत्तम — नाशवान और अविनाशी से परे परम पुरुष।

16

दैवासुरसम्पद्विभाग योग

24 श्लोक

दैवी और आसुरी प्रकृति — मुक्त करने वाले और बाँधने वाले गुण।

17

श्रद्धात्रयविभाग योग

28 श्लोक

तीन प्रकार की श्रद्धा — गुणों के अनुसार श्रद्धा, आहार, यज्ञ और दान।

18

मोक्षसंन्यास योग

78 श्लोक

शरणागति द्वारा मोक्ष — निष्कर्ष: केवल मेरी शरण में आओ।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद् गीता क्या है?
भगवद् गीता ("भगवान का गीत") 700 श्लोकों वाला हिंदू धर्मग्रंथ है, जो महाभारत का अंग है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि पर योद्धा अर्जुन को उपदेश देते हैं। 18 अध्यायों में यह निष्काम कर्म (कर्मयोग), ज्ञान (ज्ञानयोग) और भक्ति (भक्तियोग) के मार्ग, तथा आत्मा, ईश्वर और धर्म के स्वरूप का बोध कराती है।
भगवद् गीता में कितने अध्याय और श्लोक हैं?
भगवद् गीता में 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। ये अध्याय छह-छह के तीन भागों में बँटे हैं, जो मोटे तौर पर कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग का वर्णन करते हैं।
भगवद् गीता का मुख्य सार (गीता सार) क्या है?
इसका सार है: फल की आसक्ति छोड़कर अपना कर्तव्य करो (गीता 2.47), क्योंकि आत्मा शाश्वत है और कभी नहीं मरती (2.20–23); जब-जब धर्म की हानि होती है ईश्वर अवतार लेते हैं (4.7–8); और सर्वोच्च मार्ग है पूर्ण रूप से ईश्वर की शरण में जाना (18.66)। निष्काम भाव से कर्म करो, सुख-दुःख में समान रहो, और ईश्वर की शरण लो।
भगवद् गीता किसने और किससे कही?
भगवद् गीता भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध से ठीक पहले कुरुक्षेत्र की भूमि पर योद्धा-राजकुमार अर्जुन से कही, जब अर्जुन शोक और मोह से ग्रस्त थे। इसे महर्षि वेदव्यास ने लिपिबद्ध किया।
भगवद् गीता के सबसे प्रसिद्ध श्लोक कौन से हैं?
सर्वाधिक प्रिय श्लोकों में हैं — निष्काम कर्म पर "कर्मण्येवाधिकारस्ते" (2.47), अमर आत्मा पर "वासांसि जीर्णानि" (2.22) और "नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि" (2.23), अवतार पर "यदा यदा हि धर्मस्य" (4.7–8), और शरणागति पर "सर्वधर्मान् परित्यज्य" (18.66)।