Mantra.Tips
krishnaaartidevotionworship

आरती कुंजबिहारी की

🕉️ hindu·📿 1× जप·🕐 सायंकाल, विशेषकर सन्ध्या आरती के समय; जन्माष्टमी और एकादशी पर भी·🎵 ऑडियो सहित·📜 Braj bhakti tradition, Vrindavan

अन्य नाम / खोज: aarti kunj bihari ki · shri banke bihari teri aarti

Share:

अर्थ

'आरती कुंजबिहारी की' भगवान कृष्ण की सबसे प्रिय आरतियों में से एक है, जो वृन्दावन के बाँके बिहारी की महिमा गाती है। यह कृष्ण के सुन्दर स्वरूप — मोर मुकुट, मुरली, श्याम वर्ण और कस्तूरी तिलक — का सजीव वर्णन करती है। इसे गाने से घर दिव्य प्रेम से भर जाता है और मोह तथा दुःख दूर होते हैं।

उत्पत्ति और कथा

Braj bhakti tradition, Vrindavan · Unknown (folk composition from Braj region) · Medieval period, likely 16th-17th century

यह आरती ब्रज क्षेत्र की समृद्ध भक्ति संस्कृति से उत्पन्न हुई — कृष्ण के बचपन की भूमि। वृन्दावन के मन्दिरों, विशेषकर प्रसिद्ध बाँके बिहारी मन्दिर ने, सदियों से यह आरती गाई है। 'कुंजबिहारी' शब्द स्वयं बाँके बिहारी मन्दिर के देवता का नाम है, जिसकी स्थापना तानसेन के गुरु स्वामी हरिदास ने की थी। यह आरती कृष्ण का सजीव चित्र खींचती है — मोर मुकुट, मुरली, श्याम वर्ण और कस्तूरी तिलक — भक्त को प्रभु के समस्त सौन्दर्य में ध्यान करने का आमन्त्रण देती हुई।

शास्त्रों में वर्णित

वृन्दावन का बाँके बिहारी मन्दिर, जहाँ से यह आरती उत्पन्न होती है, अपने चमत्कारी विग्रह के लिए प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि कुंजबिहारी की मूर्ति 16वीं शताब्दी में स्वामी हरिदास के भक्ति-गायन के दौरान स्वयं प्रकट हुई। देवता की दृष्टि इतनी प्रबल मानी जाती है कि मूर्ति के सामने का परदा बार-बार खोला और बन्द किया जाता है — भक्तों का विश्वास है कि देवता से दीर्घ नेत्र-सम्पर्क करने से व्यक्ति दिव्य आनन्द में मूर्च्छित हो सकता है। असंख्य भक्त आरती के समय देवता के दर्शन पर प्रेम और आनन्द की प्रबल लहर अनुभव करने की बात करते हैं।

सुनें और साथ में जपें

सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित

किसी भी पंक्ति या ▶ बटन पर टैप कर सुनें

श्लोक 1

आरती कुंजबिहारी की। श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥

Aarti Kunj Bihari Ki Shri Giridhar Krishna Murari Ki

अर्थ:कुंजबिहारी की आरती करो — जो वृन्दावन के कुंजों में विचरते हैं। श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।

श्लोक 2

गले में बैजंती माला। बजावै मुरली मधुर बाला॥ श्रवण में कुण्डल झलकाला। नंद के आनंद नंदलाला॥ गगन सम अंग कांति काली। राधिका चमक रही आली॥ लतन में ठाढ़े बनमाली। भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक लाली॥

Gale Mein Baijanti Mala Bajaave Murali Madhur Bala Shravan Mein Kundal Jhalakala Nand Ke Aanand Nandlala Gagan Sam Ang Kanti Kali Radhika Chamak Rahi Aali Latan Mein Thaade Banmali Bhramar Si Alak, Kasturi Tilak Lali

अर्थ:उनके गले में बैजंती फूलों की माला झूलती है। सुन्दर बालक मधुर मुरली बजाते हैं। कानों में कुण्डल झिलमिलाते हैं। वे नन्द के आनन्द नन्दलाल हैं। उनका शरीर आकाश सा श्याम चमकता है। उनके पास राधिका शोभायमान हैं, हे सखी। वनफूलों की माला धारी लताओं के बीच खड़े हैं। उनकी अलकें भ्रमर सी हैं, कस्तूरी तिलक और लाल अधर सहित।

श्लोक 3

आरती कुंजबिहारी की। श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥

Aarti Kunj Bihari Ki Shri Giridhar Krishna Murari Ki

अर्थ:कुंजबिहारी की आरती करो — श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।

श्लोक 4

कनकमय मोर मुकुट बिलसै। देवता दरसन को तरसें॥ गगन सों सुमन रासि बरसै। हाथन में वेणु बिराजै॥ भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक लाली॥

Kanakmay Mor Mukut Bilasai Devata Darsan Ko Tarsein Gagan Son Suman Rasi Barsai Hathan Mein Venu Birajai Bhramar Si Alak, Kasturi Tilak Lali

अर्थ:सिर पर स्वर्णिम मोर मुकुट सुशोभित है। देवता भी उनके दर्शन को तरसते हैं। आकाश से पुष्पों की वर्षा होती है। उनके हाथों में मुरली सुशोभित है। उनकी अलकें भ्रमर सी हैं, कस्तूरी तिलक और लाल अधर सहित।

श्लोक 5

आरती कुंजबिहारी की। श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥

Aarti Kunj Bihari Ki Shri Giridhar Krishna Murari Ki

अर्थ:कुंजबिहारी की आरती करो — श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।

श्लोक 6

छप्पन भोग छत्तीस व्यंजन। सुरपतिन को भी मन भावन॥ चौंसठ योगिनी नाचत गगन। छिन छिन भोग लगावत सखन॥ भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक लाली॥

Chhappan Bhog Chhattis Vyanjan Surpatin Ko Bhi Man Bhavan Chaunsath Yogini Nachat Gagan Chhin Chhin Bhog Lagavat Sakhan Bhramar Si Alak, Kasturi Tilak Lali

अर्थ:छप्पन भोग और छत्तीस व्यंजन — देवराज इन्द्र को भी मनभावन। चौंसठ योगिनियाँ आकाश में नृत्य करती हैं। क्षण-क्षण सखाजन उन्हें भोग अर्पित करते हैं। उनकी अलकें भ्रमर सी हैं, कस्तूरी तिलक और लाल अधर सहित।

श्लोक 7

आरती कुंजबिहारी की। श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥

Aarti Kunj Bihari Ki Shri Giridhar Krishna Murari Ki

अर्थ:कुंजबिहारी की आरती करो — श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।

श्लोक 8

जहां ते प्रकट भई गंगा। सकल मन हारिणि श्री गंगा॥ स्मरण ते होत मोह भंगा। बसी मेरे नंदलाल के संगा॥ भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक लाली॥

Jahan Te Prakat Bhai Ganga Sakal Man Harini Shri Ganga Smaran Te Hot Moh Bhanga Basi Mere Nandlal Ke Sanga Bhramar Si Alak, Kasturi Tilak Lali

अर्थ:जिनके चरणों से पवित्र गंगा प्रकट हुई — सकल मन को हरने वाली श्री गंगा। उनके स्मरण से सांसारिक मोह नष्ट हो जाता है। वह सदा मेरे नन्दलाल के संग बसी रहती है। उनकी अलकें भ्रमर सी हैं, कस्तूरी तिलक और लाल अधर सहित।

श्लोक 9

आरती कुंजबिहारी की। श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥

Aarti Kunj Bihari Ki Shri Giridhar Krishna Murari Ki

अर्थ:कुंजबिहारी की आरती करो — श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

कुंजबिहारी🔊Kunj Bihariवृन्दावन के कुंजों में विचरने वाले
गिरिधर🔊Giridharपर्वत (गोवर्धन) धारण करने वाले
मुरारी🔊Murariमुर दैत्य का वध करने वाले; कृष्ण का नाम
बैजंती माला🔊Baijanti Malaपाँच रंगों के फूलों की माला
मुरली🔊Muraliबाँसुरी
कुण्डल🔊Kundalकुण्डल (कान के आभूषण)
नंदलाला🔊Nandlalaनन्द के प्रिय पुत्र
राधिका🔊Radhikaराधा, कृष्ण की दिव्य प्रिया
बनमाली🔊Banmaliवनफूलों की माला धारण करने वाले
कस्तूरी तिलक🔊Kasturi Tilakमाथे पर कस्तूरी सुगन्धित तिलक
मोर मुकुट🔊Mor Mukutमोरपंख का मुकुट
सुमन🔊Sumanफूल
वेणु🔊Venuवेणु, बाँस की बाँसुरी
छप्पन भोग🔊Chhappan Bhog56 प्रकार के भोग
योगिनी🔊Yoginiदिव्य देवांगनाएँ (योगिनियाँ)
गंगा🔊Gangaपवित्र गंगा नदी
मोह भंगा🔊Moh Bhangaसांसारिक मोह का नाश
भ्रमर🔊Bhramarभ्रमर (काली अलकों का रूपक)

आरती कुंजबिहारी की पाठ के लाभ

इस आरती को गाने से कृष्ण की कृपा का आह्वान होता है और घर दिव्य प्रेम से भर जाता है

मोह, दुःख और सांसारिक भ्रम (मोह) को दूर करती है

कृष्ण के सुन्दर स्वरूप के स्मरण से मन में शान्ति और आनन्द लाती है

परम्परागत रूप से भारत भर के कृष्ण मन्दिरों में प्रतिदिन सायंकाल गाई जाती है

भक्ति को सुदृढ़ करती है और परमात्मा से सम्बन्ध को गहरा करती है

एक पवित्र वातावरण बनाती है जो परिवेश को शुद्ध करता है

कहा जाता है कि यह राधा और कृष्ण दोनों का आशीर्वाद एक साथ आकर्षित करती है

आरती कुंजबिहारी की जप विधि

जप संख्या1बार
उत्तम समयसायंकाल, विशेषकर सन्ध्या आरती के समय; जन्माष्टमी और एकादशी पर भी

एक थाली में दीप या कपूर जलाएँ। कृष्ण की प्रतिमा या चित्र के सामने खड़े हों। आरती गाते हुए जलती थाली को धीरे-धीरे देवता के सम्मुख दक्षिणावर्त घुमाएँ। हो सके तो दूसरे हाथ से घण्टी बजाएँ। अन्त में सभी उपस्थित जनों को ज्योति अर्पित करें। यह आरती जन्माष्टमी के उत्सव में मध्यरात्रि को भी गाई जा सकती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह आरती एक प्रिय लोक-भक्ति रचना है। इसके रचयिता का ठीक-ठीक पता नहीं है, यद्यपि यह वृन्दावन की ब्रज भक्ति परम्परा में रची-बसी है और सदियों से गाई जाती रही है।
आदर्श रूप से सायंकालीन सन्ध्या आरती के समय, यद्यपि इसे कभी भी गाया जा सकता है। जन्माष्टमी, एकादशी, बुधवार और शुक्रवार को यह विशेष रूप से शुभ है।
कुंजबिहारी का अर्थ है 'कुंजों (वनों) में विचरण करने वाला' — जो राधा और गोपियों के साथ वृन्दावन के वन-कुंजों में कृष्ण की दिव्य लीला को इंगित करता है।
बिल्कुल। यह हिन्दू घरों में सबसे अधिक गाई जाने वाली आरतियों में से एक है। बस एक दीप जलाएँ, उसे कृष्ण की प्रतिमा के सामने रखें और भक्ति के साथ गाएँ।
छप्पन भोग का अर्थ है कृष्ण को अर्पित किए जाने वाले 56 प्रकार के भोजन। परम्परा के अनुसार, जब बाल कृष्ण ने सात दिन तक गोवर्धन पर्वत उठाया, तो गोपियों ने उन्हें सात दिन तक दिन में आठ बार भोजन कराया (8×7=56), इसी से यह परम्परा बनी।

ये भी पढ़ें

उपयोगी लगा? अपनों के साथ साझा करें 🙏

Share:

Explore more sacred mantras with complete meaning and chanting guides