महामृत्युंजय मंत्र — Word-by-Word Meaning
महामृत्युंजय मंत्र
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
ॐ
Om
पवित्र आदि नाद और ब्रह्म का प्रतीक — परम दिव्य सत्य
त्र्यम्बकम्
Tryambakam
तीन नेत्रों वाले (शिव) — उनके तीन नेत्र सूर्य (दायाँ), चंद्र (बायाँ) और अग्नि (तीसरा नेत्र) हैं
यजामहे
Yajamahe
हम पूजते हैं / सम्मान करते हैं / अर्पण करते हैं — सामूहिक, निरंतर उपासना
सुगन्धिम्
Sugandhim
दिव्य सुगंध वाले / उत्तम सार वाले — समस्त सृष्टि में व्याप्त अंतरतम सार
पुष्टिवर्धनम्
Pushtivardhanam
पोषण को बढ़ाने और सुदृढ़ करने वाले — समस्त वृद्धि, बल और समृद्धि का स्रोत
उर्वारुकम्
Urvarukam
पका हुआ खीरा (या बड़ी ककड़ी) — मुख्य रूपक: परिपक्व आत्मा जो स्वाभाविक रूप से अलग हो जाती है
इव
Iva
जैसे / की भाँति — रूपक को प्रार्थना से जोड़ने वाला उपमा-शब्द
बन्धनात्
Bandhanan
अपने बंधन से / उस डंठल से जो उसे थामे है — आसक्ति, कर्म, अहंकार और भय
मृत्योः
Mrityoh
मृत्यु से — भौतिक मृत्यु, मृत्यु का भय और बाध्य पुनर्जन्म
मुक्षीय
Mukshiya
मुक्त करें / स्वतंत्र करें — केंद्रीय प्रार्थना, 'मोक्ष' के समान मूल से
मा
Maa
नहीं / मत — सूक्ष्म निषेध
अमृतात्
Amritat
अमरत्व से / अमर तत्व से — हमें दिव्य शाश्वत स्रोत से अलग न करें
Complete Translation
हम तीन नेत्रों वाले (शिव) की पूजा करते हैं जो दिव्य सुगंध वाले हैं और सभी प्राणियों का पोषण और शक्ति बढ़ाते हैं। जैसे पका हुआ खीरा अपनी बेल से स्वाभाविक रूप से अलग हो जाता है — वैसे ही हमें मृत्यु के बंधन से मुक्त करें, अमरत्व से नहीं।
Origin & History
Source: Rigveda (7.59.12)
Author: Rishi Vasishtha
Period: 1500 BCE
महामृत्युंजय मंत्र ऋषि वसिष्ठ को प्रकट हुआ और आगे चलकर बालक मार्कण्डेय की कथा का केंद्र बना। जब मार्कण्डेय की मृत्यु 16 वर्ष की आयु में निश्चित थी, तब उनके पिता ने उन्हें यह मंत्र सिखाया। 16वें जन्मदिन पर जब यमराज उन्हें लेने आए, तब मार्कण्डेय शिव लिंग से लिपटकर यह मंत्र जपते रहे। भगवान शिव प्रकट हुए, यम को पराजित किया और मार्कण्डेय को अमर जीवन का वरदान दिया। इसी से यह मंत्र मृत-संजीवनी मंत्र कहलाता है।
Frequently Asked Questions
महामृत्युंजय मंत्र क्या है?▼
महामृत्युंजय मंत्र (ॐ त्र्यम्बकं यजामहे) ऋग्वेद (7.59.12) से लिया गया वैदिक मंत्र है जो भगवान शिव को मृत्युंजय रूप में समर्पित है। यह वैदिक परंपरा का सबसे शक्तिशाली आरोग्य और रक्षा मंत्र है, जो रोग, भय, दुर्घटना, अकाल मृत्यु पर विजय और आध्यात्मिक मुक्ति के लिए जपा जाता है।
महामृत्युंजय मंत्र का शब्दशः अर्थ क्या है?▼
ॐ = आदि नाद। त्र्यम्बकं = तीन नेत्रों वाले (शिव)। यजामहे = हम पूजते हैं। सुगन्धिम् = दिव्य सुगंध वाले। पुष्टिवर्धनम् = सबका पोषण और बल बढ़ाने वाले। उर्वारुकमिव = पके खीरे की भाँति। बन्धनात् = अपने बंधन (डंठल) से। मृत्योः = मृत्यु से। मुक्षीय = हमें मुक्त करें। मा अमृतात् = अमरत्व से नहीं — हमें दिव्य से अलग न करें।
महामृत्युंजय मंत्र का कितनी बार जप करना चाहिए?▼
108 बार पारंपरिक विधान है, श्रेष्ठतः रुद्राक्ष माला से। नियमित अभ्यास के लिए प्रतिदिन 11 बार अत्यंत लाभकारी है। महामृत्युंजय पुरश्चरण (सघन साधना) के लिए 1,25,000 बार विधान है। रोग या संकट के समय: 40 दिन तक प्रतिदिन 108 बार।
महामृत्युंजय मंत्र और मृत्युंजय मंत्र में क्या अंतर है?▼
दोनों एक ही मंत्र हैं। मृत्युंजय का अर्थ है मृत्यु पर विजय पाने वाला। महा का अर्थ है महान — अतः महामृत्युंजय अर्थात मृत्यु पर महान विजय। यह रुद्र मंत्र, त्र्यम्बक मंत्र और मृत-संजीवनी मंत्र भी कहलाता है।
महामृत्युंजय मंत्र का जप कब करना चाहिए?▼
ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से 1.5 घंटे पूर्व) सबसे शक्तिशाली समय है। सोमवार सबसे पवित्र दिन है — शिव का दिन। प्रदोष और महाशिवरात्रि वर्ष के सर्वोत्तम अवसर हैं। रोग, भय, दुर्घटना, मृत्यु के निकट या किसी जीवन-संकट के समय जप करें।
महामृत्युंजय मंत्र और गायत्री मंत्र में क्या अंतर है?▼
दोनों श्रेष्ठ वैदिक मंत्र हैं किंतु भिन्न प्रयोजन वाले। गायत्री मंत्र (ऋग्वेद 3.62.10) सूर्य को दिव्य बुद्धि रूप में समर्पित है — यह मन को आलोकित कर ज्ञान देता है। महामृत्युंजय शिव को मृत्युंजय रूप में समर्पित है — यह आरोग्य, रक्षा और मुक्ति देता है। दोनों परस्पर पूरक माने जाते हैं।
क्या स्त्रियाँ महामृत्युंजय मंत्र का जप कर सकती हैं?▼
हाँ, बिल्कुल। यह मंत्र सभी मनुष्यों के लिए है। ऋग्वेद में ऐसे मंत्र हैं जो दिव्य की खोज करने वाले सभी के लिए सुलभ हैं। मंत्र स्वयं 'यजामहे' — हम पूजते हैं — कहता है, जो बिना किसी लिंग-भेद के सामूहिक प्रार्थना है।
महामृत्युंजय मंत्र का सही उच्चारण क्या है?▼
मुख्य उच्चारण-बिंदु: त्र्यम्बकं = त्र्य-अम्-ब-कं ('त्र्य' एक ही अक्षर है, 'त्रि-यम्' नहीं)। यजामहे = य-जा-म-हे। सुगन्धिम् = सु-गन्धि-म्। पुष्टिवर्धनम् = पुष्टि-वर्ध-नम्। उर्वारुकमिव = उर्-वा-रु-क-मि-व। मृत्योर्मुक्षीय = मृत्योर्-मुक्षी-य। माऽमृतात् = मा-अम्-रि-तात्।
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