Mantra.Tips
🙏

देवी को अर्पण

सिंहासन बत्तीसी — तीसरी पुतली

पात्र: राजा विक्रमादित्य · राजा भोज · तीसरी पुतली · रोता हुआ यात्री · मंदिर की देवी

अगली बार जब राजा भोज सिंहासन के पास पहुँचे, तो घुँघरुओं की खनक के साथ तीसरी पुतली सजीव हो उठी। "धैर्य, राजन्!" वह बोली। "पहले सुनिए कि विक्रमादित्य क्या-क्या देने को तैयार थे — और किनके लिए।"

और उसने यह कथा सुनाई। एक बार, प्रजा के दुख जानने के लिए अपनी आदत के अनुसार वेश बदलकर घूमते हुए, विक्रमादित्य को एक पुराने मंदिर के पास रोता हुआ यात्री मिला। वह सिसकते हुए बोला, "मेरा देश मर रहा है। तीन वर्षों से वर्षा की एक बूँद नहीं गिरी। हमारे कुएँ धूल हो गए, खेत पत्थर। मंदिर के पुजारी कहते हैं कि देवी रुष्ट हैं, और वे तभी प्रसन्न होंगी जब संसार की सबसे दुर्लभ भेंट चढ़े — पर कौन बताए कि वह भेंट क्या है? हम तो लुट गए।"

विक्रमादित्य मंदिर में गए और हाथ जोड़कर देवी के सामने खड़े हुए। "माता," उन्होंने कहा, "निर्दोष लोगों का एक पूरा देश प्यासा है। संसार की सबसे दुर्लभ भेंट क्या है? स्वर्ण? रत्न? मेरा सब ले लीजिए। राज्य? मेरा अपना ले लीजिए।" मंदिर मौन रहा। तब राजा ने धीमे स्वर में फिर कहा, "मैं समझ गया। सबसे दुर्लभ भेंट वह है जो ख़रीदी नहीं जा सकती — स्वेच्छा से दिया गया जीवन। तो मेरा जीवन लीजिए, माता, और उन लोगों पर वर्षा होने दीजिए।" और उन्होंने तलवार खींचकर अपनी ही गर्दन की ओर उठाई — बिना काँपे, बिना एक आँसू बहाए।

धार छू पाती, उससे पहले प्रकाश का एक हाथ उनकी बाँह थाम चुका था, और स्वयं देवी उनके सामने खड़ी थीं — हज़ार दीपों-सी दमकती हुईं। "बस, मेरे पुत्र," उन्होंने कहा, और उनका स्वर सूखी धरती पर वर्षा-सा था। "मुझे तुम्हारा शीश नहीं, तुम्हारा हृदय चाहिए था — और वह मैंने देख लिया। आज तक किसी राजा ने ऐसे अजनबियों के लिए स्वयं को अर्पित नहीं किया, जो उसकी प्रजा भी नहीं।" उन्होंने वर दिया कि उसी रात वर्षा लौट आएगी, और विक्रमादित्य को आशीर्वाद दिया कि जब तक उस देश की नदियाँ बहेंगी, उनका नाम याद रखा जाएगा। राजा ने प्रणाम किया, तलवार म्यान में रखी, और किसी को कुछ बताए बिना चुपचाप अपनी राह चल दिए।

फिर पुतली ने पूछा, "प्यासे अजनबियों के लिए उन्होंने अपना शीश अर्पित कर दिया, हे भोज, और न कोई इनाम माँगा, न नाम। क्या आप ऐसा कर सकते हैं? यदि हाँ, तो सिंहासन पर विराजिए।" राजा भोज ने आँखें झुका लीं और एक बार फिर पीछे हट गए।

शिक्षा (Moral)

सबसे दुर्लभ भेंट वह निःस्वार्थ हृदय है जो न इनाम चाहता है, न नाम।

देवी को अर्पण कहानी की शिक्षा क्या है?

सबसे दुर्लभ भेंट वह निःस्वार्थ हृदय है जो न इनाम चाहता है, न नाम।

यह कहानी किस ग्रंथ से है?

सिंहासन बत्तीसी — सिंहासन बत्तीसी — तीसरी पुतली

सिंहासन बत्तीसीअगली कहानी: कामधेनु गाय