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कर्पूरगौरं करुणावतारम्

🕉️ hindu·📿 108× जप·🕐 किसी भी आरती के बाद, सोमवार प्रातः, अथवा किसी भी समय·🎵 ऑडियो सहित·📜 Traditional Sanskrit devotional verse

अन्य नाम / खोज: karpura gauram karunavataram · karpur gauram · karunavataram samsara saram

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अर्थ

कर्पूरगौरं भगवान शिव की चार पंक्तियों वाली अत्यंत प्रभावशाली स्तुति है, जिसमें उन्हें कर्पूर-सा श्वेत, करुणा का अवतार और पार्वती सहित हृदय-कमल में सदा निवास करने वाला कहा गया है। यह प्रायः हर शिव-आरती के अंत में गाया जाता है। इसका जप मन में तुरंत शांति और दिव्य संबंध जगाता है।

उत्पत्ति और कथा

Traditional Sanskrit devotional verse · Unknown (ancient tradition) · Ancient

यह श्लोक हिंदू मंदिर-पूजा के ताने-बाने में रचा-बसा है — यह भारत भर में होने वाली हर शिव-आरती का सार्वभौमिक समापन-श्लोक है। इसकी चार पंक्तियाँ शिव-उपासना के संपूर्ण भाव को समेट लेती हैं: उनकी पवित्रता (कर्पूर-सा श्वेत), उनका स्वरूप (करुणा का अवतार), उनकी ब्रह्मांडीय भूमिका (अस्तित्व का सार), उनका रूप (सर्प-धारी) और उनकी उपस्थिति (पार्वती सहित सदा भक्त के हृदय में)।

शास्त्रों में वर्णित

काशी (वाराणसी) में यह मंत्र प्रतिदिन हर शिव मंदिर की हर आरती के समापन-श्लोक के रूप में करोड़ों बार जपा जाता है। काशी विश्वनाथ मंदिर में जब संध्या-आरती हजारों कंठों से 'कर्पूरगौरं' के सामूहिक उच्चारण के साथ संपन्न होती है, तब भक्त अनुभव करते हैं कि वातावरण दिव्य उपस्थिति से भर उठता है — अनेकों को स्वतः अश्रु, दिव्य अनुभूति और गहन ध्यान की अवस्था प्राप्त होती है। इस मंत्र की शक्ति इसकी सरलता में है: केवल चार पंक्तियाँ जो शिव के संपूर्ण सार को धारण करती हैं।

सुनें और साथ में जपें

मंत्र

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कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥

Karpura Gauram Karunavataram Sansara Saram Bhujagendra Haram Sada Vasantam Hridayaravinde Bhavam Bhavani Sahitam Namami

अर्थ:कर्पूर-से गौर, करुणा के अवतार, संसार के सार, सर्पराज को हार रूप में धारण करने वाले; पार्वती-सहित सदा हृदय-कमल में निवास करने वाले भगवान शिव को मैं प्रणाम करता हूँ।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

कर्पूरगौरं🔊Karpura Gauramकर्पूर-समान श्वेत/पवित्र
करुणावतारं🔊Karunavataramकरुणा के अवतार
संसारसारं🔊Sansara Saramसंसार/अस्तित्व का सार
भुजगेन्द्रहारम्🔊Bhujagendra Haramसर्पराज को हार रूप में धारण करने वाले
सदावसन्तं🔊Sada Vasantamसदा निवास करने वाले
हृदयारविन्दे🔊Hridayaravindeहृदय-कमल में
भवं🔊Bhavamभगवान शिव (अस्तित्व के स्रोत)
भवानीसहितं🔊Bhavani Sahitamभवानी (पार्वती) सहित
नमामि🔊Namamiमैं प्रणाम करता हूँ, नमन करता हूँ

कर्पूरगौरं करुणावतारम् पाठ के लाभ

सबसे छोटे किंतु अत्यंत प्रभावशाली शिव मंत्रों में से एक — केवल 4 पंक्तियाँ

भारत भर में हर शिव-आरती के समापन पर इसका जप होता है

शिव और पार्वती दोनों का — दिव्य युगल का — एक साथ आवाहन करता है

'सदावसन्तं हृदयारविन्दे' — प्रभु सदा आपके हृदय में निवास करते हैं

नौसिखियों के लिए आदर्श — याद रखने और जपने में सरल

तुरंत शांति और ईश्वर से जुड़ाव का अनुभव कराता है

कर्पूरगौरं करुणावतारम् जप विधि

जप संख्या108बार
उत्तम समयकिसी भी आरती के बाद, सोमवार प्रातः, अथवा किसी भी समय

परंपरागत रूप से यह हर शिव-आरती का समापन मंत्र है। इसे स्वतंत्र रूप से 108 बार एक प्रभावशाली ध्यान के रूप में भी जपा जा सकता है। आँखें बंद करें और शिव-पार्वती को अपने हृदय-कमल में एक साथ विराजमान देखें। प्रत्येक शब्द एक सजीव चित्र खींचता है — कर्पूर-सा श्वेत, करुणामय, सर्प-धारी, आपके भीतर निवास करते हुए। जप करते समय प्रत्येक गुण को अनुभव करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह चार पंक्तियों का संस्कृत श्लोक है जो भगवान शिव को कर्पूर-सा श्वेत, करुणा का अवतार, सर्पों को धारण करने वाला और पार्वती सहित भक्त के हृदय में सदा निवास करने वाला बताता है। इसका जप हर शिव-आरती के अंत में होता है।
मंदिरों और घरों में हर शिव-आरती के समापन पर। इसे स्वतंत्र मंत्र के रूप में भी ध्यान के समय, सोमवार को और महाशिवरात्रि पर जपा जाता है।
कर्पूर पूर्णतः जलकर कोई अवशेष नहीं छोड़ता — यह शिव के अहंकार और आसक्ति-रहित शुद्ध चेतना स्वरूप का प्रतीक है। इसकी श्वेतता पवित्रता और इसकी सुगंध दिव्य कृपा की मधुरता दर्शाती है।
'कर्पूरगौरं' अर्थात् 'कर्पूर-सा श्वेत'; 'करुणावतारम्' — 'करुणा का साक्षात अवतार'; 'संसारसारं' — 'सांसारिक अस्तित्व का सार'; 'भुजगेन्द्रहारम्' — 'जो सर्पराज को हार रूप में धारण करते हैं'; 'सदावसन्तं हृदयारविन्दे' — 'जो सदा हृदय-कमल में निवास करते हैं'; 'भवं भवानीसहितं नमामि' — 'उन भव (शिव) को, भवानी (पार्वती) सहित, मैं प्रणाम करता हूँ।' यह श्लोक हर आरती के अंत में गाया जाता है।

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