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सुंदरकांड (श्रीरामचरितमानस)

तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस का पाँचवाँ कांड — हनुमान जी का लंका-गमन, सीता-खोज और लंका दहन की कथा। साहस, सफलता और विघ्न-नाश के लिए सर्वाधिक प्रिय पाठ। नीचे सम्पूर्ण अवधी पाठ अर्थ सहित पढ़ें; किसी भी पंक्ति को सुनने के लिए टैप करें।

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दोहा सूची

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सम्पूर्ण सुंदरकांड पाठ

दोहा 1
Chaupāī

जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥ तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई॥ जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥ यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥ सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर॥ बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी॥ जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥ जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना॥ जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रमहारी॥

Dohā

हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम। राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥1॥

अर्थजाम्बवान के सुहावने वचन सुनकर हनुमान जी अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले — "भाइयो! जब तक मैं सीता जी को देखकर लौट न आऊँ, तब तक तुम कंद-मूल-फल खाकर दुख सहते हुए मेरी प्रतीक्षा करना; कार्य अवश्य सिद्ध होगा और मुझे विशेष हर्ष होगा।" सबको प्रणाम कर और श्रीरघुनाथ को हृदय में धारण कर वे हर्षित होकर चल पड़े। समुद्र-तट पर एक सुंदर पर्वत था; खेल ही खेल में कूदकर वे उस पर चढ़ गए, और बार-बार श्रीराम का स्मरण कर पवनपुत्र ने महान् बल से छलाँग लगाई। उन्होंने जिस पर्वत पर पैर रखा वह तुरंत पाताल में धँस गया — जैसे रघुपति का अमोघ बाण चलता है, वैसे ही हनुमान जी चले। समुद्र ने उन्हें रामदूत जानकर मैनाक से कहा कि वह उनकी थकान दूर करे; पर हनुमान जी ने उसे केवल हाथ से छूकर प्रणाम किया — "राम का कार्य किए बिना मुझे विश्राम कहाँ?"
दोहा 2
Chaupāī

जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा॥ सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता॥ आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा॥ राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं॥ तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई॥ कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि मोहि कहेउ हनुमाना॥ जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा॥ सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ॥ जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा॥ सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥ बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा॥ मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मै पावा॥

Dohā

राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान। आसिष देह गई सो हरषि चलेउ हनुमान॥2॥

अर्थदेवताओं ने पवनपुत्र को जाते देखा और उनके विशेष बल-बुद्धि को परखने के लिए सर्पों की माता सुरसा को भेजा। उसने आकर कहा — "आज देवताओं ने मुझे आहार दिया है।" यह सुनकर पवनकुमार बोले — "मैं राम का कार्य करके और प्रभु को सीता जी का समाचार सुनाकर लौट आऊँ, तब तुम्हारे मुख में प्रवेश करूँगा; सत्य कहता हूँ, हे माता! मुझे जाने दे।" जब किसी उपाय से उसने जाने न दिया, तब वे बोले — "तो मुझे निगल ले।" उसने एक योजन मुख फैलाया; कपि ने शरीर दुगुना कर लिया। उसने सोलह योजन का किया; वे तुरंत बत्तीस योजन के हो गए। ज्यों-ज्यों सुरसा मुख बढ़ाती, त्यों-त्यों कपि दुगना रूप दिखाते; उसने सौ योजन मुख किया, तब उन्होंने अत्यंत छोटा रूप धरकर मुख में घुसकर फिर बाहर आ गए और सिर नवाकर विदा माँगी। (सुरसा बोली —) "जिसके लिए देवताओं ने मुझे भेजा था, तुम्हारी बुद्धि-बल का वह मर्म मैंने पा लिया। तुम राम का सब कार्य पूर्ण करोगे, क्योंकि तुम बल-बुद्धि के निधान हो।" यह आशीर्वाद देकर वह चली गई और हनुमान जी हर्षित होकर आगे बढ़े।
दोहा 3
Chaupāī

निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई॥ जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं॥ गहइ छाहँ सक सो उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई॥ सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा॥ ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा॥ तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा॥ नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए॥ सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढेउ भय त्यागें॥ उमा कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई॥ गिरि पर चढि लंका तेहिं देखी। कहि जाइ अति दुर्ग बिसेषी॥ अति उतंग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा॥

Chhanda

कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना। चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना॥ गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै॥ बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै॥ बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं। नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं॥ कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं। नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीं॥ करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं। कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं॥ एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही। रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही॥

Dohā

पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार। अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार॥3॥

अर्थसमुद्र में एक राक्षसी रहती थी जो माया से आकाश के पक्षियों को पकड़ लेती थी: जो जीव आकाश में उड़ते, उनकी परछाईं जल में देखकर वह छाया को पकड़ लेती, जिससे वे उड़ न पाते — इस प्रकार वह सदा आकाशचारियों को खा जाती थी। उसने वही छल हनुमान जी पर किया, पर कपि ने तुरंत उसका कपट पहचान लिया, उसे मारकर वे धीरबुद्धि समुद्र के पार चले गए। वहाँ उन्होंने वन की शोभा देखी — मधु के लोभ से गुंजार करते भौंरे, फल-फूल से सुहावने अनेक वृक्ष, मन को भाते पक्षी-मृगों के झुंड। आगे एक विशाल पर्वत देखकर वे भय त्यागकर दौड़कर उस पर चढ़ गए। (शिव कहते हैं — हे उमा! इसमें कपि की कोई बड़ाई नहीं, यह तो प्रभु का प्रताप है जो काल को भी खा जाता है।) पर्वत से उन्होंने लंका देखी — अत्यंत ऊँचा, वर्णन से परे दुर्ग, चारों ओर समुद्र, और परम प्रकाशमान सोने का परकोटा। वह स्वर्ण-परकोटा विचित्र मणियों से जड़ा और सुंदर भवनों से घना था; चौहट्टे, हाट, सुंदर बाज़ार और मनोहर गलियाँ नगर को अनेक प्रकार से सजा रही थीं। हाथी, घोड़े, खच्चर, पैदल और रथों के समूह अगणित थे; अनेक रूपों वाली अत्यंत बलवान् राक्षस-सेना का वर्णन नहीं बनता। वन, बाग, उपवन, वाटिकाएँ, सरोवर, कुएँ और बावलियाँ सुशोभित थीं; मनुष्य, नाग, देव और गंधर्वों की कन्याएँ मुनियों के मन को भी मोह लेती थीं। कहीं पर्वत-समान विशाल देहवाले मल्ल गरजते और अनेक अखाड़ों में एक-दूसरे को ललकारते भिड़ते थे; करोड़ों विकट योद्धा नगर की चारों ओर रक्षा करते थे; और दुष्ट निशाचर भैंसे, मनुष्य, गाय, गधे और बकरे खा जाते थे। (तुलसीदास कहते हैं — इसी से इनकी थोड़ी-सी कथा कही है, क्योंकि ये रघुवीर के बाण रूपी तीर्थ में शरीर त्यागकर सद्गति पाएँगे।) नगर के बहुत-से रखवाले देखकर कपि ने विचार किया — "मैं अत्यंत छोटा रूप धरकर रात में नगर में प्रवेश करूँ।"
दोहा 4
Chaupāī

मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥ नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥ जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा॥ मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी॥ पुनि संभारि उठि सो लंका। जोरि पानि कर बिनय संसका॥ जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा॥ बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे॥ तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता॥

Dohā

तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग। तूल ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥4॥

अर्थमच्छर के समान रूप धरकर और श्रीराम का स्मरण कर कपि लंका की ओर चले। लंकिनी नामक एक राक्षसी (बोली) — "मेरा निरादर कर यह कौन जा रहा है? रे मूढ़! तू मेरा मर्म नहीं जानता — जो (चोरी से जाता) है वह मेरा आहार है।" महाकपि ने उसे एक घूँसा मारा; वह रक्त वमन करती हुई धरती पर लोट गई। फिर सँभलकर उठी और हाथ जोड़कर डरते हुए विनय से बोली — "जब ब्रह्मा ने रावण को वर दिया था, तब चलते समय विधाता ने मुझे यह संकेत बताया था — 'जब तू कपि के मारे व्याकुल हो, तब निशाचरों का संहार जानना।' हे तात! मेरा बड़ा पुण्य है कि मैंने नेत्रों से राम के दूत के दर्शन किए। हे पुत्र! स्वर्ग और मोक्ष के समस्त सुख तराज़ू के एक पलड़े पर रख दें, तो भी वे सत्संग के एक क्षण के सुख की तुलना नहीं कर सकते।"
दोहा 5
Chaupāī

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कौसलपुर राजा॥ गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई॥ गरुड़ सुमेरु रेनू सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही॥ अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना॥ मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा॥ गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं॥ सयन किए देखा कपि तेही। मंदिर महुँ दीखि बैदेही॥ भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा॥

Dohā

रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि जाइ। नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरषि कपिराइ॥5॥

अर्थ(लंकिनी ने कहा —) "कौसलपुर के राजा (श्रीराम) को हृदय में रखकर नगर में प्रवेश कर सब कार्य कर लो। जिस पर श्रीराम कृपा-दृष्टि से देख लें, उसके लिए विष अमृत, शत्रु मित्र, समुद्र गाय के खुर-जैसा और अग्नि शीतल हो जाती है; गरुड़ सुमेरु-समान और सुमेरु रज-कण समान हो जाता है।" हनुमान जी ने अत्यंत छोटा रूप धरा और भगवान् का स्मरण कर नगर में प्रवेश किया। उन्होंने एक-एक महल खोज डाला, जहाँ-तहाँ अगणित योद्धा देखे। वे रावण के महल में गए — अत्यंत विचित्र, जो कहा नहीं जाता — और उसे सोते देखा; पर महल में वैदेही (सीता) न दिखीं। फिर एक सुहावना भवन दिखा, जहाँ अलग से हरि का मंदिर बना था — वह घर राम के आयुधों (चिह्नों) से अंकित था, जिसकी शोभा वर्णन नहीं की जा सकती। वहाँ नई तुलसी के पौधे देखकर कपिराज हर्षित हुए।
दोहा 6
Chaupāī

लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा॥ मन महुँ तरक करै कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा॥ राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा॥ एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ कारज हानी॥ बिप्र रुप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषण उठि तहँ आए॥ करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई॥ की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई॥ की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी॥

Dohā

तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम। सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम॥6॥

अर्थ"लंका तो निशाचरों के समूह का निवास है — यहाँ किसी सज्जन का वास कैसे?" कपि मन में यही तर्क कर रहे थे, उसी समय विभीषण जाग उठे और "राम-राम" का स्मरण किया। कपि हृदय में हर्षित हुए, सज्जन को पहचानकर — "मैं इनसे परिचय करूँगा, क्योंकि साधु से कार्य की हानि नहीं होती।" ब्राह्मण का रूप धरकर उन्होंने (राम-नाम के) वचन सुनाए; सुनते ही विभीषण उठकर वहाँ आए और प्रणाम कर कुशल पूछी — "हे ब्राह्मण! अपनी कथा समझाकर कहिए। क्या आप हरि के दासों में से कोई हैं? — मेरे हृदय में बड़ी प्रीति हो रही है। अथवा क्या आप दीनों के अनुरागी स्वयं राम हैं, जो मुझे बड़भागी बनाने आए हैं?" तब हनुमान जी ने राम की सारी कथा और अपना नाम कहा; सुनते ही दोनों के शरीर पुलकित हो गए और गुण-समूह का स्मरण कर मन मग्न हो गया।
दोहा 7
Chaupāī

सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी॥ तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा॥ तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति पद सरोज मन माहीं॥ अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता॥ जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा॥ सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती॥ कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥ प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि मिलै अहारा॥

Dohā

अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर। कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर॥7॥

अर्थ(विभीषण बोले —) "हे पवनपुत्र! मेरी रहनी सुनिए — जैसे दाँतों के बीच बेचारी जीभ। हे तात! कभी मुझे अनाथ जानकर सूर्यकुल के नाथ कृपा करेंगे। यह तामसी शरीर है, कोई साधन नहीं; मन में उनके चरण-कमलों की प्रीति भी नहीं। पर हे हनुमान! अब मुझे भरोसा हुआ — हरि की कृपा बिना संत नहीं मिलते। यदि रघुवीर ने अनुग्रह किया है, तभी आपने मुझे हठ करके दर्शन दिए।" "हे विभीषण! प्रभु की रीति सुनिए: वे सेवक पर सदा प्रीति करते हैं। कहिए, मैं कौन-सा कुलीन हूँ? — चंचल वानर, सब प्रकार से हीन; प्रातः जो हमारा नाम ले ले उसे उस दिन भोजन नहीं मिलता। हे सखा! मैं ऐसा अधम हूँ, फिर भी मुझ पर भी रघुवीर ने कृपा की है।" गुणों का स्मरण कर उनके नेत्र जल से भर आए।
दोहा 8
Chaupāī

जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे होहिं दुखारी॥ एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा॥ पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही॥ तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता॥ जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउ पवनसुत बिदा कराई॥ करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ॥ देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा॥ कृस तन सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी॥

Dohā

निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन। परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन॥8॥

अर्थ(विभीषण —) "ऐसा जानते हुए भी जो ऐसे स्वामी को भुलाकर भटकते हैं, वे दुखी क्यों न हों?" इस प्रकार राम के गुण कहते हुए उन्होंने अनिर्वचनीय शांति पाई। फिर विभीषण ने सारी कथा कही — जानकी जी वहाँ किस प्रकार रहती हैं। तब हनुमान जी बोले — "हे भ्राता! सुनिए, मैं माता जानकी को देखना चाहता हूँ।" विभीषण ने सब युक्ति समझा दी; विदा लेकर पवनपुत्र चल पड़े। वही रूप धरकर वे वहाँ गए जहाँ अशोक वन में सीता जी रहती थीं, और उन्हें देखकर मन ही मन प्रणाम किया। बैठे-बैठे ही रात के पहर बीत रहे थे — कृश शरीर, सिर पर एक जटा की वेणी, हृदय में रघुपति के गुण-समूह का जप करती हुईं, नेत्र अपने चरणों पर लगाए और मन राम के चरण-कमलों में लीन। जानकी जी को इतना दीन देखकर पवनपुत्र अत्यंत दुखी हुए।
दोहा 9
Chaupāī

तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई॥ तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा॥ बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा॥ कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी॥ तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा॥ तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही॥ सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा॥ अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की॥ सठ सूने हरि आनेहि मोहि। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही॥

Dohā

आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान। परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन॥9॥

अर्थवे वृक्ष के पत्तों में छिपे रहे, विचार करते हुए — "हे भाई! क्या करूँ?" उसी समय रावण वहाँ बहुत-सी स्त्रियों के साथ बड़ी सज-धज से आया और सीता जी को साम, दान, भय और भेद दिखाकर अनेक प्रकार से समझाने लगा। रावण बोला — "हे सुमुखी सयानी! सुनो; मैं मंदोदरी आदि सब रानियों को तुम्हारी दासी बना दूँगा — यह मेरा प्रण है; एक बार मेरी ओर देख लो।" तिनके की ओट लेकर वैदेही ने परम स्नेही अवधपति का स्मरण कर कहा — "हे दशमुख! सुन — जुगनू के प्रकाश से क्या कभी कमलिनी खिलती है? मन में ऐसा समझ," जानकी जी कहती हैं। "रे दुष्ट! तुझे रघुवीर के बाण की सुधि नहीं। रे मूढ़! तू मुझे सूने में चुराकर ले आया है; अधम, निर्लज्ज! तुझे लाज नहीं आती?" अपने को जुगनू और राम को सूर्य-समान सुनकर तथा ये कठोर वचन सुनकर उसने अत्यंत खिसियाकर तलवार खींच ली और बोला।
दोहा 10
Chaupāī

सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना॥ नाहिं सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति जीवन हानी॥ स्याम सरोज दाम सम सुंदर। प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर॥ सो भुज कंठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा॥ चंद्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं॥ सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा॥ सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा॥ कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई॥ मास दिवस महुँ कहा माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना॥

Dohā

भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद। सीतहि त्रास देखावहि धरहिं रूप बहु मंद॥10॥

अर्थ"सीता! तूने मेरा अपमान किया है; मैं इस कठोर तलवार से तेरा सिर काट लूँगा। नहीं तो शीघ्र मेरी बात मान ले, हे सुमुखी — नहीं तो जीवन की हानि है।" (सीता बोलीं —) "प्रभु की भुजा — नीले कमलों की माला-सी सुंदर, हाथी की सूँड़-समान — (ही मेरे कंठ के योग्य है); क्या तेरी घोर तलवार (उसकी तुलना)? रे मूढ़! सुन, यही मेरा दृढ़ प्रण है।" (तलवार से कहा —) "हे चंद्रहास! रघुपति के विरह की अग्नि से उत्पन्न मेरा संताप दूर कर; तू शीतल, तीक्ष्ण, श्रेष्ठ धारा बहाता है — मेरा भारी दुख हर ले।" यह सुनकर वह फिर मारने दौड़ा; मय की पुत्री (मंदोदरी) ने नीति कहकर समझाया। उसने सब राक्षसियों को बुलाकर कहा — "जाकर सीता को अनेक प्रकार से डराओ; यदि एक मास में मेरी बात न माने, तो मैं तलवार निकालकर मार डालूँगा।" दशमुख महल को गया; यहाँ अनेक नीच रूप धरकर पिशाचिनियों के झुंड सीता को त्रास दिखाने लगे।
दोहा 11
Chaupāī

त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका॥ सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना॥ सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी॥ खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा॥ एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई॥ नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई॥ यह सपना में कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गएँ दिन चारी॥ तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं॥

Dohā

जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच। मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच॥11॥

अर्थत्रिजटा नाम की एक राक्षसी थी, जो विवेक में निपुण और राम के चरणों में अनुरक्त थी। उसने सबको बुलाकर एक स्वप्न सुनाया — "सीता की सेवा करो और अपना हित करो। मेरे स्वप्न में एक वानर ने लंका जला दी और सारी राक्षस-सेना मार डाली; दशमुख गधे पर सवार, नंगा, सिर मुँडा हुआ, बीसों भुजाएँ कटी हुई; इस प्रकार वह दक्षिण दिशा को गया, मानो लंका विभीषण को मिल गई हो। नगर में (विभीषण ने) रघुवीर की दुहाई फिराई; तब प्रभु ने सीता को बुला भेजा। यह स्वप्न मैं पुकारकर कहती हूँ — चार दिन बीतने पर सत्य होगा।" उसके वचन सुनकर वे सब डर गईं और जानकी जी के चरणों में गिर पड़ीं। जब सब जहाँ-तहाँ चली गईं, तब सीता जी का मन सोचने लगा — "एक मास बीतने पर नीच निशाचर मुझे मार डालेगा।"
दोहा 12
Chaupāī

त्रिजटा सन बोली कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी॥ तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसहु बिरहु अब नहिं सहि जाई॥ आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई॥ सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुनै को श्रवन सूल सम बानी॥ सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि॥ निसि अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी॥ कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलहि पावक मिटिहि सूला॥ देखिअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि आवत एकउ तारा॥ पावकमय ससि स्त्रवत आगी। मानहुँ मोहि जानि हतभागी॥ सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका॥ नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना॥ देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता॥

Dohā

कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारी तब। जनु असोक अंगार दीन्हि हरषि उठि कर गहेउ॥12॥

अर्थउसने त्रिजटा से हाथ जोड़कर कहा — "हे माता! तू मेरी विपत्ति की संगिनी है। शीघ्र कोई उपाय कर कि मैं यह देह त्याग दूँ; यह दुःसह विरह अब नहीं सहा जाता। काठ लाकर चिता बना, और हे माता! फिर अग्नि लगा दे; हे सयानी! मेरी प्रीति सत्य कर — कान में शूल-समान ये वचन कौन सुने?" यह सुनकर (त्रिजटा ने) उनके चरण पकड़कर समझाया, प्रभु का प्रताप-बल और सुयश सुनाया — "रात में अग्नि नहीं मिलती, सुन हे सुकुमारी," यह कहकर वह अपने घर चली गई। सीता बोलीं — "विधि मेरे प्रतिकूल हो गया — न अग्नि मिलेगी, न शूल मिटेगा। आकाश में अंगारे प्रकट दिखते हैं, पर एक भी तारा धरती पर नहीं आता; चंद्रमा अग्निमय है पर आग नहीं बरसाता, मानो मुझे अभागी जानकर। हे अशोक वृक्ष! मेरी विनती सुन — अपना नाम सत्य कर और मेरा शोक हर ले; तेरे नए कोंपल अग्नि-समान हैं — मुझे अग्नि दे, और मेरी पीड़ा का अंत मत बना।" सीता को विरह से अत्यंत व्याकुल देख कपि को वह क्षण कल्प-समान बीता। हृदय में विचार कर कपि ने तब अँगूठी नीचे डाल दी; मानो अशोक ने अंगार दिया हो — वे हर्षित होकर उठीं और उसे हाथ में ले लिया।
दोहा 13
Chaupāī

तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर॥ चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी॥ जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई॥ सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना॥ रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा॥ लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई॥ श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कहि सो प्रगट होति किन भाई॥ तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैंठीं मन बिसमय भयऊ॥ राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की॥ यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी॥ नर बानरहि संग कहु कैसें। कहि कथा भइ संगति जैसें॥

Dohā

कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास॥ जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास॥13॥

अर्थतब उन्होंने वह मनोहर अँगूठी देखी, जो राम-नाम से अंकित और अत्यंत सुंदर थी। चकित होकर देखती हुईं, मुद्रिका पहचानकर उनके हृदय में हर्ष-विषाद उमड़ पड़े — "अजेय रघुराज को कौन जीत सकता है? ऐसी (मुद्रिका) माया से नहीं रची जा सकती।" सीता जी मन में नाना विचार कर ही रही थीं कि हनुमान जी ने मधुर वचन कहे और रामचंद्र जी के गुण वर्णन करने लगे; सुनते ही सीता जी का दुख भाग गया। वे मन लगाकर कान से सुनने लगीं, और उन्होंने आदि से सारी कथा सुनाई। "जिनकी सुहावनी कथा कानों को अमृत-सी है — हे भाई! वे प्रकट क्यों नहीं होते?" तब हनुमान जी निकट चले गए; वे मुड़कर बैठ गईं, मन में विस्मय हुआ। "हे माता जानकी! मैं राम का दूत हूँ — करुणानिधान की सच्ची शपथ। यह मुद्रिका मैं लाया हूँ, माता; राम ने आपको पहचान-चिह्न रूप में दी। मनुष्य और वानर का संग कैसे हुआ — कहता हूँ।" उन्होंने जैसी संगति हुई वह कथा कही। कपि के प्रेमपूर्ण वचन सुनकर उनके मन में विश्वास उत्पन्न हुआ; उन्होंने मन-वचन-कर्म से जान लिया कि यह कृपासिंधु का दास है।
दोहा 14
Chaupāī

हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी॥ बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयउ तात मों कहुँ जलजाना॥ अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी॥ कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई॥ सहज बानि सेवक सुख दायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक॥ कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहि निरखि स्याम मृदु गाता॥ बचनु आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी॥ देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता॥ मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता॥ जनि जननी मानहु जियँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना॥

Dohā

रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर। अस कहि कपि गद गद भयउ भरे बिलोचन नीर॥14॥

अर्थउन्हें हरि का सेवक जानकर उनकी प्रीति अत्यंत गाढ़ी हो गई; नेत्र सजल हो गए और रोमांच की लहर बढ़ गई। "हे हनुमान! विरह के समुद्र में डूबती मुझ को तुम जहाज़ हो गए। अब कुशल कहो — मैं बलिहारी जाती हूँ — क्या खर के शत्रु (राम) अनुज सहित सकुशल हैं, वे सुख के धाम? कोमल चित्त, कृपालु रघुराज ने हे कपि! किस कारण निष्ठुरता धारण कर ली? स्वभाव से सेवकों को सुख देने वाले रघुनायक क्या कभी (मेरी) सुधि करते हैं? हे तात! क्या कभी मेरे नेत्र उनके श्याम, कोमल अंगों को देखकर शीतल होंगे?" वचन न आया, नेत्र जल से भर गए — "हाय नाथ! आपने मुझे बिलकुल भुला दिया।" सीता को अत्यंत व्याकुल देख कपि ने कोमल, विनीत वचन कहे — "हे माता! प्रभु अनुज सहित कुशल हैं — आपके दुख से दुखी, सुकृपा के धाम। हे जननी! जी में कमी मत मानिए; राम का प्रेम आपसे दुगना है। अब हे माता! धीरज धरकर रघुपति का संदेश सुनिए।" यह कहकर कपि गद्गद हो गए, नेत्र जल से भर आए।
दोहा 15
Chaupāī

कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता॥ नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू॥ कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा॥ जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा॥ कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान कोई॥ तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा॥ सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतेनहि माहीं॥ प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही॥ कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता॥ उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई॥

Dohā

निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु। जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु॥15॥

अर्थ"राम ने कहा — 'हे सीता! तुम्हारे वियोग में मेरे लिए सब कुछ विपरीत हो गया है — वृक्षों के नए कोंपल अग्नि-समान, चाँदनी रात प्रलय की रात-सी, चंद्रमा सूर्य-समान; नीलकमलों की सेज भालों के वन-सी, बादल मानो तपा हुआ तेल बरसाता; जो हितैषी थे वही पीड़ा देते हैं, कोमल त्रिविध वायु साँप की साँस-सी। कहने से भी कुछ दुख घट सकता है — पर किससे कहूँ? इसे कोई नहीं जानता। हे प्रिय! मेरे और तुम्हारे प्रेम का तत्त्व केवल मेरा मन जानता है, और वह मन सदा तुम्हारे पास रहता है; प्रेम का रस इतने में ही जान लो।'" प्रभु का संदेश सुनते ही वैदेही प्रेम में मग्न हो गईं, उन्हें शरीर की सुधि न रही। कपि बोले — "हे माता! हृदय में धीरज धरो; सेवकों को सुख देने वाले राम का स्मरण करो। रघुपति की प्रभुता हृदय में लाओ, और मेरे वचन सुनकर कायरता त्याग दो। निशाचरों के समूह पतंगे-समान हैं और रघुपति के बाण अग्नि; हे जननी! हृदय में धीरज धरो — निशाचरों को जला हुआ ही जानो।"
दोहा 16
Chaupāī

जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई॥ रामबान रबि उएँ जानकी। तम बरूथ कहँ जातुधान की॥ अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई॥ कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा॥ निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं। तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥ हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना॥ मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्ह निज देहा॥ कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा॥ सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ॥

Dohā

सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल। प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल॥16॥

अर्थ(हनुमान जी बोले —) "यदि रघुवीर को सुधि मिल जाती, तो रघुराई विलंब न करते। हे जानकी! राम-बाण रूपी सूर्य के उदय होते ही निशाचरों के अंधकार-समूह कहाँ रहेंगे? हे माता! मैं अभी आपको ले चलूँ — पर प्रभु की आज्ञा नहीं है, राम की दुहाई। हे जननी! कुछ दिन धीरज धरिए; रघुवीर वानरों सहित आएँगे, निशाचरों को मारकर आपको ले जाएँगे, और तीनों लोकों में नारद आदि यश गाएँगे।" (सीता बोलीं —) "पर हे पुत्र! क्या सब वानर तुम्हारे समान हैं? निशाचर तो बड़े बलवान् योद्धा हैं — मेरे हृदय में बड़ा संदेह है।" यह सुनकर कपि ने अपना (विशाल) रूप प्रकट किया — स्वर्ण-पर्वत के आकार का, समर में भयंकर, अत्यंत बलवान् वीर। तब सीता जी के मन में भरोसा हुआ; और पवनपुत्र ने फिर छोटा रूप ले लिया। "हे माता! सुनिए — वानर में बड़ा बल-बुद्धि नहीं; पर प्रभु के प्रताप से अत्यंत छोटा साँप भी गरुड़ को खा जाता है।"
दोहा 17
Chaupāī

मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी॥ आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना॥ अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥ करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥ बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा॥ अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता॥ सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा॥ सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी॥ तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं। जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं॥

Dohā

देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु। रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु॥17॥

अर्थभक्ति, प्रताप और तेज से सनी कपि की वाणी सुनकर उनका मन संतुष्ट हुआ। उन्हें राम-प्रिय जानकर उन्होंने आशीर्वाद दिया — "हे पुत्र! बल और शील के निधान बनो; अजर, अमर, गुणों के निधि बनो, हे पुत्र; रघुनाथ तुम पर बहुत कृपा करें।" "प्रभु कृपा करें" यह कानों से सुनकर हनुमान जी निर्भर प्रेम में मग्न हो गए। बार-बार चरणों में सिर नवाकर, हाथ जोड़कर बोले — "हे माता! अब मैं कृतकृत्य हो गया; आपका आशीर्वाद अमोघ विख्यात है। हे माता! सुनिए, मुझे बहुत भूख लगी है, ये सुंदर फलवाले वृक्ष देखकर।" "हे पुत्र! वन की रखवाली बड़े बलवान् राक्षस करते हैं।" "हे माता! यदि आप मन में सुख मानें, तो मुझे उनका भय नहीं।" कपि को बुद्धि-बल में निपुण देखकर जानकी जी ने कहा — "जाओ; हे पुत्र! रघुपति के चरण हृदय में धरकर मधुर फल खाओ।"
दोहा 18
Chaupāī

चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरैं लागा॥ रहे तहाँ बहु भट रखवारे। कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे॥ नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं असोक बाटिका उजारी॥ खाएसि फल अरु बिटप उपारे। रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे॥ सुनि रावन पठए भट नाना। तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना॥ सब रजनीचर कपि संघारे। गए पुकारत कछु अधमारे॥ पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा। चला संग लै सुभट अपारा॥ आवत देखि बिटप गहि तर्जा। ताहि निपाति महाधुनि गर्जा॥

Dohā

कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि। कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि॥18॥

अर्थसिर नवाकर वे चले और बाग में घुसे; फल खाए और वृक्ष तोड़ने लगे। वहाँ बहुत-से योद्धा रखवाले थे; कुछ को मारा, कुछ जाकर पुकारने लगे — "हे नाथ! एक बड़ा भारी वानर आया है, उसने अशोक वाटिका उजाड़ दी — फल खाए, वृक्ष उखाड़े और रक्षकों को मसल-मसलकर भूमि पर डाल दिया।" यह सुनकर रावण ने अनेक योद्धा भेजे; उन्हें देखकर हनुमान जी गरजे। कपि ने सब राक्षस मार डाले; कुछ अधमरे होकर पुकारते हुए गए। फिर उसने अक्षयकुमार को भेजा, जो अपार सुभट साथ लेकर चला। आते देख (हनुमान जी ने) वृक्ष पकड़कर ललकारा, उसे मारकर महाध्वनि से गरजे। कुछ को मारा, कुछ को मसला, कुछ को धूल में मिला दिया; और कुछ फिर जाकर प्रभु (रावण) से कपि के अपार बल की पुकार करने लगे।
दोहा 19
Chaupāī

सुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठएसि मेघनाद बलवाना॥ मारसि जनि सुत बांधेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ कर आही॥ चला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा॥ कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अरु धावा॥ अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा॥ रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा॥ तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा। मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई॥ उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया। जीति जाइ प्रभंजन जाया॥

Dohā

ब्रह्म अस्त्र तेहिं साँधा कपि मन कीन्ह बिचार। जौं ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार॥19॥

अर्थपुत्र का वध सुनकर लंकेश क्रुद्ध हुआ और बलवान् मेघनाद को भेजा — "हे पुत्र! मारना नहीं, उसे बाँध लाना; देखें यह कपि कहाँ का है।" अतुलनीय योद्धा इंद्रजित चला, भाई के वध से क्रोध उपजा। कपि ने दारुण योद्धा को आते देखा; कटकटाकर गरजे और दौड़े। एक अत्यंत विशाल वृक्ष उखाड़कर लंकेश-कुमार को रथहीन कर दिया; उसके साथ के महाभटों को पकड़-पकड़कर अपने अंगों से मसल डाला। उन्हें गिराकर वे उससे भिड़ गए; दोनों मानो दो गजराज लड़ने लगे। घूँसा मारकर वे वृक्ष पर चढ़ गए; उसे एक क्षण मूर्च्छा आ गई। फिर उठकर उसने बहुत माया रची; पर पवनपुत्र को जीता न जा सका। उसने ब्रह्मास्त्र साधा; कपि ने मन में विचार किया — "यदि मैं ब्रह्म-बाण न मानूँ, तो इसकी अपार महिमा मिट जाएगी।"
दोहा 20
Chaupāī

ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहि मारा। परतिहुँ बार कटकु संघारा॥ तेहि देखा कपि मुरुछित भयऊ। नागपास बाँधेसि लै गयऊ॥ जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥ तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा॥ कपि बंधन सुनि निसिचर धाए। कौतुक लागि सभाँ सब आए॥ दसमुख सभा दीखि कपि जाई। कहि जाइ कछु अति प्रभुताई॥ कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता॥ देखि प्रताप कपि मन संका। जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका॥

Dohā

कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद। सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद॥20॥

अर्थउसने कपि को ब्रह्म-बाण मारा; फिर भी गिरते हुए उन्होंने सेना का संहार किया। कपि को मूर्च्छित देख उसने नागपाश में बाँधकर ले गया। (शिव कहते हैं —) हे भवानी! सुनो — जिनका नाम जपकर ज्ञानी मनुष्य भव-बंधन काट डालते हैं, क्या उनके दूत को बंधन हो सकता है? प्रभु के कार्य के लिए कपि ने अपने को बँधा लिया। कपि का बंधन सुनकर निशाचर दौड़े; सब कौतूहल से सभा में आए। कपि ने जाकर दशमुख की सभा देखी, जिसकी अत्यंत प्रभुता कही नहीं जाती: हाथ जोड़े देव और दिक्पाल विनीत, सब भयभीत होकर (रावण की) भौंहें ताकते थे। प्रताप देखकर भी कपि के मन में शंका न हुई, जैसे साँपों के समूह में गरुड़ निःशंक रहता है। कपि को देखकर दशानन दुर्वचन कहकर हँसा; फिर पुत्र-वध का स्मरण कर उसके हृदय में विषाद उपजा।
दोहा 21
Chaupāī

कह लंकेस कवन तैं कीसा। केहिं के बल घालेहि बन खीसा॥ की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही। देखउँ अति असंक सठ तोही॥ मारे निसिचर केहिं अपराधा। कहु सठ तोहि प्रान कइ बाधा॥ सुन रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचित माया॥ जाकें बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा। जा बल सीस धरत सहसानन। अंडकोस समेत गिरि कानन॥ धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह ते सठन्ह सिखावनु दाता। हर कोदंड कठिन जेहि भंजा। तेहि समेत नृप दल मद गंजा॥ खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली। बधे सकल अतुलित बलसाली॥

Dohā

जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि। तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि॥21॥

अर्थलंकेश ने कहा — "रे कपि! तू कौन है? किसके बल पर तूने वन उजाड़ डाला? अथवा क्या तूने मेरा नाम कानों से नहीं सुना, रे मूढ़, जो तुझे इतना निःशंक देखता हूँ? किस अपराध से तूने निशाचर मारे? कह रे मूर्ख — क्या तेरे प्राणों को संकट नहीं?" "रे रावण! सुन — जिनके बल पर ब्रह्मांडों का समूह टिका है, जिनकी शक्ति से माया रची जाती है; जिनके बल से ब्रह्मा, हरि और शिव सृष्टि, पालन व संहार करते हैं, हे दशशीश; जिनके बल से सहस्रमुख शेष पर्वत-वनों सहित अंडकोश को सिर पर धारण करते हैं; जो देवताओं की रक्षा के लिए अनेक देह धरते हैं और तुझ जैसे मूढ़ों को शिक्षा देने वाले हैं; जिन्होंने शिव का कठोर धनुष तोड़ा और राजाओं के दल का मद चूर किया; जिन्होंने खर, दूषण, त्रिशिरा और बालि — सब अतुलनीय बलशालियों — का वध किया; जिनके बल के लवलेश से तूने समस्त चराचर को जीता: मैं उन्हीं (प्रभु) का दूत हूँ, जिनकी प्रिय पत्नी को तू हर लाया है।"
दोहा 22
Chaupāī

जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई॥ समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा॥ खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा। कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा॥ सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी॥ जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउ तनयँ तुम्हारे॥ मोहि कछु बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा॥ बिनती करउँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन॥ देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी॥ जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई॥ तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै॥

Dohā

प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि। गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि॥22॥

अर्थ"मैं तुम्हारी प्रभुता जानता हूँ — सहस्रबाहु से तुम्हारी लड़ाई पड़ी, और बालि से युद्ध कर तुमने यश पाया।" कपि के वचन सुनकर (रावण) हँसकर टाल गया। "हे प्रभु! मैंने भूख लगने से फल खाए, और कपि के स्वभाव से वृक्ष तोड़े। हे स्वामी! सबको अपना शरीर परम प्रिय है; (फिर भी) कुमार्गगामियों ने मुझे मारा; जिन्होंने मुझे मारा उन्हें मैंने मारा — उस पर तुम्हारे पुत्र ने मुझे बाँधा। मुझे बँधने की कुछ लाज नहीं; मैं तो अपने प्रभु का कार्य करना चाहता हूँ। हे रावण! हाथ जोड़कर विनती करता हूँ: मान त्यागकर मेरी सीख सुनो। अपने कुल पर विचार करो; भ्रम तजकर भक्तों का भय हरने वाले (राम) को भजो। जिनके डर से काल भी अत्यंत डरता है, जो देव-असुर और चराचर को खा जाते हैं — उनसे कभी बैर मत करो; मेरे कहने से जानकी दे दो। प्रणतपाल रघुनाथ, करुणासिंधु, खरारि — शरण जाने पर प्रभु तुम्हारा अपराध भुलाकर तुम्हें रख लेंगे।"
दोहा 23
Chaupāī

राम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राज तुम्ह करहू॥ रिषि पुलिस्त जसु बिमल मंयका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका॥ राम नाम बिनु गिरा सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा॥ बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषण भूषित बर नारी॥ राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई॥ सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गए पुनि तबहिं सुखाहीं॥ सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी॥ संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं राखि राम कर द्रोही॥

Dohā

मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान। भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान॥23॥

अर्थ"राम के चरण-कमल हृदय में धरो और लंका का अचल राज्य करो। ऋषि पुलस्त्य (तुम्हारे कुल) का यश निर्मल चंद्रमा है — उस चंद्रमा में कलंक मत बनो। राम-नाम बिना वाणी शोभा नहीं देती; मद-मोह त्यागकर विचार कर देखो। जैसे सब आभूषणों से विभूषित सुंदर स्त्री भी वस्त्र बिना शोभा नहीं देती, हे सुरारि — वैसे ही राम-विमुख की संपत्ति व प्रभुता पाकर भी अनपाई-सी रहकर चली जाती है; जैसे बिना जल-स्रोत की नदियाँ, जो बरसात बीतते ही सूख जाती हैं। हे दशकंठ! सुन — मैं प्रण रोपकर कहता हूँ: राम-विमुख का कोई रक्षक नहीं, चाहे (राम) कुपित ही क्यों न हों; हज़ार शंकर, विष्णु और ब्रह्मा भी राम के द्रोही को नहीं रख सकते। मोह के मूल, बहुत दुख देने वाले अंधकार-रूप अभिमान को त्यागो, और कृपासिंधु भगवान् रघुनाथ राम को भजो।"
दोहा 24
Chaupāī

जदपि कहि कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी॥ बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी॥ मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही॥ उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना॥ सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि हरहुँ मूढ़ कर प्राना॥ सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए। नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध मारिअ दूता॥ आन दंड कछु करिअ गोसाँई। सबहीं कहा मंत्र भल भाई॥ सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठइअ बंदर॥

Dohā

कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ। तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ॥24॥

अर्थयद्यपि कपि ने भक्ति, विवेक, वैराग्य और नीति से सनी अत्यंत हितकारी वाणी कही, फिर भी महा-अभिमानी (रावण) हँसकर बोला — "हमें बड़ा ज्ञानी गुरु कपि मिला! रे खल! तेरी मृत्यु निकट आ गई है, जो तू मुझे सीख देने लगा, रे अधम।" "उलटा होगा," हनुमान जी बोले, "तेरी मतिभ्रम मैं प्रकट जानता हूँ।" कपि के वचन सुनकर (रावण) बहुत खिसियाया — "इस मूढ़ के प्राण शीघ्र क्यों न हर लूँ?" जब निशाचर मारने दौड़े, तब विभीषण मंत्रियों सहित आए और सिर नवाकर बहुत विनय की — "दूत को मारना नीति-विरुद्ध है। हे स्वामी! कुछ और दंड कीजिए।" सबने कहा — "भला मंत्र है, भाई।" यह सुनकर दशकंधर हँसकर बोला — "वानर को अंग-भंग करके भेज दो। कपि की ममता पूँछ पर होती है — सबको समझाकर कहता हूँ: उसे तेल में डुबाए कपड़े से बाँधकर फिर आग लगा दो।"
दोहा 25
Chaupāī

पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लइ आइहि॥ जिन्ह कै कीन्हसि बहुत बड़ाई। देखेउँमैं तिन्ह कै प्रभुताई॥ बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भइ सहाय सारद मैं जाना॥ जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना॥ रहा नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला॥ कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी॥ बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी॥ पावक जरत देखि हनुमंता। भयउ परम लघु रुप तुरंता॥ निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं। भई सभीत निसाचर नारीं॥

Dohā

हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास। अट्टहास करि गर्ज़ा कपि बढ़ि लाग अकास॥25॥

अर्थ"पूँछहीन वानर वहाँ जाएगा, तब वह मूढ़ अपने स्वामी को ले आएगा, जिसकी उसने इतनी बड़ाई की; उनकी प्रभुता भी मैं देख लूँगा।" यह सुनकर कपि मन में मुस्कुराए — "सरस्वती मेरी सहायक हुईं, मैं जानता हूँ।" रावण के वचन सुनकर मूढ़ राक्षस वही रचना करने लगे। नगर में वस्त्र, घी और तेल न रहा; पूँछ बढ़ती गई — कपि ने खेल किया। तमाशा देखने नगरवासी आए, चरणों से मारते और बहुत हँसी करते; ढोल बजे, सब ताली देने लगे, और नगर में फिराकर फिर पूँछ में आग लगा दी। आग जलती देख हनुमान जी तुरंत अत्यंत छोटे हो गए; बंधन से निकलकर कपि स्वर्ण-अटारियों पर चढ़ गए, और राक्षसियाँ भयभीत हो गईं। उसी समय हरि की प्रेरणा से उनचास पवन चले; अट्टहास कर कपि गरजे और बढ़कर आकाश तक जा लगे।
दोहा 26
Chaupāī

देह बिसाल परम हरुआई। मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई॥ जरइ नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला॥ तात मातु हा सुनिअ पुकारा। एहि अवसर को हमहि उबारा॥ हम जो कहा यह कपि नहिं होई। बानर रूप धरें सुर कोई॥ साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा॥ जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं॥ ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा सो तेहि कारन गिरिजा॥ उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पुनि सिंधु मझारी॥

Dohā

पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि। जनकसुता के आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि॥26॥

अर्थदेह विशाल फिर भी अत्यंत हल्की, वे महल से महल पर दौड़कर चढ़ने लगे; नगर जलने लगा, लोग बेहाल हुए, करोड़ों विकराल लपटें झपटने लगीं। "हे तात! हे मात!" — ऐसी पुकार सुनाई दी — "इस अवसर पर हमें कौन उबारे? हमने कहा था यह वानर नहीं; कोई देवता वानर रूप धरे है। साधु के अपमान का ऐसा ही फल है — नगर अनाथ-सा जल रहा है।" उन्होंने एक निमिष में नगर जला दिया; केवल विभीषण का घर (बचा)। जिनके दूत ने अग्नि सिरजी — हे गिरिजा! उसी कारण वह (हनुमान) नहीं जले। उलट-पलटकर सारी लंका जलाकर फिर वे समुद्र में कूद पड़े। पूँछ बुझाकर और थकान मिटाकर, फिर छोटा रूप धरकर, हाथ जोड़कर जानकी जी के आगे खड़े हो गए।
दोहा 27
Chaupāī

मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा। जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा॥ चूड़ामनि उतारि तब दयऊ। हरष समेत पवनसुत लयऊ॥ कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा॥ दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी॥ तात सक्रसुत कथा सुनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु॥ मास दिवस महुँ नाथु आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा॥ कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना। तुम्हहू तात कहत अब जाना॥ तोहि देखि सीतलि भइ छाती। पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती॥

Dohā

जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह। चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह॥27॥

अर्थ"हे माता! मुझे कुछ पहचान-चिह्न दीजिए, जैसा रघुनाथ ने मुझे दिया था।" तब उन्होंने चूड़ामणि उतारकर दी; पवनपुत्र ने हर्ष सहित ले ली। "हे पुत्र! ऐसा कहना — मेरा प्रणाम; प्रभु सब प्रकार से पूर्णकाम हैं। दीनदयाल अपने विरद को स्मरण कर, हे नाथ! मेरा भारी संकट हरिए। हे तात! इंद्रपुत्र (कौवे) की कथा सुनाना, और प्रभु को बाण के प्रताप का स्मरण कराना। यदि नाथ एक मास में न आए, तो फिर मुझे जीवित न पाएँगे। हे कपि! कहो, किस विधि प्राण रखूँ? अब हे पुत्र, तुम भी जाने को कहते हो। तुम्हें देखकर छाती शीतल हुई; फिर मेरे लिए वही (लंबा) दिन और वही रात (होगी)।" जानकी जी को समझाकर और अनेक प्रकार से धीरज देकर, कपि चरण-कमलों में सिर नवाकर राम की ओर चल पड़े।
दोहा 28
Chaupāī

चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्त्रवहिं सुनि निसिचर नारी॥ नाघि सिंधु एहि पारहि आवा। सबद किलकिला कपिन्ह सुनावा॥ हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना॥ मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसि रामचन्द्र कर काजा॥ मिले सकल अति भए सुखारी। तलफत मीन पाव जिमि बारी॥ चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछत कहत नवल इतिहासा॥ तब मधुबन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए॥ रखवारे जब बरजन लागे। मुष्टि प्रहार हनत सब भागे॥

Dohā

जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज। सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज॥28॥

अर्थचलते समय वे महाध्वनि से ज़ोर से गरजे, जिसे सुनकर राक्षसियों के गर्भ गिर गए। समुद्र लाँघकर वे इस पार आए और वानरों को किलकिला का शब्द सुनाया। हनुमान जी को देखकर सब हर्षित हुए; वानरों ने तब मानो नया जन्म जाना। मुख प्रसन्न, शरीर तेज से विराजमान — उन्होंने रामचंद्र जी का कार्य कर दिया था। सब मिले और अत्यंत सुखी हुए, जैसे तड़पती मछली को जल मिल जाए। वे हर्षित होकर रघुनायक की ओर चले, नए इतिहास पूछते-कहते। तब वे सब मधुवन के भीतर आए और अंगद की सम्मति से मधु-फल खाए। जब रखवाले रोकने लगे, घूँसों के प्रहार से सब भाग गए। वे सब जाकर युवराज (सुग्रीव) से पुकारने लगे — "वन उजाड़ दिया!" सुनकर सुग्रीव हर्षित हुए — "कपियों ने प्रभु का कार्य कर लिया।"
दोहा 29
Chaupāī

जौं होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि खाई॥ एहि बिधि मन बिचार कर राजा। आइ गए कपि सहित समाजा॥ आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा॥ पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी॥ नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना॥ सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ। राम कपिन्ह जब आवत देखा। किएँ काजु मन हरष बिसेषा॥ फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई॥

Dohā

प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज। पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज॥29॥

अर्थ"यदि सीता की सुधि न पाई होती, तो क्या वे मधुवन के फल खा सकते थे?" इस प्रकार राजा (सुग्रीव) मन में विचार कर ही रहे थे कि वानर समाज सहित आ गए। सबने आकर चरणों में सिर नवाया; कपीश सबसे अत्यंत प्रेम से मिले। उन्होंने कुशल पूछी; "आपके चरण देखकर कुशल है; राम की कृपा से कार्य विशेष रूप से सिद्ध हुआ।" "हे नाथ! हनुमान ने कार्य किया और सब वानरों के प्राण बचाए।" यह सुनकर सुग्रीव उनसे फिर मिले, और वानरों सहित रघुपति के पास चले। राम ने जब वानरों को कार्य किए हुए आते देखा, तब मन में विशेष हर्ष हुआ। दोनों भाई स्फटिक शिला पर बैठे थे; सब वानर जाकर चरणों में गिर पड़े। करुणापुंज रघुपति सबसे प्रेम सहित मिले और कुशल पूछी; "हे नाथ! अब आपके चरण-कमल देखकर कुशल है।"
दोहा 30
Chaupāī

जामवंत कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया॥ ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर॥ सोइ बिजई बिनई गुन सागर। तासु सुजसु त्रेलोक उजागर॥ प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजू॥ नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख जाइ सो बरनी॥ पवनतनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुपतिहि सुनाए॥ सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए॥ कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की॥

Dohā

नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट। लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट॥30॥

अर्थजाम्बवान बोले — "हे रघुराज! सुनिए — हे नाथ! जिस पर आप दया करते हैं, उसे सदा शुभ और निरंतर कुशल रहता है; देव, मनुष्य और मुनि उस पर प्रसन्न रहते हैं; वही विजयी, विनयी और गुणों का सागर है, और उसका सुयश तीनों लोकों में उजागर होता है। प्रभु की कृपा से सब कार्य हुआ; हमारा जन्म आज सफल हुआ। हे नाथ! पवनपुत्र ने जो करनी की, वह सहस्र मुखों से भी वर्णन नहीं की जा सकती।" जाम्बवान ने पवनपुत्र के सुहावने चरित्र रघुपति को सुनाए; सुनते ही कृपानिधि के मन को अत्यंत भाए, और फिर हर्षित होकर उन्होंने हनुमान को हृदय से लगा लिया। "हे पुत्र! कहो — जानकी किस प्रकार रहती और अपने प्राणों की रक्षा करती हैं?" "(आपका) नाम दिन-रात पहरेदार, आपका ध्यान कपाट, और नेत्र अपने चरणों में जकड़े हुए — फिर प्राण किस मार्ग से (जाएँ)?"
दोहा 31
Chaupāī

चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही॥ नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी॥ अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना॥ मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहि अपराध नाथ हौं त्यागी॥ अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान कीन्ह पयाना॥ नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करिहिं हठि बाधा॥ बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा॥ नयन स्त्रवहि जलु निज हित लागी। जरैं पाव देह बिरहागी। सीता के अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला॥

Dohā

निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति। बेगि चलिय प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति॥31॥

अर्थ"चलते समय उन्होंने मुझे चूड़ामणि दी।" रघुपति ने उसे हृदय से लगाकर ले लिया। "हे नाथ! दोनों नेत्रों में जल भरकर जानकी जी ने कुछ वचन कहे — 'अनुज सहित प्रभु के चरण पकड़कर (कहना) — दीनबंधु, प्रणत की पीड़ा हरने वाले; मैं मन-वचन-कर्म से चरणों की अनुरागिनी हूँ — हे नाथ! किस अपराध से मुझे त्यागा? अपना एक अवगुण मैं मानती हूँ — कि बिछुड़ते ही प्राण नहीं निकल गए। पर हे नाथ! वह नेत्रों का अपराध है — वे प्राणों के निकलते हठपूर्वक बाधा डालते हैं। विरह की अग्नि में शरीर रूई है, श्वास वायु; क्षण भर में शरीर जल जाए — पर नेत्र अपने हित (फिर दर्शन) के लिए जल बहाते हैं, इसी से विरहाग्नि में जलता हुआ भी शरीर जल नहीं पाता।'" सीता की विपत्ति अत्यंत विशाल है — हे दीनदयाल! न कहना ही भला। हे करुणानिधि! उनका एक-एक निमिष कल्प-समान बीतता है; हे प्रभु! शीघ्र चलिए और भुजबल से खल-दल को जीतकर उन्हें ले आइए।
दोहा 32
Chaupāī

सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना॥ बचन काँय मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही॥ कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन होई॥ केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी॥ सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी॥ प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ सकत मन मोरा॥ सुनु सुत उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं॥ पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता॥

Dohā

सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत। चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत॥32॥

अर्थसीता का दुख सुनकर सुख के धाम प्रभु के कमल-नेत्र जल से भर आए: "जिसकी गति वचन, शरीर और मन से मैं ही हूँ, उसको क्या स्वप्न में भी विपत्ति पूछी (हो सकती) है?" हनुमान जी बोले — "हे प्रभु! विपत्ति तो वही है, जब आपका स्मरण-भजन न हो। हे प्रभु! निशाचरों की क्या बात? शत्रु को जीतकर आप जानकी को ले आएँगे।" "हे कपि! सुनो — देव, मनुष्य, मुनि या किसी देहधारी में तुम्हारे समान उपकारी कोई नहीं। मैं तुम्हारा क्या प्रत्युपकार करूँ? मेरा मन तुम्हारे सम्मुख भी नहीं हो सकता। हे पुत्र! सुनो — मैंने मन में विचार कर देखा, मैं उऋण नहीं हूँ।" बार-बार देवों के रक्षक कपि को निहारते रहे, नेत्रों में जल, शरीर अत्यंत पुलकित। प्रभु के वचन सुनकर और मुख-शरीर देखकर हनुमान हर्षित होकर प्रेम में विह्वल चरणों में गिर पड़े — "त्राहि त्राहि, हे भगवन्!"
दोहा 33
Chaupāī

बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब भावा॥ प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा॥ सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर॥ कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा॥ कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका॥ प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना॥ साखामृग के बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई॥ नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा। सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ कछू मोरि प्रभुताई॥

Dohā

ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकुल। तब प्रभावँ बड़वानलहिं जारि सकइ खलु तूल॥33॥

अर्थबार-बार प्रभु उन्हें उठाना चाहते; प्रेम में मग्न उन्हें उठना न भाया। प्रभु का कर-कमल कपि के सिर पर — उस दशा को स्मरण कर गौरीश (शिव) मग्न हो जाते हैं; फिर मन को सावधान कर शंकर अत्यंत सुंदर कथा कहने लगे। प्रभु ने कपि को उठाकर हृदय से लगाया, और हाथ पकड़कर अत्यंत निकट बैठाया। "हे कपि! कहो — रावण द्वारा रक्षित लंका — उस अत्यंत बाँके दुर्ग को तुमने कैसे जलाया?" प्रभु को प्रसन्न जानकर हनुमान अभिमान-रहित वचन बोले — "वानर की बड़ी मनुष्यता (पराक्रम) यही है — कि शाखा से शाखा पर जाए! समुद्र लाँघकर सोने का नगर जलाया, निशाचर-गण व वन उजाड़ा — हे रघुराज! वह सब आपका प्रताप है; हे नाथ! उसमें मेरी कोई प्रभुता नहीं। हे प्रभु! जिस पर आप अनुकूल हैं, उसे कुछ भी अगम नहीं; आपके प्रभाव से रूई का फाहा भी बड़वानल को निश्चय जला सकता है।"
दोहा 34
Chaupāī

नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी॥ सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी॥ उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव आना॥ यह संवाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा॥ सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा॥ तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा॥ अब बिलंबु केहि कारन कीजे। तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे॥ कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी॥

Dohā

कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ। नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ॥34॥

अर्थ"हे नाथ! कृपा कर मुझे परम सुखदायिनी अनपायिनी (कभी न छूटने वाली) भक्ति दीजिए।" कपि की अत्यंत सरल वाणी सुनकर प्रभु ने तब कहा — "एवमस्तु (ऐसा ही हो)," हे भवानी। (शिव कहते हैं —) हे उमा! जिसने राम का स्वभाव जान लिया, उसे उनका भजन छोड़कर और कुछ नहीं भाता; और जिसके हृदय में यह संवाद आ जाता है, वही रघुपति के चरणों की भक्ति पाता है। प्रभु के वचन सुनकर वानर-वृंद बोले — "जय जय जय, हे कृपालु, सुख के कंद!" तब रघुपति ने कपिपति (सुग्रीव) को बुलाकर कहा — "चलने की तैयारी करो। अब विलंब किस कारण? वानरों को तुरंत आज्ञा दो।" यह कौतुक देख देवता बहुत पुष्प बरसाकर हर्षित होकर आकाश से अपने भवनों को चले। कपिपति ने शीघ्र बुलाया; झुंड-के-झुंड यूथपति आए — अनेक रंग के, अतुलनीय बलवान् वानर-भालुओं के समूह।
दोहा 35
Chaupāī

प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गरजहिं भालु महाबल कीसा॥ देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना॥ राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा॥ हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भए सुंदर सुभ नाना॥ जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती॥ प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं॥ जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहि सोई॥ चला कटकु को बरनैं पारा। गर्जहि बानर भालु अपारा॥ नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी॥ केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं॥

Chhanda

चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे। मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किन्नर दुख टरे॥ कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं। जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं॥1॥ सहि सक भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई। गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई॥ रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी। जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी॥2॥

Dohā

एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर। जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर॥35॥

अर्थउन्होंने प्रभु के चरण-कमलों में सिर नवाए; भालू और महाबली वानर गरजे। राम ने समस्त वानर-सेना देखी और कमल-नेत्रों से कृपा कर निहारा; राम की कृपा का बल पाकर वानर-श्रेष्ठ मानो पंखयुक्त पर्वत हो गए। हर्षित होकर राम ने तब प्रस्थान किया; अनेक सुंदर-शुभ शकुन हुए — जिनकी समस्त कीर्ति मंगलमयी है, उनके प्रयाण में शकुन होना नीति ही है। वैदेही ने प्रभु का प्रयाण जान लिया — उनके बाएँ अंग फड़के, मानो कह दें; जो-जो शकुन जानकी के लिए (शुभ) होता, वही रावण के लिए अशुभ होता। सेना चली, जिसका वर्णन कौन कर सके; अपार वानर-भालू गरजते; नख ही आयुध, पर्वत-वृक्ष धारण किए, इच्छानुसार चलने वाले वे आकाश और पृथ्वी पर चले। भालू-वानर सिंहनाद करते; दिग्गज डगमगाते और चिग्घाड़ते। दिग्गज चिग्घाड़े, पृथ्वी डोली, पर्वत हिले, समुद्र खलबला उठे; गंधर्व, देव, मुनि, नाग और किन्नर मन में हर्षित हुए, उनका दुख टल गया। विकट वानर-योद्धा कटकटाते, करोड़ों-करोड़ों दौड़ते, "राम की जय" पुकारते, प्रबल प्रतापी कोसलनाथ के गुण-समूह गाते। नागराज (शेष) उदार भार सह न सके; बार-बार मोहित हुए, बार-बार कठोर कच्छप-पीठ पर दाँतों से (पृथ्वी को) पकड़ते — वह कैसे स्थिर दिखे? — मानो रघुवीर के सुंदर प्रयाण को जानकर नागराज कछुए की पीठ पर अविचल पावन (लेख) लिख रहे हों। इस प्रकार कृपानिधि जाकर समुद्र-तट पर उतरे; जहाँ-तहाँ भालू और वानर वीर बहुत-से फल खाने लगे।
दोहा 36
Chaupāī

उहाँ निसाचर रहहिं ससंका। जब ते जारि गयउ कपि लंका॥ निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा॥ जासु दूत बल बरनि जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई॥ दूतन्हि सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी॥ रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी॥ कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहु॥ समुझत जासु दूत कइ करनी। स्त्रवहीं गर्भ रजनीचर धरनी॥ तासु नारि निज सचिव बोलाई। पठवहु कंत जो चहहु भलाई॥ तब कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आई॥ सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित तुम्हार संभु अज कीन्हें॥

Dohā

-राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक। जब लगि ग्रसत तब लगि जतनु करहु तजि टेक॥36॥

अर्थवहाँ निशाचर तब से सशंकित रहते थे, जब से कपि लंका जलाकर गया। अपने-अपने घर में सब विचार करते — "निशाचर-कुल का उद्धार नहीं; जिसके दूत का बल वर्णन नहीं होता, उसके स्वामी के नगर आने में क्या भलाई?" दूतों से नगरवासियों की वाणी सुनकर मंदोदरी अत्यंत व्याकुल हुई। तन्मय होकर हाथ जोड़, पति के चरणों लगकर, नीति-रस में पगे वचन बोली — "हे कंत! हरि से बैर त्याग दीजिए; मेरी बात अत्यंत हित जानकर हृदय में धरिए। जिसके दूत की करनी समझते ही राक्षसियों के गर्भ गिर जाते हैं — हे कंत! यदि भला चाहते हैं, तो अपने मंत्री से उसकी पत्नी (सीता) को भेज दीजिए। जैसे पाला कमल-वन के लिए घातक है, वैसे ही सीता आपके कुल के लिए शीत-रात्रि-सी (घातक) आई हैं। हे नाथ! सुनिए — सीता को दिए बिना शंभु और ब्रह्मा भी आपका हित नहीं कर सकते। राम के बाण साँपों के समूह-समान हैं और निशाचरों के झुंड मेंढक; जब तक (वे) निगल न लें, तब तक हठ छोड़कर यत्न कर लीजिए।"
दोहा 37
Chaupāī

श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी॥ सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा॥ जौं आवइ मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई॥ कंपहिं लोकप जाकी त्रासा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा॥ अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई॥ मंदोदरी हृदयँ कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता॥ बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिंधु पार सेना सब आई॥ बूझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू॥ जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं। नर बानर केहि लेखे माही॥

Dohā

सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस। राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥37॥

अर्थउसकी वाणी सुनकर जगत-विख्यात अभिमानी मूढ़ हँसा: "स्त्री का स्वभाव सचमुच भयभीत होता है — मंगल में भी उसका कच्चा मन भय (मानता) है। यदि वानरों की सेना आए, तो बेचारे निशाचर उसे खाकर (सुख से) जिएँ! जिसका पति (मैं), जिसके त्रास से लोकपाल काँपते हैं, उसकी स्त्री का भयभीत होना बड़ी हँसी है।" ऐसा कहकर हँसते हुए उसे हृदय से लगाया, और ममता बढ़ाकर सभा को चला। मंदोदरी हृदय में चिंता करने लगी — "मेरे कंत पर विधि विपरीत हो गया।" वह सभा में बैठा और यह खबर पाई कि सारी सेना समुद्र पार आ गई। उसने मंत्रियों से पूछा — "उचित मत कहो।" वे सब हँसे — "चुप होकर निश्चिंत रहिए। आपने देव-असुर बिना श्रम जीते; मनुष्य और वानर किस गिनती में?" जब मंत्री, वैद्य और गुरु — ये तीन — भय या आशा (लाभ) से प्रिय बोलते हैं, तब राज्य, शरीर और धर्म — इन तीनों का शीघ्र ही नाश हो जाता है।
दोहा 38
Chaupāī

सोइ रावन कहुँ बनि सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई॥ अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा॥ पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाइ अनुसासन॥ जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरुप कहउँ हित ताता॥ जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना॥ सो परनारि लिलार गोसाईं। तजउ चउथि के चंद कि नाई॥ चौदह भुवन एक पति होई। भूतद्रोह तिष्टइ नहिं सोई॥ गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहइ कोऊ॥

Dohā

काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ। सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत॥38॥

अर्थवही (चापलूसी) रावण की (नाश में) सहायक बन गई; वे सुना-सुनाकर स्तुति करते रहे। अवसर जानकर विभीषण आए, भाई के चरणों में सिर नवाया, फिर सिर नवाकर अपने आसन पर बैठे, और आज्ञा पाकर बोले — "हे कृपालु! यदि आप मुझसे बात पूछते हैं, तो हे तात! मैं बुद्धि के अनुरूप हित कहता हूँ। जो अपना कल्याण, सुयश, सुमति, शुभ गति और नाना सुख चाहता है, वह परस्त्री का ललाट (मुख) भी, हे स्वामी! चौथ के चंद्रमा की भाँति त्याग दे। चौदह भुवनों का एक ही स्वामी क्यों न हो, भूतों से द्रोह करता हुआ वह टिक नहीं सकता। जो मनुष्य गुणों का सागर और चतुर हो, उसमें थोड़ा-सा लोभ भी कोई भला नहीं कहता। हे नाथ! काम, क्रोध, मद और लोभ — सब नरक के मार्ग हैं; इन सबको त्यागकर रघुवीर को भजिए, जिन्हें संत भजते हैं।"
दोहा 39
Chaupāī

तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला॥ ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता॥ गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपासिंधु मानुष तनुधारी॥ जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता॥ ताहि बयरु तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भंजन रघुनाथा॥ देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही॥ सरन गएँ प्रभु ताहु त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा॥ जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन॥

Dohā

बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस। परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस॥39(क)॥ मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात। तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात॥39(ख)॥

अर्थ"हे तात! राम मनुष्य या राजा नहीं — वे भुवनेश्वर, काल के भी काल, अनामय ब्रह्म, अजन्मा भगवान्, व्यापक, अजित, अनादि और अनंत हैं। गो, ब्राह्मण, धेनु (पृथ्वी) और देवताओं के हितकारी, कृपासिंधु मानव-देह धारण किए हुए; भक्तों को रिझाने वाले, दुष्ट-समूह का नाश करने वाले, वेद-धर्म के रक्षक — सुनिए, भ्राता। उनसे बैर त्यागकर माथा नवाइए — प्रणत की पीड़ा हरने वाले रघुनाथ। हे स्वामी! प्रभु को वैदेही दे दीजिए; बिना हेतु के स्नेही राम को भजिए। शरण गए को प्रभु नहीं त्यागते — चाहे विश्व-द्रोह का पाप ही क्यों न लगा हो। जिनका नाम तीनों तापों का नाश करता है, वही प्रभु प्रकट (यहाँ) हैं; हे रावण! जी में समझो। हे दशशीश! बार-बार चरणों लगता हूँ, विनय करता हूँ: मान-मोह-मद त्यागकर कोसलाधीश को भजिए। मुनि पुलस्त्य ने अपने शिष्य से यह बात कहला भेजी; हे तात! सुअवसर पाकर वह मैंने तुरंत प्रभु (आप) से कह दी।"
दोहा 40
Chaupāī

माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना॥ तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन॥ रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि करहु इहाँ हइ कोऊ॥ माल्यवंत गृह गयउ बहोरी। कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी॥ सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं॥ जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥ तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता॥ कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी॥

Dohā

तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार। सीत देहु राम कहुँ अहित होइ तुम्हार॥40॥

अर्थमाल्यवान् नामक अत्यंत बुद्धिमान् मंत्री ने उनके वचन सुनकर बहुत सुख माना: "हे तात! आपका अनुज नीति का भूषण है; विभीषण जो कहता है, उसे हृदय में धरिए।" (रावण बोला —) "ये दोनों मूढ़ शत्रु का उत्कर्ष कहते हैं — यहाँ कोई है कि नहीं? इन्हें दूर करो!" तब माल्यवान् घर चला गया; विभीषण ने फिर हाथ जोड़कर कहा — "हे नाथ! सुमति और कुमति सबके हृदय में रहती हैं — पुराण-निगम ऐसा कहते हैं। जहाँ सुमति, वहाँ नाना संपत्ति; जहाँ कुमति, वहाँ अंत में विपत्ति। आपके हृदय में विपरीत कुमति बस गई है — आप हित को अहित और शत्रु को प्रिय मानते हैं। जो निशाचर-कुल के लिए कालरात्रि है, उस सीता पर आपकी बड़ी प्रीति है। हे तात! चरण पकड़कर माँगता हूँ — मेरा दुलार रखिए; सीता राम को दे दीजिए, ताकि आपका अहित न हो।"
दोहा 41
Chaupāī

बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी॥ सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मुत्यु अब आई॥ जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा॥ कहसि खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाही॥ मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती॥ अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा॥ उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई॥ तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा॥ सचिव संग लै नभ पथ गयऊ। सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ॥

Dohā

रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि। मै रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि॥41॥

अर्थविभीषण ने ज्ञानियों, पुराणों और श्रुति से सम्मत नीति बखानकर कही। सुनते ही दशानन क्रोध से उठा: "रे खल! अब तेरी मृत्यु निकट आ गई! रे मूढ़! तू सदा मेरे जिलाए जीता है, फिर भी तुझे शत्रु का पक्ष भाता है। कह रे खल — जगत् में ऐसा कौन है जिसे मैंने भुजबल से न जीता हो? मेरे नगर में बसकर तपस्वियों पर प्रीति? रे मूढ़! जा, उन्हीं से मिल और उन्हें नीति सिखा!" ऐसा कहकर लात मारी; फिर भी अनुज ने बार-बार चरण पकड़े। (शिव कहते हैं —) हे उमा! संत की यही बड़ाई है — जो बुरा करे, उसका भी भला करते हैं। "आप पिता-समान हैं; भले ही मुझे मारा। हे नाथ! राम को भजने में ही आपका हित है।" मंत्रियों को साथ लेकर वे आकाश-मार्ग से गए, और सबको सुनाकर यह कहते हुए चले: "राम सत्यसंकल्प प्रभु हैं; (लंका की) सभा और तुम काल के वश हो। मैं अब रघुवीर की शरण जाता हूँ; मुझे दोष न देना।"
दोहा 42
Chaupāī

अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयूहीन भए सब तबहीं॥ साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी॥ रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा॥ चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं॥ देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता॥ जे पद परसि तरी रिषिनारी। दंडक कानन पावनकारी॥ जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए॥ हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मै देखिहउँ तेई॥

Dohā

जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ। ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ॥42॥

अर्थविभीषण ऐसा कहकर ज्यों ही चले, त्यों ही सब (राक्षस) आयुहीन (नष्टप्राय) हो गए। हे भवानी! साधु का अपमान तुरंत समस्त कल्याण की हानि कर देता है। रावण ने ज्यों ही विभीषण को त्यागा, त्यों ही वह अभागा वैभव-रहित हो गया। (विभीषण) हर्षित होकर रघुनाथ की ओर चले, मन में बहुत मनोरथ करते हुए: "जाकर उन चरण-कमलों के दर्शन करूँगा — अरुण, कोमल, सेवकों को सुख देने वाले; जिन चरणों के स्पर्श से ऋषि-पत्नी (अहल्या) तरीं और दंडक वन पावन हुआ; जिन चरणों को जानकी हृदय में लगाती हैं, जो कपट-मृग के पीछे पृथ्वी पर दौड़े; जो शिव के हृदय-सरोवर के कमल हैं — अहोभाग्य, उन्हीं को मैं देखूँगा। जिन चरणों की पादुकाओं में भरत मन लगाए हुए हैं, उन्हीं चरणों को आज इन नेत्रों से जाकर देखूँगा।"
दोहा 43
Chaupāī

एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा॥ कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा॥ ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए॥ कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई॥ कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा। कहइ कपीस सुनहु नरनाहा॥ जानि जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया॥ भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा॥ सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी॥ सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना॥

Dohā

सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि। ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि॥43॥

अर्थइस प्रकार प्रेमपूर्वक विचार करते हुए वे शीघ्र समुद्र के इस पार आए। वानरों ने विभीषण को आते देखा और उन्हें कोई विशेष शत्रु-दूत जाना; उन्हें (वहीं) रखकर वे कपीश सुग्रीव के पास आए और सब समाचार सुनाया। सुग्रीव बोले — "हे रघुराज! सुनिए — दशानन का भाई मिलने आया है।" प्रभु बोले — "हे सखा! क्या विचार है?" कपीश ने कहा — "हे नरनाथ! सुनिए — निशाचर की माया जानी नहीं जाती; यह कामरूप किस कारण आया? यह मूढ़ हमारा भेद लेने आया है; इसे बाँधकर रखिए — मुझे ऐसा भाता है।" "हे सखा! तुमने नीति अच्छी विचारी; पर मेरा प्रण शरणागत का भय हरना है।" प्रभु के वचन सुनकर हनुमान हर्षित हुए — शरणागत-वत्सल भगवान्। जो शरण आए को अपना अहित अनुमान कर त्याग देते हैं, वे मनुष्य पामर और पापमय हैं; उनको देखने में भी हानि है।
दोहा 44
Chaupāī

कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥ सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥ पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव काऊ॥ जौं पै दुष्टहदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई॥ निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र भावा॥ भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ कछु भय हानि कपीसा॥ जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते॥ जौं सभीत आवा सरनाई। रखिहउँ ताहि प्रान की नाई॥

Dohā

उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत। जय कृपाल कहि चले अंगद हनू समेत॥44॥

अर्थ"चाहे कोई करोड़ ब्राह्मणों के वध का दोषी हो, फिर भी शरण आने पर मैं उसे भी नहीं त्यागता। जीव ज्यों ही मेरे सम्मुख होता है, त्यों ही करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। पापी का सहज स्वभाव यही है कि मेरा भजन उसे कभी नहीं भाता; यदि वह (विभीषण) सचमुच दुष्टहृदय होता, तो क्या मेरे सम्मुख आ सकता? निर्मल मन वाला जन मुझे पाता है; मुझे कपट, छल और छिद्र नहीं भाते। दशशीश ने भेद लेने भेजा हो — तब भी कुछ भय या हानि नहीं, हे कपीश। हे सखा! जगत् में जितने निशाचर हैं, लक्ष्मण उतने को क्षण भर में मार डालें। यदि भयभीत होकर शरण आया है, तो मैं उसे प्राणों की भाँति रखूँगा।" "दोनों ही प्रकार से उसे ले आओ," कृपा के धाम ने हँसकर कहा। "जय कृपालु" कहकर अंगद हनुमान सहित चले।
दोहा 45
Chaupāī

सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर॥ दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता॥ बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी॥ भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन॥ सिंघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा॥ नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता॥ नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता॥ सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा॥

Dohā

श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर। त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर॥45॥

अर्थआदरपूर्वक वानरों को आगे कर वे वहाँ चले जहाँ करुणाकर रघुपति थे। दूर से ही उन्होंने दोनों भाइयों को देखा, जो नेत्रों को आनंद का दान देने वाले हैं; फिर शोभा के धाम राम को देखकर वे ठिठक गए, एकटक पलक रोककर निहारते रहे। लंबी भुजाएँ, कमल-से अरुण नेत्र, श्यामल शरीर, प्रणत के भय को छुड़ाने वाले; सिंह-से कंधे, चौड़ा सुंदर वक्ष, अमित मुख जो कामदेव के मन को भी मोह ले। नेत्रों में जल, शरीर अत्यंत पुलकित, मन में धीरज धरकर उन्होंने कोमल वचन कहे: "हे नाथ! मैं दशानन का भाई हूँ; निशाचर-वंश में जन्म, हे सुरत्राता; मेरी तामसी देह सहज ही पापप्रिय है, जैसे उल्लू को अंधकार से स्नेह। हे प्रभु! आपका सुयश कानों से सुनकर आया हूँ, भव-भय के नाशक; त्राहि त्राहि, हे आर्ति हरने वाले, शरण में सुख देने वाले रघुवीर!"
दोहा 46
Chaupāī

अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा॥ दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा॥ अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी॥ कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा॥ खल मंडलीं बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती॥ मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन भाव अनीती॥ बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता॥ अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्ह जानि जन दाया॥

Dohā

तब लगि कुसल जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम। जब लगि भजत राम कहुँ सोक धाम तजि काम॥46॥

अर्थऐसा कहते हुए (विभीषण को) दंडवत करते देख प्रभु विशेष हर्ष से तुरंत उठे। दीन वचन सुनकर प्रभु के मन को भाया; विशाल भुजाओं से पकड़कर हृदय से लगा लिया। अनुज सहित मिलकर पास बैठाया, और भक्तों का भय हरने वाले वचन बोले: "हे लंकेश! परिवार सहित कहो — ऐसे कुठौर में आपका वास कुशल तो है? हे सखा! दुष्टों की मंडली में दिन-रात बसकर धर्म किस प्रकार निभता है? मैं आपकी सब रीति जानता हूँ — आप अति नीति-निपुण हैं, अनीति आपको नहीं भाती। हे तात! नरक में बास भी अच्छा — पर विधाता दुष्ट का संग न दे। अब (मेरे) चरण देखकर कुशल है, हे रघुराज, क्योंकि आपने मुझे जन जानकर दया की।" तब तक जीव को कुशल नहीं, न स्वप्न में भी मन को विश्राम, जब तक वह काम (शोक के धाम) को त्यागकर राम को नहीं भजता।
दोहा 47
Chaupāī

तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना॥ जब लगि उर बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा॥ ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी॥ तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं॥ अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे॥ तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि ब्याप त्रिबिध भव सूला॥ मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ॥ जासु रूप मुनि ध्यान आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा॥

Dohā

-अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज। देखेउँ नयन बिरंचि सिब सेब्य जुगल पद कंज॥47॥

अर्थतब तक हृदय में अनेक दुष्ट — लोभ, मोह, मत्सर, मद और मान — बसते हैं, जब तक उसमें धनुष-बाण और कमर में तरकश धारण किए रघुनाथ नहीं बसते। (तब तक) ममता की घोर रात्रि अंधकारमयी रहती है, जो राग-द्वेष रूपी उल्लुओं को सुखकारी है; (तब तक) वे जीव के मन में बसते हैं, जब तक प्रभु के प्रताप-रूपी सूर्य का (उदय) नहीं हुआ। "हे राम! अब मैं कुशल हूँ, मेरे भारी भय मिट गए, आपके चरण-कमल देखकर। हे कृपालु! आप जिस पर अनुकूल हों, उसे त्रिविध भव-पीड़ा नहीं व्यापती। मैं निशाचर, अत्यंत अधम स्वभाव; मैंने कभी एक भी शुभ आचरण नहीं किया। जिनका रूप मुनियों के ध्यान में भी नहीं आता, उन प्रभु ने हर्षित होकर मुझे हृदय से लगा लिया।" हे राम, कृपा और सुख के पुंज! मेरा अहोभाग्य अमित और अत्यंत है — मैंने ब्रह्मा और शिव द्वारा सेव्य दोनों चरण-कमल नेत्रों से देखे।
दोहा 48
Chaupāī

सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ॥ जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवे सभय सरन तकि मोही॥ तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना॥ जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा॥ सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥ समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं॥ अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें॥ तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें॥

Dohā

सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम। ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम॥48॥

अर्थ"हे सखा! सुनो, मैं अपना स्वभाव कहता हूँ, जिसे भुसुंडि, शंभु और गिरिजा जानते हैं: यदि कोई मनुष्य चराचर का द्रोही हो, फिर भी भयभीत होकर मेरी शरण ताककर आए, और मद, मोह, कपट तथा नाना छल त्याग दे, तो मैं उसे तुरंत साधु के समान कर देता हूँ। माता, पिता, भाई, पुत्र, स्त्री, शरीर, धन, घर, सुहृद और परिवार — सबकी ममता के तागे बटोरकर एक डोरी बनाकर मन को मेरे चरणों में बाँध दे। समदर्शी, इच्छारहित, मन में हर्ष-शोक-भय रहित — ऐसा सज्जन मेरे हृदय में वैसे बसता है जैसे लोभी के हृदय में धन। तुम्हारे सरीखे संत मुझे प्रिय हैं; और किसी के निहोरे (कारण) मैं देह नहीं धरता।" सगुण के उपासक, परहित में लगे, नीति में दृढ़ और नियम में पक्के — वे मनुष्य मुझे प्राणों के समान प्रिय हैं, जिनके हृदय में ब्राह्मणों के चरणों का प्रेम है।
दोहा 49
Chaupāī

सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें॥ राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा॥ सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी॥ पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात प्रेमु अपारा॥ सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी॥ उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही॥ अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी॥ एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा॥ जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं॥ अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा॥

Dohā

रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड। जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखंड॥49(क)॥ जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ। सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ॥49(ख)॥

अर्थ"हे लंकेश! सुनो — ये सब गुण तुम में हैं; इसीलिए तुम मुझे अत्यंत प्रिय हो।" राम के वचन सुनकर वानर-यूथ सब बोले, "कृपा के समूह की जय!" प्रभु की वाणी सुनकर विभीषण — उसे श्रवण-अमृत जानकर — तृप्त नहीं हुए; बार-बार चरण-कमल पकड़े, अपार प्रेम हृदय में समाता न था। "हे देव! चराचर के स्वामी, प्रणतपाल, हृदय के अंतर्यामी, सुनिए: मेरे हृदय में पहले कुछ वासना रही, पर वह प्रभु के चरणों की प्रीति-रूपी नदी में बह गई। अब हे कृपालु! सदा शिव के मन को भाने वाली अपनी पावन भक्ति दीजिए।" "एवमस्तु" कहकर रणधीर प्रभु ने तुरंत समुद्र का जल माँगा: "हे सखा! यद्यपि तुम्हारी इच्छा नहीं, पर जगत् में मेरा दर्शन अमोघ है।" ऐसा कहकर राम ने उन्हें तिलक किया; आकाश से अपार पुष्प-वृष्टि हुई। रावण के क्रोध-रूपी अग्नि को अपने श्वास-रूपी प्रचंड पवन से (धधका हुआ), उसमें जलते विभीषण को (राम ने) बचा लिया और अखंड राज्य दिया। जो संपत्ति शिव ने रावण को दस सिर चढ़ाने पर दी, वही संपदा रघुनाथ ने सकुचाते हुए विभीषण को दी।
दोहा 50
Chaupāī

अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना॥ निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा॥ पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी॥ बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक॥ सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा॥ संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँती॥ कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक॥ जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई॥

Dohā

प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि। बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि॥50॥

अर्थ(ऐसे प्रभु को) जो छोड़कर और किसी को भजते हैं, वे बिना पूँछ-सींग के पशु हैं। उन्हें अपना जन जानकर (प्रभु ने) अपनाया; प्रभु का स्वभाव वानर-कुल के मन को भाया। फिर सर्वज्ञ, सबके हृदय में बसने वाले, सर्वरूप, सबसे रहित और उदासीन (प्रभु) नीति का प्रतिपालन करने वाले वचन बोले — कारण-रूप, मनुष्य-देह धारी, दनुज-कुल के नाशक: "हे कपीश! और हे लंकापति वीर! सुनो — मगरमच्छ, सर्प और (अनेक) जाति की मछलियों से भरा, अत्यंत अगाध और सब प्रकार से दुस्तर यह गंभीर समुद्र किस विधि तरा जाए?" लंकेश ने कहा, "हे रघुनायक! सुनिए — यद्यपि आपका बाण करोड़ों समुद्रों को सोखने वाला है, फिर भी नीति ऐसी गाई गई है: जाकर सागर से विनय कीजिए। हे प्रभु! समुद्र आपके कुलगुरु हैं — वे विचारकर उपाय बताएँगे, और बिना प्रयास के समस्त भालू-वानर की सेना तर जाएगी।"
दोहा 51
Chaupāī

सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिअ दैव जौं होइ सहाई॥ मंत्र यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा॥ नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा॥ कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा॥ सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा॥ अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु समीप गए रघुराई॥ प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई॥ जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए॥

Dohā

सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह। प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह॥51॥

अर्थ"हे सखा! तुमने अच्छा उपाय कहा; ऐसा ही किया जाए — यदि दैव सहायक हो।" यह मंत्र लक्ष्मण के मन को न भाया; राम के वचन सुनकर उन्हें अत्यंत दुख हुआ: "हे नाथ! दैव का क्या भरोसा? मन में रोष कर समुद्र को सोख डालिए। कायर के मन को एक ही आधार होता है; आलसी 'दैव-दैव' पुकारता है।" सुनकर रघुवीर हँसकर बोले, "ऐसा ही करूँगा; मन में धीरज धरो।" ऐसा कहकर और अनुज को समझाकर रघुराज समुद्र के समीप गए; पहले सिर नवाकर प्रणाम किया, फिर तट पर कुश बिछाकर बैठ गए। ज्यों ही विभीषण प्रभु के पास आए, रावण ने पीछे दूत भेजे। उन्होंने कपट से वानर-देह धरकर सब चरित्र देखे; हृदय में प्रभु के गुणों की सराहना की — शरणागत पर उनका स्नेह।
दोहा 52
Chaupāī

प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ॥ रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने॥ कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर॥ सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहु पास फिराए॥ बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि त्यागे॥ जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना॥ सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोडाए॥ रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती॥

Dohā

कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार। सीता देइ मिलेहु आवा काल तुम्हार॥52॥

अर्थउन्होंने प्रकट रूप से राम का स्वभाव बखाना; अत्यंत प्रेम में उनका छिपाव भूल गया। तब वानरों ने उन्हें शत्रु के दूत जाना, सबको बाँधकर सुग्रीव के पास लाए। सुग्रीव बोले, "हे सब वानरो! सुनो — निशाचरों के अंग-भंग करके भेज दो।" सुग्रीव के वचन सुनकर वानर दौड़े, बाँधकर सेना के चारों ओर फिराया; अनेक प्रकार से मारने लगे; (दूत) दीन होकर पुकारते, फिर भी न छोड़ा। "जो हमारी नाक-कान काटेगा, उसे कोसलाधीश की शपथ!" यह सुनकर लक्ष्मण ने सबको निकट बुलाया और दया आने से तुरंत हँसकर छुड़ा दिया: "यह पत्र रावण के हाथ देना; हे कुलघाती! लक्ष्मण के वचन पढ़ना। मूढ़ के सामने मुखाग्र (ज़ोर से) मेरा उदार संदेश कहना: सीता देकर मिल जाओ, नहीं तो तुम्हारा काल आ गया।"
दोहा 53
Chaupāī

तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा॥ कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए॥ बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि सुक आपनि कुसलाता॥ पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी॥ करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जब कर कीट अभागी॥ पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई॥ जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा॥ कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी॥

Dohā

-की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर। कहसि रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर॥53॥

अर्थतुरंत लक्ष्मण के चरणों में सिर नवाकर दूत चले, उनके (राम के) गुणों की गाथा वर्णन करते हुए। राम का यश गाते हुए वे लंका आए और रावण के चरणों में सिर नवाए। दशानन ने हँसकर बात पूछी: "हे शुक! क्या तू अपनी कुशल नहीं कहता? फिर विभीषण की खबर कह, जिसे मृत्यु अत्यंत निकट आ गई — जिस मूढ़ ने लंका का राज त्याग दिया; वह अभागा कब काल का कीट होगा? फिर भालू-वानर की सेना का हाल कह, जो कठिन काल की प्रेरणा से चली आई — जिनके जीवन का रक्षक कोमल-चित्त मूढ़ समुद्र हो गया। फिर उन तपस्वियों की बात कह, जिनके हृदय में मेरा अत्यंत त्रास है — क्या (सेना से) भेंट हुई, या मेरा सुयश सुनकर लौट गए? कह — क्या शत्रु-दल के तेज-बल से तेरा चित्त बहुत चकित नहीं है?"
दोहा 54
Chaupāī

नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें॥ मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा॥ रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना॥ श्रवन नासिका काटै लागे। राम सपथ दीन्हे हम त्यागे॥ पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि जाई॥ नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी॥ जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा॥ अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला॥

Dohā

द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि। दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि॥54॥

अर्थ"हे नाथ! जैसे आपने कृपा कर पूछा, वैसे ही क्रोध त्यागकर सुनिए। जब आपके अनुज जाकर (राम से) मिले, तो जाते ही राम ने उन्हें तिलक कर दिया (राजा बना दिया)। हमें रावण के दूत सुनकर वानरों ने बाँधकर नाना दुख दिए; कान-नाक काटने लगे; राम की शपथ देने पर हमें छोड़ा। हे नाथ! आपने राम की सेना पूछी — सौ करोड़ मुखों से भी वर्णन नहीं की जा सकती। अनेक रंग के भालू-वानरों के समूह, विकट मुख, विशाल, भयंकर; जिसने नगर जलाया और आपके पुत्र को मारा, उसका बल भी सब वानरों में थोड़ा है। अमित नाम वाले भट, कठोर-कराल, अमित हाथियों के बल वाले, विपुल-विशाल: द्विविद, मयंद, नील, नल, अंगद, गद, विकटास्य, दधिमुख, केसरी, दुष्ट निशठ, और बल की राशि जाम्बवान।"
दोहा 55
Chaupāī

कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना॥ राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रेलोकहि गनहीं॥ अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर॥ नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो तुम्हहि जीतै रन माहीं॥ परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै देहिं रघुनाथा॥ सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहीं भरि कुधर बिसाला॥ मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा॥ गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहु ग्रसन चहत हहिं लंका॥

Dohā

-सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम। रावन काल कोटि कहु जीति सकहिं संग्राम॥55॥

अर्थ"ये वानर सब सुग्रीव के समान हैं; इन-जैसे करोड़ों को कौन गिने? राम की कृपा से उनका बल अतुलनीय है; वे त्रैलोक्य को तृण-समान गिनते हैं। हे दशकंधर! मैंने कानों से ऐसा सुना — अठारह पद्म वानर-यूथपति हैं। हे नाथ! सेना में वह वानर नहीं जो रण में आपको न जीते। परम क्रोध में सब हाथ मलते हैं, पर रघुनाथ आज्ञा नहीं देते; (नहीं तो) मछली-साँपों सहित समुद्र सोख डालें, या विशाल पर्वतों से उसे भरकर पूर दें; दशशीश को मसलकर धूल में मिला दें — ऐसे ही वचन सब वानर कहते हैं। वे गरजते-तर्जते हैं, सहज निःशंक, मानो लंका को निगल जाना चाहते हों। सब वानर-भालू सहज शूरवीर हैं, और सिर पर प्रभु राम; वे संग्राम में करोड़ काल को भी जीत सकते हैं, रावण की तो बात ही क्या।"
दोहा 56
Chaupāī

राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं गाई॥ सक सर एक सोषि सत सागर। तब भ्रातहि पूँछेउ नय नागर॥ तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं॥ सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा॥ सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई॥ मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई॥ सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें॥ सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी। समय बिचारि पत्रिका काढ़ी॥ रामानुज दीन्ही यह पाती। नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती॥ बिहसि बाम कर लीन्ही रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन॥

Dohā

बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस। राम बिरोध उबरसि सरन बिष्नु अज ईस॥56(क)॥ की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग। होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग॥56(ख)॥

अर्थ"राम का तेज, बल और बुद्धि की विपुलता — सौ हज़ार शेष भी नहीं गा सकते। एक बाण से सौ समुद्र सोख सकते हैं; फिर भी नीति-निपुण ने भाई से पूछा। उनके (विभीषण के) वचन सुनकर वे समुद्र से मार्ग माँगते हैं, मन में दया लिए।" यह सुनकर दशानन हँसा: "यदि ऐसी मति है, और वानर को सहायक बनाया! सहज भीरु (विभीषण) के वचन दृढ़ कर उसने समुद्र से मचलाहट ठानी। रे मूढ़! झूठी बड़ाई क्यों करता है? मैंने शत्रु के बल-बुद्धि की थाह पा ली। जिसका मंत्री विभीषण भयभीत हो, उसके लिए जगत् में विजय-विभूति कहाँ?" खल के वचन सुनकर दूत का रोष बढ़ा; समय विचारकर पत्रिका निकाली: "राम के अनुज ने यह पत्र दिया; हे नाथ! इसे बँचवाकर छाती जुड़ाइए।" हँसकर रावण ने बाएँ हाथ में लिया और मंत्री को बुलाकर मूढ़ बँचवाने लगा। "रे मूढ़! बातों से अपने को रिझाकर कुल का नाश मत कर; राम-विरोध में तू नहीं बचेगा, विष्णु-ब्रह्मा-शिव की शरण लेकर भी। या तो मान त्यागकर अनुज (विभीषण) की भाँति प्रभु के चरण-कमलों का भृंग बन; या रे खल! कुल सहित राम के बाण-रूपी अग्नि का पतंगा बन।"
दोहा 57
Chaupāī

सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई॥ भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा॥ कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी॥ सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा॥ अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ॥ मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध एकउ धरिही॥ जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे। जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही॥ नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ॥ करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई॥ रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी॥ बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा॥

Dohā

बिनय मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति। बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ प्रीति॥57॥

अर्थसुनकर मन में भयभीत (पर) मुख से मुस्कुराते हुए दशानन ने सबको सुनाकर कहा: "भूमि पर पड़ा आकाश को पकड़ता है — यह छोटे तपस्वी की बाग-विलास (नटखटी) है!" शुक बोला, "हे नाथ! सब वाणी सत्य है; अभिमानी प्रकृति छोड़कर समझिए। क्रोध त्यागकर मेरे वचन सुनिए; हे नाथ! राम से विरोध छोड़िए। रघुवीर का स्वभाव अति कोमल है, यद्यपि वे अखिल लोक के राजा हैं; मिलते ही वे आप पर कृपा करेंगे, और हृदय में एक भी अपराध न धरेंगे। जानकी जी रघुनाथ को दे दीजिए; हे नाथ! मेरा इतना कहा कीजिए।" जब उसने वैदेही देने को कहा, तो मूढ़ ने उसे लात मारी। (रावण के) चरणों में सिर नवाकर वह वहाँ गया जहाँ कृपासिंधु रघुनाथ थे; प्रणाम कर अपनी कथा सुनाई, और राम की कृपा से अपनी गति (रूप) पाई। हे भवानी! ऋषि अगस्त्य के शाप से वह राक्षस हुआ था — (वस्तुतः) ज्ञानी मुनि; बार-बार राम के चरण वंदन कर मुनि अपने आश्रम को चले। (इधर) जड़ समुद्र विनय न माने; तीन दिन बीत गए; तब राम सक्रोध बोले — भय बिना प्रीति (अनुपालन) नहीं होती।
दोहा 58
Chaupāī

लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू॥ सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती॥ ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी॥ क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा॥ अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा॥ संघानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला॥ मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने॥ कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना॥

Dohā

काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच। बिनय मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच॥58॥

अर्थ"हे लक्ष्मण! धनुष-बाण लाओ; मैं अग्नि-बाणों से समुद्र को सोख डालूँगा। मूढ़ से विनय, कुटिल से प्रीति, जन्मजात कृपण से सुंदर नीति, ममता में रत से ज्ञान की कथा, अति लोभी से वैराग्य का बखान, क्रोधी और कामी से हरि-कथा — (ये सब) ऊसर में बीज बोकर फल (पाने) के समान हैं।" ऐसा कहकर रघुपति ने धनुष चढ़ाया; यह मत लक्ष्मण के मन को भाया। प्रभु ने कराल बाण संधान किया; समुद्र के उर के भीतर ज्वाला उठी। मगर, सर्प और मछलियों के समूह व्याकुल हो उठे; जब समुद्र ने अपने जंतुओं को जलते जाना, तब मान त्यागकर, मणियों से भरा सोने का थाल लिए ब्राह्मण-रूप में आया। हे खगेश! सुनिए — केले का पेड़ काटने पर ही फलता है, चाहे कोई करोड़ यत्न से सींचे; विनय नहीं माना जाता — नीच डाँटने पर ही झुकते हैं।
दोहा 59
Chaupāī

सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे॥ गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी॥ तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए॥ प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहे सुख लहई॥ प्रभु भल कीन्ही मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही॥ ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥ प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु मोरि बड़ाई॥ प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जौ तुम्हहि सोहाई॥

Dohā

सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ। जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ॥59॥

अर्थभयभीत होकर समुद्र ने प्रभु के चरण पकड़े: "हे नाथ! मेरे सब अवगुण क्षमा कीजिए। आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी — हे नाथ! इनकी सहज करनी जड़ है; आपकी प्रेरणा से माया ने (इन्हें) सृष्टि के लिए उत्पन्न किया, ऐसा सब ग्रंथ गाते हैं। प्रभु की जिसके लिए जैसी आज्ञा है, वह उसी भाँति रहकर सुख पाता है। प्रभु ने भला किया, मुझे सीख दी; फिर भी आपने अपनी यह मर्यादा भी रखी: ढोल, गँवार, शूद्र, पशु और नारी — ये सब ताड़ना (सँभाल/अनुशासन) के अधिकारी हैं। प्रभु के प्रताप से मैं सूख जाऊँगा, और सेना पार उतर जाएगी — पर यह मेरी बड़ाई नहीं। प्रभु की आज्ञा अपेल (अटल) है, श्रुति गाती हैं; जो आपको रुचे, वही मैं शीघ्र करूँगा।" उनके अत्यंत विनीत वचन सुनकर कृपालु ने मुस्कुराकर कहा, "हे तात! जिस विधि वानरों की सेना पार उतरे, वह उपाय बताओ।"
दोहा 60
Chaupāī

नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाई रिषि आसिष पाई॥ तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे॥ मैं पुनि उर धरि प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई॥ एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ॥ एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी॥ सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा॥ देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी॥ सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा॥

Chhanda

निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ। यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ॥ सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना॥ तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना॥

Dohā

सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान। सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥60॥

अर्थ"हे नाथ! नील और नल, दो वानर भाई, बचपन में ऋषि का आशीर्वाद पा चुके हैं: उनके स्पर्श करने से भारी पर्वत भी आपके प्रताप से समुद्र पर तैर जाएँगे। और मैं भी आपकी प्रभुता हृदय में धरकर बल के अनुसार सहायता करूँगा। हे नाथ! इस प्रकार समुद्र बँधवा दीजिए, जिससे यह सुयश तीनों लोकों में गाया जाए। हे नाथ! इस बाण से मेरे उत्तर तट पर बसने वाले पापियों — दुष्ट जनों के पाप-समूह — का वध कर दीजिए।" सुनकर रणधीर कृपालु ने तुरंत समुद्र की मन-पीड़ा हर ली। राम का महान् बल-पौरुष देख समुद्र हर्षित होकर सुखी हुआ; प्रभु को सब चरित्र कहकर और चरण वंदन कर समुद्र चला गया। समुद्र अपने भवन को गया; श्रीरघुपति को यह मत भाया। यह चरित्र, कलियुग के मल का हरने वाला, दास तुलसी ने यथामति गाया — सुख का धाम, संशय का शमन, विषाद का दमन: रघुपति के गुण-समूह। सब आस-भरोसा त्यागकर, हे मूढ़ मन! इसे गा और निरंतर सुन। समस्त सुमंगल के दाता रघुनायक का गुण-गान — जो आदर से सुनते हैं, वे बिना जलयान के भव-सागर तर जाते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुंदरकांड क्या है?
सुंदरकांड गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस का पाँचवाँ कांड है, जो अवधी में रचित है। इसमें हनुमान जी का समुद्र लाँघकर लंका जाना, अशोक वाटिका में सीता जी को खोजना, लंका दहन और समाचार लेकर लौटना वर्णित है — यही एकमात्र कांड है जिसमें नायक भक्त हनुमान हैं। यह रामचरितमानस का सर्वाधिक पढ़ा जाने वाला भाग है, जिसका पारायण साहस, सफलता और विघ्न-नाश के लिए किया जाता है।
सुंदरकांड का पाठ सफलता और विघ्नों के लिए क्यों किया जाता है?
क्योंकि यह सिद्धि का कांड है: भक्ति और बल के मूर्तरूप हनुमान असंभव-से कार्य को पूर्ण करते हैं — समुद्र लाँघना, सीता जी को खोजना और सकुशल लौटना। भक्त इसका पाठ (विशेषकर मंगल व शनिवार को तथा हनुमान उपासना में) उसी साहस व सफलता को पाने और अपने जीवन की कठिनाइयों को दूर करने के लिए करते हैं।
सुंदरकांड का पाठ कैसे करें?
पारंपरिक पारायण तीन संस्कृत मंगलाचरण श्लोकों (“शान्तं शाश्वतम्…”) से आरंभ होता है, फिर क्रमशः चौपाइयों व दोहों का पाठ होता है, और अंत में श्रीराम अथवा हनुमान जी की आरती से समापन होता है। अनेक भक्त सम्पूर्ण सुंदरकांड एक ही बैठक में पूर्ण करते हैं; अर्थ सहित पढ़ने से भाव और गहरा होता है।