आदित्य हृदय स्तोत्र
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✦ अर्थ
आदित्य हृदय स्तोत्र सूर्यदेव की वह स्तुति है जो महर्षि अगस्त्य ने लंका के रणक्षेत्र में श्रीराम को सिखाई, जब वे अपराजित रावण के सम्मुख थके खड़े थे (वाल्मीकि रामायण, युद्धकांड)। यह सूर्य को समस्त लोकों की आत्मा, अंधकार का नाशक और विजय का दाता बताती है। इसका पाठ थकान, भय और चिंता को नष्ट कर ऊर्जा, साहस और विजय प्रदान करने वाला माना जाता है।
उत्पत्ति और कथा
Valmiki Ramayana, Yuddha Kanda (Book of War), Chapter 107 · Sage Valmiki (recorded); taught by Sage Agastya · Ancient (Treta Yuga traditionally; c. 500 BCE scholarly)
लंका के रणक्षेत्र में श्रीराम अंतिम संग्राम के लिए महाबली रावण के सम्मुख थे। दीर्घ युद्ध से थके और रावण की अजेय-सी शक्ति देखकर राम गहन चिंता में खड़े थे। उसी निर्णायक क्षण में अगस्त्य ऋषि देवताओं के बीच से उतरे और यह प्राचीन गुह्य स्तोत्र — सूर्य का हृदय (आदित्य हृदयम्) — प्रकट किया। तीन बार पाठ करते ही राम तेजोमय ऊर्जा से भर गए, धनुष उठाया और रावण का वध कर दिया। यह स्तोत्र उस क्षण का प्रतीक है जब दिव्य ज्ञान निराशा को निश्चित विजय में बदल देता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
आदित्य हृदय स्तोत्र का केंद्रीय चमत्कार रणभूमि पर उसका तत्काल प्रभाव है। थके, हताश और रावण से पराभूत-से दिख रहे श्रीराम इस स्तोत्र को केवल तीन बार पढ़ने पर पूर्णतः बदल गए। वे साक्षात सूर्य की ऊर्जा से दीप्त हुए और पहले अजेय रहे रावण को पराजित किया। आज भी भक्त इस स्तोत्र के नियमित पाठ से दीर्घ रोगों से उल्लेखनीय आरोग्य, असंभव-सी परिस्थितियों में सफलता और गहरे अवसाद पर विजय का अनुभव बताते हैं — मानो राम का निराशा से विजय तक का रूपांतरण दोहराते हुए।
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ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम् । रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम् ॥
Tato yuddhaparishrantam samare chintaya sthitam Ravanam chagrato drishtva yuddhaya samupasthitam
अर्थ:तब युद्ध से थके, चिन्ता में खड़े राम को, और सामने युद्ध के लिए तैयार रावण को देखकर —
दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम् । उपागम्याब्रवीद्राममगस्त्यो भगवानृषिः ॥
Daivataishcha samagamya drashtumabhyagato ranam Upagamyabravidramamagastyo bhagavanrishih
अर्थ:— देवताओं के साथ युद्ध देखने आए भगवान अगस्त्य ने राम के पास जाकर कहा:
राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम् । येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसि ॥
Rama rama mahabaho shrinu guhyam sanatanam Yena sarvanarin vatsa samare vijayishyasi
अर्थ:हे राम, महाबाहो राम! वह सनातन रहस्य सुनो, जिससे, हे वत्स, तुम युद्ध में समस्त शत्रुओं को जीतोगे।
आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम् । जयावहं जपेन्नित्यमक्षय्यं परमं शिवम् ॥
Adityahridayam punyam sarvashatruvinashanam Jayavaham japennityamakshayyam paramam shivam
अर्थ:यह पवित्र आदित्यहृदय समस्त शत्रुओं का नाशक और विजय देने वाला है; इसे नित्य जपो — यह अक्षय, परम और कल्याणकारी है।
सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम् । चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम् ॥
Sarvamangalamangalyam sarvapapapranashanam Chintashokaprashamanamayurvardhanamuttamam
अर्थ:यह समस्त मंगलों का मंगल, सब पापों का नाशक, चिन्ता-शोक का शमन करने वाला और उत्तम आयुवर्धक है।
रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम् । पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम् ॥
Rashmimantam samudyantam devasuranamaskritam Pujayasva vivasvantam bhaskaram bhuvaneshvaram
अर्थ:किरणों वाले, उदित होते, देव-असुरों से नमस्कृत, तेजस्वी विवस्वान, भास्कर, लोकों के पोषक की पूजा करो।
सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः । एष देवासुरगणाँल्लोकान् पाति गभस्तिभिः ॥
Sarvadevatmako hyesha tejasvi rashmibhavanah Esha devasuragananllokan pati gabhastibhih
अर्थ:यह सर्वदेवस्वरूप, तेजस्वी, किरणों से जगत् को भावित करने वाला है; यह अपनी किरणों से देव-असुरगणों और सब लोकों की रक्षा करता है।
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः । महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः ॥
Esha brahma cha vishnushcha shivah skandah prajapatih Mahendro dhanadah kalo yamah somo hyapam patih
अर्थ:यही ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द और प्रजापति है; महेन्द्र, कुबेर, काल, यम, सोम (चन्द्र) और वरुण है।
पितरो वसवः साध्या ह्यश्विनौ मरुतो मनुः । वायुर्वह्निः प्रजाप्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः ॥
Pitaro vasavah sadhya hyashvinau maruto manuh Vayurvahnih prajaprana ritukarta prabhakarah
अर्थ:यही पितर, वसु, साध्य, अश्विनीकुमार, मरुत और मनु है; वायु, अग्नि, प्राण, ऋतुओं का कर्ता और ज्योति का स्वामी है।
आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान् । सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकरः ॥
Adityah savita suryah khagah pusha gabhastiman Suvarnasadrisho bhanurhiranyareta divakarah
अर्थ:आदित्य, सविता, सूर्य, खग, पूषा, किरणमान; स्वर्ण-सा भानु, हिरण्यरेता, दिन का कर्ता है।
हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान् । तिमिरोन्मथनः शम्भुस्त्वष्टा मार्ताण्ड अंशुमान् ॥
Haridashvah sahasrarchih saptasaptirmarichiman Timironmathanah shambhustvashta martanda amshuman
अर्थ:हरिदश्व, सहस्रकिरण, सप्ताश्व, मरीचिमान; अन्धकार का नाशक, शम्भु, त्वष्टा, मार्तण्ड, महातेजस्वी।
हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनो भास्करो रविः । अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शङ्खः शिशिरनाशनः ॥
Hiranyagarbhah shishirastapano bhaskaro ravih Agnigarbhoditeh putrah shankhah shishiranashanah
अर्थ:हिरण्यगर्भ, शिशिर और तपन, भास्कर, रवि; अग्निगर्भ, अदिति-पुत्र, शंख-सा शुभ्र, शान्त।
व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजुःसामपारगः । घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवङ्गमः ॥
Vyomanathastamobhedi rigyajuhsamaparagah Ghanavrishtirapam mitro vindhyavithiplavangamah
अर्थ:व्योमनाथ, तम का भेदक, ऋक्-यजुः-साम का पारगामी; घनवृष्टि करने वाला, जल का मित्र, विन्ध्यपथ पर तीव्र गति से चलने वाला।
आतपी मण्डली मृत्युः पिङ्गलः सर्वतापनः । कविर्विश्वो महातेजा रक्तः सर्वभवोद्भवः ॥
Atapi mandali mrityuh pingalah sarvatapanah Kavirvishvo mahateja raktah sarvabhavodbhavah
अर्थ:आतपी, मण्डलाकार, मृत्यु, पिंगल, सर्वतापन; कवि, विश्व, महातेजा, रक्त, समस्त भूतों का उद्भव।
नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः । तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्नमोऽस्तु ते ॥
Nakshatragrahataranamadhipo vishvabhavanah Tejasamapi tejasvi dvadashatmannamostu te
अर्थ:नक्षत्र-ग्रह-ताराओं का अधिपति, विश्व का उद्भावक; तेजों का भी तेज — हे द्वादशात्मन्! तुम्हें नमस्कार।
नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः । ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः ॥
Namah purvaya giraye pashchimayadraye namah Jyotirgananam pataye dinadhipataye namah
अर्थ:पूर्व पर्वत (उदय) को नमस्कार, पश्चिम पर्वत (अस्त) को नमस्कार; ज्योतिर्गणों के स्वामी, दिन के अधिपति को नमस्कार।
जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः । नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः ॥
Jayaya jayabhadraya haryashvaya namo namah Namo namah sahasramsho adityaya namo namah
अर्थ:जय और शुभ जय देने वाले, हरिदश्व को बारम्बार नमस्कार; हे सहस्रकिरण आदित्य, बारम्बार नमस्कार।
नम उग्राय वीराय सारङ्गाय नमो नमः । नमः पद्मप्रबोधाय मार्ताण्डाय नमो नमः ॥
Nama ugraya viraya sarangaya namo namah Namah padmaprabodhaya martandaya namo namah
अर्थ:उग्र, वीर और सारंग को बारम्बार नमस्कार; कमल को जगाने वाले मार्तण्ड को बारम्बार नमस्कार।
ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूर्यायादित्यवर्चसे । भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः ॥
Brahmeshanachyuteshaya suryayadityavarchase Bhasvate sarvabhakshaya raudraya vapushe namah
अर्थ:ब्रह्मा-ईशान-अच्युत स्वरूप, आदित्य-तेज वाले सूर्य को, भास्वान, सर्वभक्षी, रौद्र रूप को नमस्कार।
तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने । कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः ॥
Tamoghnaya himaghnaya shatrughnayamitatmane Kritaghnaghnaya devaya jyotisham pataye namah
अर्थ:तम, हिम और शत्रु के नाशक, अमित आत्मा वाले; कृतघ्नों के नाशक, देव, ज्योतियों के स्वामी को नमस्कार।
तप्तचामीकराभाय वह्नये विश्वकर्मणे । नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ॥
Taptachamikarabhaya vahnaye vishvakarmane Namastamobhinighnaya ruchaye lokasakshine
अर्थ:तप्त स्वर्ण-सी कान्ति वाले, अग्नि, विश्वकर्मा; तम के नाशक, कान्तिस्वरूप, लोकसाक्षी को नमस्कार।
नाशयत्येष वै भूतं तदेव सृजति प्रभुः । पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः ॥
Nashayatyesha vai bhutam tadeva srijati prabhuh Payatyesha tapatyesha varshatyesha gabhastibhih
अर्थ:यह प्रभु समस्त भूतों का नाश करता और पुनः उन्हें रचता है; यही जल को सोखता, तपाता और किरणों से वर्षा करता है।
एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः । एष एवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम् ॥
Esha supteshu jagarti bhuteshu parinishthitah Esha evagnihotram cha phalam chaivagnihotrinam
अर्थ:यह सोए हुए प्राणियों में जागता रहता है, सबमें स्थित; यही अग्निहोत्र, उसका फल और अग्नि का यज्ञ है।
वेदाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च । यानि कृत्यानि लोकेषु सर्व एष रविः प्रभुः ॥
Vedashcha kratavashchaiva kratunam phalameva cha Yani krityani lokeshu sarva esha ravih prabhuh
अर्थ:यही वेद, यज्ञ और यज्ञों का फल है; लोकों में जो भी कृत्य हैं, सब यही रवि है।
एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च । कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव ॥
Enamapatsu krichchhreshu kantareshu bhayeshu cha Kirtayan purushah kashchinnavasidati raghava
अर्थ:आपत्ति, संकट, वन और भय में जो कोई इस सूर्य का कीर्तन करता है, वह कभी दुःखी नहीं होता।
पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम् । एतत्त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ॥
Pujayasvainamekagro devadevam jagatpatim Etattrigunitam japtva yuddheshu vijayishyasi
अर्थ:एकाग्र होकर इस देवाधिदेव, जगत्पति की पूजा करो; इसे तीन बार जपकर तुम युद्ध में विजयी होगे।
अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं वधिष्यसि । एवमुक्त्वा तदाऽगस्त्यो जगाम च यथागतम् ॥
Asmin kshane mahabaho ravanam tvam vadhishyasi Evamuktva tadagastyo jagama cha yathagatam
अर्थ:हे महाबाहो! इसी क्षण तुम रावण का वध करोगे। ऐसा कहकर अगस्त्य जैसे आए थे वैसे चले गए।
एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्तदा । धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान् ॥
Etachchhrutva mahateja nashtashokobhavattada Dharayamasa suprito raghavah prayatatmavan
अर्थ:यह सुनकर महातेजस्वी राघव शोकरहित हो गए; अत्यन्त प्रसन्न होकर उन्होंने इसे मन में धारण किया।
आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वा तु परं हर्षमवाप्तवान् । त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान् ॥
Adityam prekshya japtva tu param harshamavaptavan Trirachamya shuchirbhutva dhanuradaya viryavan
अर्थ:सूर्य की ओर देखकर और जप करके उन्होंने परम हर्ष पाया; तीन बार आचमन कर, शुद्ध होकर धनुष उठाया।
रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा युद्धाय समुपागमत् । सर्वयत्नेन महता वधे तस्य धृतोऽभवत् ॥
Ravanam prekshya hrishtatma yuddhaya samupagamat Sarvayatnena mahata vadhe tasya dhritobhavat
अर्थ:प्रसन्नचित्त होकर रावण को देख वे युद्ध के लिए आगे बढ़े; पूरे प्रयत्न से उसके वध का संकल्प किया।
अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमनाः परमं प्रहृष्यमाणः । निशिचरपतिसङ्क्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ॥
Atha raviravadannirikshya ramam Muditamanah paramam prahrishyamanah Nishicharapatisankshayam viditva Suraganamadhyagato vachastvareti
अर्थ:तब सूर्य ने अत्यन्त प्रसन्न मन से राम की ओर देखकर, रावण के संहार को निकट जानकर कहा — 'शीघ्रता करो!'
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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आदित्य हृदय स्तोत्र पाठ के लाभ
अगस्त्य ऋषि द्वारा श्रीराम को दिए वचन के अनुसार समस्त शत्रुओं और बाधाओं का नाश करता है।
सभी कार्यों और प्रतियोगिताओं में विजय दिलाता है।
चिंता, शोक और मानसिक उद्विग्नता दूर करता है।
आयु बढ़ाता है और शारीरिक स्वास्थ्य को बल देता है।
मन को शुद्ध करता है और समस्त पापों का नाश करता है।
भय और संकट के समय साहस और शक्ति प्रदान करता है।
सूर्य से संबंधित रोगों — नेत्र, हृदय और अस्थि के विकारों में लाभकारी माना जाता है।
यश, सफलता और नेतृत्व के गुण प्रदान करता है।
आदित्य हृदय स्तोत्र जप विधि
उगते सूर्य की ओर मुख करके, हाथ जोड़कर खड़े हों। भक्ति और एकाग्रता से स्तोत्र का पाठ करें। आरंभ से पूर्व सूर्य को अर्घ्य (जल) देना उत्तम है। अधिकतम लाभ के लिए स्तोत्र तीन बार पढ़ा जा सकता है। किसी भी बड़ी चुनौती, परीक्षा या कठिन परिस्थिति से पहले इसका पाठ विशेष रूप से सुझाया जाता है — जैसे अगस्त्य ने अंतिम युद्ध से पूर्व राम को सिखाया था।
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