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अमर फल

सिंहासन बत्तीसी — पहली पुतली

पात्र: राजा विक्रमादित्य · राजा भोज · पहली पुतली · वृद्ध तपस्वी

महान राजा विक्रमादित्य के स्वर्गवास के बहुत समय बाद, उनका अद्भुत सिंहासन उज्जैन के पास एक खेत में दबा पड़ा था। जब राजा भोज ने उसे खोज निकाला, तो उनकी खुशी का ठिकाना न रहा, क्योंकि उस सिंहासन में बत्तीस सुंदर पुतलियाँ गढ़ी हुई थीं और वह सुबह के सूरज-सा दमकता था। उन्होंने उसे महल में रखवाया, शुभ दिन चुना, और उस पर बैठने के लिए आगे बढ़े।

तभी पहली पुतली सजीव हो उठी और उसने अपना नन्हा हाथ उठाया। "ठहरिए, राजन्!" वह बोली। "यह विक्रमादित्य का सिंहासन है। इस पर वही बैठ सकता है जो उनके जैसा महान हो। पहले सुनिए कि वे कैसे राजा थे।"

और उसने यह कथा सुनाई। एक दिन विक्रमादित्य के दरबार में एक वृद्ध तपस्वी एक सुनहरा फल लिए आया। उसने कहा, "महाराज, वर्षों की तपस्या से प्रसन्न होकर देवताओं ने मुझे यह अमर फल दिया है। जो इसे खाएगा, वह न कभी बूढ़ा होगा, न कभी मरेगा। मैं वृद्ध हूँ और मेरा काम पूरा हो चुका — पर आप न्यायी हैं, और आपके जीवन से हज़ारों की रक्षा होती है। इसे आप खाइए।" पूरे दरबार की साँसें थम गईं। ऐसा उपहार आज तक किसी राजा को नहीं मिला था।

विक्रमादित्य ने फल हाथ में लिया और देर तक उसे देखते रहे। फिर उन्होंने सोचा: "यदि मैं सदा जीवित रहूँ और मेरी प्रजा रोग, बुढ़ापे और दुख झेलती रहे, तो मैं कैसा राजा हुआ? राजा की सच्ची अमरता अनंत आयु नहीं — न्याय, दान और प्रजा का प्रेम है, जो उसके बाद भी जीवित रहते हैं।" तभी द्वारपाल एक निर्धन ब्राह्मण को भीतर लाए, जो रोग से दुर्बल था और अपने परिवार के लिए सहायता माँगने आया था। विक्रमादित्य सिंहासन से उठे, अमर फल और सोने की एक थैली उस दीन के हाथों में रखी और बोले, "संसार को मेरे जीवन से अधिक तुम्हारे परिवार को तुम्हारे जीवन की आवश्यकता है।"

पुतली राजा भोज की ओर देखकर मुस्कुराई। "स्वयं अमरता उनके हाथ में थी, हे भोज, और उन्होंने उसे प्रसन्न मन से दान कर दिया। सच-सच कहिए — क्या आप ऐसा कर सकते हैं? यदि हाँ, तो सिंहासन पर विराजिए।" राजा भोज ने धरती की ओर देखा, और उस दिन चुपचाप पीछे हट गए।

शिक्षा (Moral)

सच्ची महानता सदा जीने में नहीं, बल्कि जीते-जी निःस्वार्थ भाव से देने में है।

अमर फल कहानी की शिक्षा क्या है?

सच्ची महानता सदा जीने में नहीं, बल्कि जीते-जी निःस्वार्थ भाव से देने में है।

यह कहानी किस ग्रंथ से है?

सिंहासन बत्तीसी — सिंहासन बत्तीसी — पहली पुतली

सिंहासन बत्तीसीअगली कहानी: देवी को अर्पण