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नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि

🕉️ hindu·📿 1× जप·🕐 प्रतिदिन; शोक, मृत्यु-भय, या वियोग के समय·🎵 ऑडियो सहित·📜 Bhagavad Gita, Chapter 2, Verse 23

अन्य नाम / खोज: nainam chhindanti shastrani nainam dahati pavakah

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अर्थ

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि भगवद्गीता (2.23) का श्लोक है, जिसमें श्रीकृष्ण आत्मा के अमर और अविनाशी स्वरूप का उपदेश देते हैं। आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न अग्नि जला सकती है, न जल भिगो सकता है, न वायु सुखा सकती है। इसे मृत्यु, शोक और हानि के समय निर्भयता और शांति के लिए पढ़ा जाता है।

उत्पत्ति और कथा

Bhagavad Gita, Chapter 2, Verse 23 · Veda Vyasa (Lord Krishna's teaching) · Itihasa (Mahabharata)

जब अर्जुन कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र पर मृत्यु की संभावना से शोकग्रस्त हुए, तब भगवान श्रीकृष्ण ने शाश्वत आत्मा का सत्य प्रकट किया: कि आत्मा न कभी जन्म लेती है, न कभी मरती है, और किसी भी तत्व से उसकी हानि नहीं हो सकती। यह श्लोक, अपने सहयोगी 2.22 के साथ, अमर आत्मा पर गीता के सबसे प्रकाशमान उपदेशों में से है।

शास्त्रों में वर्णित

इस श्लोक ने श्मशान-भूमि और रुग्ण-शय्या पर असंख्य हृदयों को सांत्वना दी है — स्वयं भगवान का यह आश्वासन कि हम वास्तव में जो हैं, उसका कभी नाश नहीं हो सकता; इसे जानना ही समस्त भयों में सबसे गहरे, मृत्यु के भय से मुक्त होना है।

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मंत्र

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नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः चैनं क्लेदयन्त्यापो शोषयति मारुतः

Nainam chhindanti shastrani nainam dahati pavakah Na chainam kledayantyapo na shoshayati marutah

अर्थ:आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न अग्नि जला सकती है; न जल भिगो सकता है, न वायु सुखा सकती है।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

न एनं छिन्दन्ति शस्त्राणि🔊Na enam chhindanti shastraniशस्त्र इस (आत्मा) को काट नहीं सकते
न एनं दहति पावकः🔊Na enam dahati pavakahअग्नि इसे जला नहीं सकती
न च एनं क्लेदयन्ति आपः🔊Na cha enam kledayanti apahजल इसे भिगो नहीं सकता
न शोषयति मारुतः🔊Na shoshayati marutahवायु इसे सुखा नहीं सकती

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि पाठ के लाभ

भगवद्गीता (2.23) से, आत्मा के अमर, अविनाशी स्वरूप पर श्रीकृष्ण का उपदेश।

मृत्यु, शोक और हानि के समक्ष निर्भयता के लिए पढ़ा जाता है — आत्मा शाश्वत है और किसी भी वस्तु से अछूती रहती है।

गहरी शांति और साहस लाता है, मृत्यु के भय को विलीन करता है; प्रायः अंत्येष्टि और शोक के समय पढ़ा जाता है।

अमर आत्मा पर वेदांत का एक आधारभूत श्लोक, आत्मज्ञान के साधकों द्वारा चिंतन किया जाता है।

भगवद्गीता के साथ अध्ययन किया जाता है और सांत्वना तथा आध्यात्मिक बल के लिए पढ़ा जाता है।

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि जप विधि

जप संख्या1बार
उत्तम समयप्रतिदिन; शोक, मृत्यु-भय, या वियोग के समय
दिशाEast or facing Krishna

धीरे-धीरे पढ़ें, यह चिंतन करते हुए कि आपका वास्तविक स्वरूप वह अमर आत्मा है जिसे न कोई शस्त्र, न अग्नि, न जल, न वायु हानि पहुँचा सकती है। इसे साहस और शांति के लिए, तथा हानि के समय सांत्वना के रूप में पढ़ा जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 2.23 से: 'आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, जल भिगो नहीं सकता, और वायु सुखा नहीं सकती।' श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि आत्मा शाश्वत और अविनाशी है, समस्त हानि से परे।
यह भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय (सांख्य योग) का तेईसवाँ श्लोक है, जहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन के मृत्यु-भय को सांत्वना देने के लिए आत्मा के अमर, अपरिवर्तनीय स्वरूप की व्याख्या करते हैं।
क्योंकि यह सिखाता है कि आत्मा कभी नहीं मरती — इसे काटा, जलाया, भिगोया या सुखाया नहीं जा सकता। इसे अंत्येष्टि और शोक में पढ़ने से यह सांत्वना मिलती है कि दिवंगत आत्मा शाश्वत और अछूती है, और मृत्यु का भय विलीन होता है।

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