शिव रुद्राष्टकम्
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✦ अर्थ
रुद्राष्टकम् गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित भगवान शिव की आठ श्लोकों वाली अत्यन्त भावपूर्ण स्तुति है। यह निर्गुण ब्रह्म से लेकर दीन भक्त के पूर्ण समर्पण तक की यात्रा को दर्शाती है। इसका पाठ सोमवार और महाशिवरात्रि पर विशेष फलदायी माना जाता है।
उत्पत्ति और कथा
Composed by Goswami Tulsidas · Goswami Tulsidas · 16th century CE
तुलसीदास ने इस अष्टक की रचना भगवान शिव के प्रति अपनी गहनतम भक्ति की अभिव्यक्ति के रूप में की। यद्यपि वे मुख्यतः राम-भक्त के रूप में जाने जाते हैं, फिर भी वे शिव को परम आदर देते थे — रामचरितमानस में उन्होंने शिव को राम का प्रथम भक्त बताया है। यह अष्टक मात्र आठ श्लोकों में सबसे अमूर्त दर्शन (निर्गुण ब्रह्म) से लेकर सबसे आत्मीय समर्पण (एक दीन भक्त की पुकार) तक की सम्पूर्ण आध्यात्मिक यात्रा को दर्शाता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
इस अष्टक का अन्तिम श्लोक — 'न जानामि योगं जपं नैव पूजां' (मैं न योग जानता हूँ, न जप, न पूजा) — समस्त हिन्दू भक्ति-साहित्य में समर्पण की सबसे प्रबल अभिव्यक्तियों में माना जाता है। सन्त और विद्वान सिखाते हैं कि जब भक्त इन शब्दों को सच्चे हृदय से कहता है — अपनी पूर्ण दीनता और केवल ईश्वर-कृपा पर निर्भरता स्वीकार करते हुए — तब शिव की रक्षा अटल हो जाती है। तुलसीदास स्वयं अपने युग के महानतम विद्वान होते हुए भी स्वयं को कुछ न जानने वाला बताते हैं — क्योंकि सच्चा ज्ञान इसी विनम्रता से आरम्भ होता है।
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नमामीशमीशान निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्। निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम्॥
Namamishamishan Nirvanarupam Vibhum Vyapakam Brahmavedasvarupam Nijam Nirgunam Nirvikalpam Nireeham Chidakashamakashvasam Bhajeham
अर्थ:हे ईशान! मैं उस ईश को नमन करता हूँ जो निर्वाणस्वरूप, विभु, सर्वव्यापक, ब्रह्म और वेदस्वरूप हैं; जो स्वरूप में स्थित, निर्गुण, निर्विकल्प और इच्छारहित हैं।
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं गिरा ज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम्। करालं महाकाल कालं कृपालं गुणागार संसारपारं नतोऽहम्॥
Nirakaramonkaramulam Turiyam Gira Gyana Goteetameesha Girisham Karalam Mahakala Kalam Kripalam Gunagara Sansaraparam Natoham
अर्थ:निराकार, ओंकार के मूल, तुरीय; वाणी-ज्ञान-इन्द्रियों से परे, गिरीश; कराल, महाकाल के भी काल, कृपालु, गुणों के आगार, संसार से पार करने वाले — उन्हें नमन।
तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं मनोभूत कोटिप्रभा श्री शरीरम्। स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारुगंगा लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजंगा॥
Tusharadri Sankasha Gauram Gambhiram Manobhuta Kotiprabha Shri Shariram Sfuranmauli Kallolini Charuganga Lasat Bhalabaalendu Kanthe Bhujanga
अर्थ:हिमगिरि-से गौर, गम्भीर; जिनका दिव्य शरीर करोड़ों कामदेवों की प्रभा वाला है; जिनके मस्तक पर सुन्दर गंगा लहराती, गले में सर्प और भाल पर चन्द्र सुशोभित है — उन्हें नमन।
चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम्। मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि॥
Chalakundalam Bhrusunetram Vishalam Prasannaananam Neelakantham Dayalam Mrigadhishcharmambaram Mundamalam Priyam Shankaram Sarvanatham Bhajami
अर्थ:झूमते कुण्डल, सुन्दर भृकुटि और विशाल नेत्र; प्रसन्नमुख, नीलकण्ठ, दयालु; मृगचर्म और मुण्डमाल धारण किए — ऐसे प्रिय शिव को नमन।
प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम्। त्रयः शूलनिर्मूलनं शूलपाणिं भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम्॥
Prachandam Prakrishtam Pragalbham Paresham Akhandam Ajam Bhanukotiprakasham Trayah Shulanirmoolanam Shulapanim Bhajeham Bhavanipatim Bhavagamyam
अर्थ:प्रचण्ड, श्रेष्ठ, प्रगल्भ, परमेश्वर; अखण्ड, अजन्मा, करोड़ों सूर्यों-से प्रकाशमान; तीनों तापों का मूलोच्छेद करने वाले शूलपाणि — उन्हें मैं भजता हूँ।
कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी। चिदानन्दसंदोह मोहापहारी प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥
Kalaateeta Kalyana Kalpantakari Sada Sajjanananddadata Purari Chidanandasandoha Mohaphari Praseeda Praseeda Prabho Manmathari
अर्थ:कलातीत, कल्याणस्वरूप, कल्पान्त में संहार करने वाले; सज्जनों को सदा आनन्द देने वाले पुरारि; चिदानन्दघन, मोह को हरने वाले — हे प्रभु, प्रसन्न हों, प्रसन्न हों।
न यावद् उमानाथ पादारविन्दं भजन्तीह लोके परे वा नराणाम्। न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम्॥
Na Yavad Umanatha Padaaravindam Bhajantiha Loke Pare Va Naranaam Na Tavatsukham Shanti Santapanasham Praseeda Prabho Sarvabhutadhivasam
अर्थ:जब तक मनुष्य उमानाथ (शिव) के चरणकमलों का भजन नहीं करते, तब तक उन्हें इस लोक या परलोक में सुख, शान्ति और सन्ताप का नाश प्राप्त नहीं होता।
न जानामि योगं जपं नैव पूजां नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यम्। जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो॥
Na Janami Yogam Japam Naiva Poojam Natoham Sada Sarvada Shambhu Tubhyam Jara Janma Duhkhaugha Tatapyamanam Prabho Pahi Aapannamameesh Shambho
अर्थ:मैं न योग जानता हूँ, न जप, न पूजा; हे शम्भु! मैं सदा-सर्वदा केवल आपको नमन करता हूँ। जरा, जन्म और दुःख-समूह से सन्तप्त मुझ दीन की, हे प्रभु, रक्षा करें।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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शिव रुद्राष्टकम् पाठ के लाभ
तुलसीदास द्वारा रचित — शिव की सबसे गहन स्तुतियों में से एक
आठवाँ श्लोक पूर्ण समर्पण है: 'मैं कुछ नहीं जानता — बस मेरी रक्षा करो'
शिव का वर्णन परम दर्शन (निर्गुण) से लेकर अत्यन्त आत्मीय (शम्भो) रूप तक
सोमवार की पूजा और महाशिवरात्रि के लिए अत्यन्त प्रभावशाली
हर श्लोक भक्ति को गहरा करता है — विस्मय से प्रेम और फिर समर्पण तक
अन्तिम पुकार 'प्रभो पाहि' (प्रभु, रक्षा करो) हृदय को छू लेने वाली सच्ची विनती है
शिव रुद्राष्टकम् जप विधि
इस अष्टक का पाठ गहरे भाव से करना चाहिए, विशेषकर अन्तिम श्लोक जहाँ तुलसीदास पूर्णतः समर्पण करते हैं। शिवलिंग या प्रतिमा के सम्मुख बैठें, दीपक जलाएँ और धीरे-धीरे पाठ करें ताकि हर श्लोक का अर्थ हृदय में उतरे। दार्शनिक वर्णन से आत्मीय समर्पण की ओर की यह यात्रा भक्त के मार्ग का ही प्रतिबिम्ब है।
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