द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र
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✦ अर्थ
द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र एक संक्षिप्त शैव स्तोत्र है, जो आदि शंकराचार्य को आरोपित है। यह भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों — स्वयंभू पवित्र तीर्थों — का नाम लेकर वंदना करता है। प्रातः-सायं इसका पाठ शिव की कृपा, रक्षा और मन की शांति प्रदान करता है।
उत्पत्ति और कथा
Traditional Shaiva stotra, widely attributed to Adi Shankaracharya · Traditionally attributed to Adi Shankaracharya · Classical; rooted in the Jyotirlinga tradition of the Shiva Purana
शिव पुराण बारह ऐसे स्थानों का वर्णन करता है जहाँ शिव ज्योति — स्वयं प्रकट प्रकाश-स्तंभ — के रूप में प्रकट हुए, जिससे उन्हें ज्योतिर्लिंग नाम मिला, जो समस्त शिव तीर्थों में सर्वाधिक पवित्र हैं। ये समस्त भूमि में फैले हैं — पश्चिमी समुद्र पर सोमनाथ से लेकर सुदूर दक्षिण में रामेश्वर और हिमालय की ऊँचाइयों में केदारनाथ तक। यह प्रिय स्तोत्र कुछ संक्षिप्त श्लोकों में सभी बारह को एक सूत्र में पिरो देता है, ताकि कहीं भी स्थित भक्त एक ही नित्य प्रार्थना में प्रत्येक ज्योतिर्लिंग की वंदना कर सके।
सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित
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सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्। उज्जयिन्यां महाकालम् ॐकारममलेश्वरम्॥
Saurashtre Somanatham cha Shrishaile Mallikarjunam. Ujjayinyam Mahakalam Omkaram Amaleshwaram.
अर्थ:सौराष्ट्र में सोमनाथ और श्रीशैल पर मल्लिकार्जुन; उज्जैन में महाकाल, तथा नर्मदा तट पर ॐकारेश्वर (अमलेश्वर)।
परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशंकरम्। सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥
Parlyam Vaidyanatham cha Dakinyam Bhimashankaram. Setubandhe tu Ramesham Nagesham Darukavane.
अर्थ:परली में वैद्यनाथ और डाकिनी में भीमशंकर; सेतुबंध (रामेश्वरम्) में रामेश्वर, तथा दारुकावन में नागेश्वर।
वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे। हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये॥
Varanasyam tu Vishwesham Tryambakam Gautamitate. Himalaye tu Kedaram Ghushmesham cha Shivalaye.
अर्थ:काशी (वाराणसी) में विश्वेश्वर और गौतमी (गोदावरी) तट पर त्र्यम्बकेश्वर; हिमालय में केदारनाथ, तथा शिवालय में घुश्मेश्वर।
एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रातः पठेन्नरः। सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति॥
Etani Jyotirlingani Sayam Pratah Pathennarah. Saptajanmakritam Papam Smaranena Vinashyati.
अर्थ:जो मनुष्य इन बारह ज्योतिर्लिंगों का प्रातः और सायं पाठ करता है, उसके सात जन्मों के किए पाप इस स्मरण मात्र से नष्ट हो जाते हैं।
एतेषां दर्शनादेव पातकं नैव तिष्ठति। कर्मक्षयो भवेत्तस्य यस्य तुष्टो महेश्वरः॥
Etesham Darshanadeva Paatakam Naiva Tishthati. Karmakshayo Bhavettasya Yasya Tushto Maheshwarah.
अर्थ:इनके दर्शन मात्र से कोई पाप नहीं ठहरता; और जिस पर भगवान महेश्वर प्रसन्न हों, उसके कर्मों का क्षय हो जाता है।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र पाठ के लाभ
एक ही संक्षिप्त प्रार्थना में सभी बारह ज्योतिर्लिंगों — भगवान शिव के सर्वाधिक पवित्र, स्वयंभू तीर्थों — का आह्वान करता है।
परंपरागत रूप से प्रातः और सायं पाठ किया जाता है; कहा जाता है कि यह सात जन्मों के पाप (सप्त-जन्म-कृतं पापं) धो देता है।
भक्त को बिना यात्रा किए भी प्रतिदिन सभी 12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन कराता है।
शिव की कृपा, रक्षा और आंतरिक शांति प्रदान करता है।
संक्षिप्त और सरलता से कंठस्थ — नित्य शिव-उपासना के लिए आदर्श, विशेषकर सोमवार को और श्रावण मास में।
शिव के ध्यान हेतु मन को स्थिर और शुद्ध करता है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र जप विधि
स्नान के बाद शिव के चित्र या लिंग के समक्ष पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। एक दीपक प्रज्वलित करें और बिल्व (बेल) पत्र तथा जल अर्पित करें। स्तोत्र को धीरे-धीरे और भक्ति सहित पढ़ें, प्रत्येक ज्योतिर्लिंग के नाम का उच्चारण करते समय उसका ध्यान करें — यह एक साथ सभी बारह तीर्थों के दर्शन करने का एक तरीका है। परंपरागत रूप से इसे प्रातः और सायं दोनों समय पढ़ा जाता है; इच्छा होने पर इसे 3 या 11 बार दोहरा सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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