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आरती कुंजबिहारी की Meaning — Line by Line

आरती कुंजबिहारी की

Every verse and every word explained in English & Hindi

Meaning — Line by Line

Every verse of आरती कुंजबिहारी की with its Hindi meaning. Tap any word to hear it, or ▶ to recite the verse.

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  1. Verse 1. Aarti Kunj Bihari Ki
  2. Verse 2. Gale Mein Baijanti Mala
  3. Verse 3. Aarti Kunj Bihari Ki
  4. Verse 4. Kanakmay Mor Mukut Bilasai
  5. Verse 5. Aarti Kunj Bihari Ki
  6. Verse 6. Chhappan Bhog Chhattis Vyanjan
  7. Verse 7. Aarti Kunj Bihari Ki
  8. Verse 8. Jahan Te Prakat Bhai Ganga
  9. Verse 9. Aarti Kunj Bihari Ki
Verse 1#

Aarti Kunj Bihari Ki

आरती कुंजबिहारी की। श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥

Aarti Kunj Bihari Ki Shri Giridhar Krishna Murari Ki

Meaningकुंजबिहारी की आरती करो — जो वृन्दावन के कुंजों में विचरते हैं। श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।

Verse 2#

Gale Mein Baijanti Mala

गले में बैजंती माला। बजावै मुरली मधुर बाला॥ श्रवण में कुण्डल झलकाला। नंद के आनंद नंदलाला॥ गगन सम अंग कांति काली। राधिका चमक रही आली॥ लतन में ठाढ़े बनमाली। भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक लाली॥

Gale Mein Baijanti Mala Bajaave Murali Madhur Bala Shravan Mein Kundal Jhalakala Nand Ke Aanand Nandlala Gagan Sam Ang Kanti Kali Radhika Chamak Rahi Aali Latan Mein Thaade Banmali Bhramar Si Alak, Kasturi Tilak Lali

Meaningउनके गले में बैजंती फूलों की माला झूलती है। सुन्दर बालक मधुर मुरली बजाते हैं। कानों में कुण्डल झिलमिलाते हैं। वे नन्द के आनन्द नन्दलाल हैं। उनका शरीर आकाश सा श्याम चमकता है। उनके पास राधिका शोभायमान हैं, हे सखी। वनफूलों की माला धारी लताओं के बीच खड़े हैं। उनकी अलकें भ्रमर सी हैं, कस्तूरी तिलक और लाल अधर सहित।

Verse 3#

Aarti Kunj Bihari Ki

आरती कुंजबिहारी की। श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥

Aarti Kunj Bihari Ki Shri Giridhar Krishna Murari Ki

Meaningकुंजबिहारी की आरती करो — श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।

Verse 4#

Kanakmay Mor Mukut Bilasai

कनकमय मोर मुकुट बिलसै। देवता दरसन को तरसें॥ गगन सों सुमन रासि बरसै। हाथन में वेणु बिराजै॥ भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक लाली॥

Kanakmay Mor Mukut Bilasai Devata Darsan Ko Tarsein Gagan Son Suman Rasi Barsai Hathan Mein Venu Birajai Bhramar Si Alak, Kasturi Tilak Lali

Meaningसिर पर स्वर्णिम मोर मुकुट सुशोभित है। देवता भी उनके दर्शन को तरसते हैं। आकाश से पुष्पों की वर्षा होती है। उनके हाथों में मुरली सुशोभित है। उनकी अलकें भ्रमर सी हैं, कस्तूरी तिलक और लाल अधर सहित।

Verse 5#

Aarti Kunj Bihari Ki

आरती कुंजबिहारी की। श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥

Aarti Kunj Bihari Ki Shri Giridhar Krishna Murari Ki

Meaningकुंजबिहारी की आरती करो — श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।

Verse 6#

Chhappan Bhog Chhattis Vyanjan

छप्पन भोग छत्तीस व्यंजन। सुरपतिन को भी मन भावन॥ चौंसठ योगिनी नाचत गगन। छिन छिन भोग लगावत सखन॥ भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक लाली॥

Chhappan Bhog Chhattis Vyanjan Surpatin Ko Bhi Man Bhavan Chaunsath Yogini Nachat Gagan Chhin Chhin Bhog Lagavat Sakhan Bhramar Si Alak, Kasturi Tilak Lali

Meaningछप्पन भोग और छत्तीस व्यंजन — देवराज इन्द्र को भी मनभावन। चौंसठ योगिनियाँ आकाश में नृत्य करती हैं। क्षण-क्षण सखाजन उन्हें भोग अर्पित करते हैं। उनकी अलकें भ्रमर सी हैं, कस्तूरी तिलक और लाल अधर सहित।

Verse 7#

Aarti Kunj Bihari Ki

आरती कुंजबिहारी की। श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥

Aarti Kunj Bihari Ki Shri Giridhar Krishna Murari Ki

Meaningकुंजबिहारी की आरती करो — श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।

Verse 8#

Jahan Te Prakat Bhai Ganga

जहां ते प्रकट भई गंगा। सकल मन हारिणि श्री गंगा॥ स्मरण ते होत मोह भंगा। बसी मेरे नंदलाल के संगा॥ भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक लाली॥

Jahan Te Prakat Bhai Ganga Sakal Man Harini Shri Ganga Smaran Te Hot Moh Bhanga Basi Mere Nandlal Ke Sanga Bhramar Si Alak, Kasturi Tilak Lali

Meaningजिनके चरणों से पवित्र गंगा प्रकट हुई — सकल मन को हरने वाली श्री गंगा। उनके स्मरण से सांसारिक मोह नष्ट हो जाता है। वह सदा मेरे नन्दलाल के संग बसी रहती है। उनकी अलकें भ्रमर सी हैं, कस्तूरी तिलक और लाल अधर सहित।

Verse 9#

Aarti Kunj Bihari Ki

आरती कुंजबिहारी की। श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥

Aarti Kunj Bihari Ki Shri Giridhar Krishna Murari Ki

Meaningकुंजबिहारी की आरती करो — श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।

Word-by-Word Breakdown

कुंजबिहारी
Kunj Bihari
वृन्दावन के कुंजों में विचरने वाले
गिरिधर
Giridhar
पर्वत (गोवर्धन) धारण करने वाले
मुरारी
Murari
मुर दैत्य का वध करने वाले; कृष्ण का नाम
बैजंती माला
Baijanti Mala
पाँच रंगों के फूलों की माला
मुरली
Murali
बाँसुरी
कुण्डल
Kundal
कुण्डल (कान के आभूषण)
नंदलाला
Nandlala
नन्द के प्रिय पुत्र
राधिका
Radhika
राधा, कृष्ण की दिव्य प्रिया
बनमाली
Banmali
वनफूलों की माला धारण करने वाले
कस्तूरी तिलक
Kasturi Tilak
माथे पर कस्तूरी सुगन्धित तिलक
मोर मुकुट
Mor Mukut
मोरपंख का मुकुट
सुमन
Suman
फूल
वेणु
Venu
वेणु, बाँस की बाँसुरी
छप्पन भोग
Chhappan Bhog
56 प्रकार के भोग
योगिनी
Yogini
दिव्य देवांगनाएँ (योगिनियाँ)
गंगा
Ganga
पवित्र गंगा नदी
मोह भंगा
Moh Bhanga
सांसारिक मोह का नाश
भ्रमर
Bhramar
भ्रमर (काली अलकों का रूपक)

Origin & History

Source: Braj bhakti tradition, Vrindavan

Author: Unknown (folk composition from Braj region)

Period: Medieval period, likely 16th-17th century

यह आरती ब्रज क्षेत्र की समृद्ध भक्ति संस्कृति से उत्पन्न हुई — कृष्ण के बचपन की भूमि। वृन्दावन के मन्दिरों, विशेषकर प्रसिद्ध बाँके बिहारी मन्दिर ने, सदियों से यह आरती गाई है। 'कुंजबिहारी' शब्द स्वयं बाँके बिहारी मन्दिर के देवता का नाम है, जिसकी स्थापना तानसेन के गुरु स्वामी हरिदास ने की थी। यह आरती कृष्ण का सजीव चित्र खींचती है — मोर मुकुट, मुरली, श्याम वर्ण और कस्तूरी तिलक — भक्त को प्रभु के समस्त सौन्दर्य में ध्यान करने का आमन्त्रण देती हुई।

Frequently Asked Questions

आरती कुंजबिहारी की किसने लिखी?
यह आरती एक प्रिय लोक-भक्ति रचना है। इसके रचयिता का ठीक-ठीक पता नहीं है, यद्यपि यह वृन्दावन की ब्रज भक्ति परम्परा में रची-बसी है और सदियों से गाई जाती रही है।
कृष्ण आरती कब की जानी चाहिए?
आदर्श रूप से सायंकालीन सन्ध्या आरती के समय, यद्यपि इसे कभी भी गाया जा सकता है। जन्माष्टमी, एकादशी, बुधवार और शुक्रवार को यह विशेष रूप से शुभ है।
कुंजबिहारी का क्या अर्थ है?
कुंजबिहारी का अर्थ है 'कुंजों (वनों) में विचरण करने वाला' — जो राधा और गोपियों के साथ वृन्दावन के वन-कुंजों में कृष्ण की दिव्य लीला को इंगित करता है।
क्या यह आरती घर पर गाई जा सकती है?
बिल्कुल। यह हिन्दू घरों में सबसे अधिक गाई जाने वाली आरतियों में से एक है। बस एक दीप जलाएँ, उसे कृष्ण की प्रतिमा के सामने रखें और भक्ति के साथ गाएँ।
छप्पन भोग (56 भोग) का क्या महत्त्व है?
छप्पन भोग का अर्थ है कृष्ण को अर्पित किए जाने वाले 56 प्रकार के भोजन। परम्परा के अनुसार, जब बाल कृष्ण ने सात दिन तक गोवर्धन पर्वत उठाया, तो गोपियों ने उन्हें सात दिन तक दिन में आठ बार भोजन कराया (8×7=56), इसी से यह परम्परा बनी।

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