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शिव चालीसा

🕉️ hindu·📿 11× जप·🕐 सोमवार प्रातः, महाशिवरात्रि, श्रावण मास·🎵 ऑडियो सहित·📜 Hindu devotional tradition

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अर्थ

शिव चालीसा भगवान शिव की स्तुति में चालीस चौपाइयों का भक्ति-गान है, जो उनके दिव्य रूप, उनके परिवार और भक्तों की रक्षा करने वाले कार्यों का वर्णन करता है। इसका पाठ शिव की कृपा, मन की शांति और संकटों से रक्षा प्रदान करता है।

उत्पत्ति और कथा

Hindu devotional tradition · Unknown (attributed to devotional folk tradition) · Medieval period

शिव चालीसा तुलसीदास द्वारा प्रचलित चालीसा परंपरा का अनुसरण करती है, किंतु इसके विशिष्ट रचयिता पर मतभेद है। यह भगवान शिव को उनके संपूर्ण रूप में वर्णित करती है — तपस्वी जो गृहस्थ भी हैं, संहारक जो सृष्टिकर्ता भी हैं, उग्र जो करुणामय भी हैं। इसकी कथा शिव पुराण से ली गई है, जिसमें त्रिपुरासुर का संहार, समुद्र मंथन में उनकी भूमिका और सृष्टि-संहार के उनके शाश्वत नृत्य का उल्लेख है।

शास्त्रों में वर्णित

शिव पुराण में वर्णित है कि समुद्र मंथन के समय जब हलाहल विष प्रकट हुआ और समस्त सृष्टि को नष्ट करने को था, तब न देव न दानव उसे रोक सके। भगवान शिव ने ब्रह्मांड की रक्षा के लिए सारा विष पी लिया। देवी पार्वती ने उसे शरीर में जाने से रोकने के लिए उनका कंठ दबा दिया, जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया — इसी से उनका नाम नीलकंठ पड़ा। समस्त सृष्टि के लिए यह आत्म-बलिदान शिव की करुणा का परम प्रमाण है।

सुनें और साथ में जपें

सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित

किसी भी पंक्ति या ▶ बटन पर टैप कर सुनें

दोहा 1

दोहा जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान। कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥

|| Doha || Jai Ganesh Girija Suvan, Mangal Mool Sujaan Kahat Ayodhyadas Tum, Dehu Abhay Vardaan

अर्थ:आरम्भिक दोहा: गिरिजा (पार्वती) के पुत्र गणेश की जय, जो समस्त मंगल के बुद्धिमान मूल हैं। अयोध्यादास कहते हैं — हमें निर्भयता का वर दीजिए।

दोहा 2

चौपाई जय गिरिजा पति दीनदयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥

|| Chaupai || Jai Girijapati Deendayala Sada Karat Santan Pratipala

अर्थ:पार्वती के स्वामी की जय, जो दीनों पर दयालु हैं। आप सदा संतों की रक्षा करते हैं।

चौपाई 1

भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥

Bhal Chandrama Sohat Neeke Kanan Kundal Nagphani Ke

अर्थ:आपके मस्तक पर अर्धचन्द्र सुन्दर शोभा देता है। आपके कुण्डल सर्प के फण हैं।

चौपाई 2

अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन छार लगाये॥

Ang Gaur Shir Gang Bahaye Mundmal Tan Chhar Lagaye

अर्थ:आपका शरीर गौर है, सिर से गंगा बहती है। आप मुण्डमाला धारण करते हैं और शरीर पर भस्म लगाते हैं।

चौपाई 3

वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देख नाग मुनि मोहे॥

Vastra Khal Baghambr Sohe Chhavi Ko Dekh Naag Muni Mohe

अर्थ:आप व्याघ्रचर्म से सुशोभित हैं। आपकी शोभा देखकर सर्प और मुनि भी मोहित हो जाते हैं।

चौपाई 4

मैना मातु की हवै दुलारी। वाम अंग सोहत छवि न्यारी॥

Maina Matu Ki Havai Dulari Vam Ang Sohat Chhavi Nyari

अर्थ:मैना की प्रिय पुत्री पार्वती अनुपम शोभा से आपके वाम भाग में विराजती हैं।

चौपाई 5

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥

Kar Trishul Sohat Chhavi Bhari Karat Sada Shatrun Kshayakari

अर्थ:आपके हाथ का त्रिशूल अत्यन्त शोभायमान है। आप निरन्तर समस्त शत्रुओं का नाश करते हैं।

चौपाई 6

नन्दि गणेश सोहत तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥

Nandi Ganesh Sohat Tahan Kaise Sagar Madhya Kamal Hain Jaise

अर्थ:नन्दी और गणेश आपके पास बैठते हैं, मानो सागर के मध्य कमल हों।

चौपाई 7

कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात काऊ॥

Kartik Shyam Aur Ganrau Ya Chhavi Ko Kahi Jaat Na Kau

अर्थ:श्याम वर्ण कार्तिकेय और गणेश — इस दिव्य दर्शन का वर्णन कोई नहीं कर सकता।

चौपाई 8

देवन जबहीं जाय पुकारा। तबहीं दुख प्रभु आप निवारा॥

Devan Jabahi Jaay Pukara Tabahi Dukh Prabhu Aap Nivara

अर्थ:जब-जब देवता रोते हुए आपके पास आते हैं, आप तत्काल उनके दुःख दूर करते हैं।

चौपाई 9

किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥

Kiya Upadrav Tarak Bhari Devan Sab Mili Tumhi Juhari

अर्थ:जब तारक दैत्य ने महाउत्पात मचाया, तब सब देवता मिलकर आपकी प्रार्थना करने आए।

चौपाई 10

तुरत षडानन आप पठायऊ। लवनिमेष महँ मारि गिरायऊ॥

Turat Shadanan Aap Pathayau Lav Nimesh Mahan Maari Girayau

अर्थ:आपने तुरन्त अपने षण्मुख पुत्र (कार्तिकेय) को भेजा। पलक झपकते ही उसने दैत्य का वध कर उसे गिरा दिया।

चौपाई 11

आप जलन्धर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥

Aap Jalandhar Asur Samhara Suyash Tumhar Vidit Sansara

अर्थ:आपने स्वयं जालन्धर दैत्य का नाश किया। आपकी महिमा सम्पूर्ण विश्व में विख्यात है।

चौपाई 12

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा करि लीन बचाई॥

Tripurasur San Yuddh Machai Sabhi Kripa Kari Leen Bachai

अर्थ:आपने त्रिपुरासुर दैत्य से युद्ध किया। अपनी कृपा से आपने सबकी रक्षा की।

चौपाई 13

किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥

Kiya Tapahi Bhagirath Bhari Purab Pratigya Tasu Purari

अर्थ:भगीरथ ने महान तप किया। हे प्रभु, आपने उनका प्राचीन व्रत पूर्ण किया।

चौपाई 14

दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥

Danin Mahan Tum Sam Kou Nahin Sevak Stuti Karat Sadahin

अर्थ:दानियों में कोई आपकी समानता नहीं करता। आपके भक्त सदा आपकी स्तुति गाते हैं।

चौपाई 15

वेद नाम महिमा तव गाईं। अकथ अनादि भेद नहिं पाईं॥

Ved Naam Mahima Tav Gayin Akath Anadi Bhed Nahin Payin

अर्थ:वेद आपके नाम की महिमा गाते हैं। अनिर्वचनीय, अनादि — वे आपके रहस्य को नहीं जान पाते।

चौपाई 16

प्रगट उदधि मंथन में ज्वाला। जरत सुरासुर भए बिहाला॥

Pragat Udadhi Manthan Mein Jwala Jarat Surasur Bhaye Bihala

अर्थ:समुद्र मंथन के समय भयंकर विष निकला। जलते हुए विष से देव और दैत्य दोनों व्याकुल हो उठे।

चौपाई 17

कीन्ह दया तहँ करी सहाई। नीलकंठ तब नाम कहाई॥

Keenh Daya Tahan Kari Sahai Neelkanth Tab Naam Kahai

अर्थ:आपने दया दिखाकर उनकी सहायता की। तब आप नीलकण्ठ कहलाए।

चौपाई 18

पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥

Poojan Ramchandra Jab Keenha Jeet Ke Lanka Vibheeshan Deenha

अर्थ:जब भगवान रामचन्द्र ने आपकी पूजा की, उन्होंने लंका जीतकर विभीषण को दे दी।

चौपाई 19

सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥

Sahas Kamal Mein Ho Rahe Dhari Keenh Pariksha Tabahi Purari

अर्थ:राम आपको सहस्र कमल अर्पित कर रहे थे। तब हे प्रभु, आपने उनकी भक्ति की परीक्षा ली।

चौपाई 20

एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहँ सोई॥

Ek Kamal Prabhu Rakheu Joi Kamal Nayan Poojan Chaha Soi

अर्थ:आपने एक कमल छिपा लिया। राम ने उसके स्थान पर अपना कमल-समान नेत्र अर्पित कर दिया।

चौपाई 21

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भए प्रसन्न दिए इच्छित वर॥

Kathin Bhakti Dekhi Prabhu Shankar Bhaye Prasanna Diye Ichchhit Var

अर्थ:ऐसी प्रगाढ़ भक्ति देखकर भगवान शंकर प्रसन्न हुए और उन्हें इच्छित वर दिया।

चौपाई 22

जय जय जय अनन्त अविनाशी। करत कृपा सबके घटवासी॥

Jai Jai Jai Anant Avinashi Karat Kripa Sabke Ghatvasi

अर्थ:जय, जय, जय अनन्त और अविनाशी! आप सबके हृदय में वास करते हैं और सब पर कृपा बरसाते हैं।

चौपाई 23

दुष्ट सकल मोहिं नित सतावैं। भ्रमत रहउँ मोहिं चैन आवै॥

Dusht Sakal Mohi Nit Satavain Bhramat Rahau Mohi Chain Na Aavai

अर्थ:दुष्ट लोग मुझे निरन्तर सताते हैं। मैं बिना शान्ति के बेचैन भटकता हूँ।

चौपाई 24

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। यहि अवसर मोहिं आन उबारो॥

Trahi Trahi Main Naath Pukaro Yahi Avasar Mohi Aan Ubaro

अर्थ:मैं पुकारता हूँ — बचाओ, बचाओ, हे प्रभु! इसी क्षण आकर मेरा उद्धार करो।

चौपाई 25

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट से मोहिं आन उबारो॥

Lai Trishul Shatrun Ko Maro Sankat Se Mohi Aan Ubaro

अर्थ:अपना त्रिशूल उठाकर मेरे शत्रुओं का नाश करो। इस संकट से मेरी रक्षा करो।

चौपाई 26

मात पिता भ्राता सब कोई। संकट में पूछत नहिं कोई॥

Maat Pita Bhrata Sab Koi Sankat Mein Poochhat Nahin Koi

अर्थ:माता, पिता, भाई — सब — संकट के समय कोई मेरी सुध नहीं लेता।

चौपाई 27

स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु अब संकट भारी॥

Swami Ek Hai Aas Tumhari Aay Harahu Ab Sankat Bhari

अर्थ:हे प्रभु, मेरी एकमात्र आशा आप ही हैं। अब आकर इस महान कठिनाई को दूर करो।

चौपाई 28

धाम तुम्हारो कैलाश है भारी। सब जग जानत सुन्दर न्यारी॥

Dham Tumharo Kailash Hai Bhari Sab Jag Janat Sundar Nyari

अर्थ:आपका धाम विशाल कैलाश है। समस्त संसार उसकी अनुपम शोभा जानता है।

चौपाई 29

नन्दी भृंगी सदा सोहारी। करत भजन ब्रह्म सुकुमारी॥

Nandi Bhringi Sada Sohari Karat Bhajan Brahm Sukumari

अर्थ:वहाँ नन्दी और भृंगी सदा आनन्दित रहते हैं। ब्रह्मा आदि देवता पूजा करते हैं।

चौपाई 30

कंचन कुण्डल कर्णन शोभे। देवता दर्शन को अति लोभे॥

Kanchan Kundal Karnan Shobhe Devta Darshan Ko Ati Lobhe

अर्थ:स्वर्ण कुण्डल आपके कानों में सुन्दर शोभा देते हैं। देवता आपके दर्शन को आतुर रहते हैं।

चौपाई 31

प्रसन्न चित होइ शम्भु शूला। बाँट दे सबको अमर फला॥

Prasanna Chit Hoi Shambhu Shoola Bant De Sabko Amar Phala

अर्थ:जब भगवान शम्भु हृदय में प्रसन्न होते हैं, वे सबको अमृत फल बाँटते हैं।

चौपाई 32

नागपाश लपेट शरीरा। ऐसे शोभित त्रिपुरारी वीरा॥

Nagpash Lapet Sharira Aise Shobhit Tripurari Veera

अर्थ:आपके शरीर पर सर्प लिपटे रहते हैं। ऐसे सुशोभित होकर, हे वीर त्रिपुरारी, आप शोभायमान हैं।

चौपाई 33

करत सदा शत्रुन क्षयकारी। देवताओं के सदा सुखकारी॥

Karat Sada Shatrun Kshayakari Devtaon Ke Sada Sukhkari

अर्थ:आप सदा शत्रुओं का नाश करते हैं। आप सदा देवताओं को सुख देते हैं।

चौपाई 34

शिव चालीसा जो कोई गावे। सब सुख सम्पत्ति घर आवे॥

Shiv Chalisa Jo Koi Gaave Sab Sukh Sampatti Ghar Aave

अर्थ:जो कोई इस शिव चालीसा को गाता है, उसके घर समस्त सुख और समृद्धि आती है।

चौपाई 35

काशी में विराजत शम्भु शंकर। आरती होत सदा जय कर॥

Kashi Mein Virajat Shambhu Shankar Aarti Hot Sada Jai Kar

अर्थ:काशी में भगवान शम्भु शंकर विराजते हैं। उनकी आरती सदा विजयोल्लास से होती है।

चौपाई 36

विश्वनाथ दरबार है भारी। जहाँ बसत तीनों त्रिपुरारी॥

Vishwanath Darbar Hai Bhari Jahan Basat Teeno Tripurari

अर्थ:विश्वनाथ का दरबार अत्यन्त भव्य है। वहाँ त्रिलोकीनाथ वास करते हैं।

चौपाई 37

दशरथ एक अचम्भो देखा। शम्भु विवाह मनोहर पेखा॥

Dashrath Ek Achambho Dekha Shambhu Vivah Manohar Pekha

अर्थ:दशरथ ने एक अद्भुत दृश्य देखा — भगवान शम्भु का सुन्दर और मनोहर विवाह।

चौपाई 38

सुन्दरदास ज्ञान नहिं पायो। शिव चालीसा अल्प बनायो॥

Sundardas Gyan Nahin Payo Shiv Chalisa Alp Banayo

अर्थ:सुन्दरदास कहते हैं कि उन्हें पूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ, और उन्होंने यह विनम्र शिव चालीसा रची।

चौपाई 39

जो यह पढ़े महेश्वर पूजा। उसकी कठिन कभी नहिं दूजा॥

Jo Yah Padhe Maheshwar Pooja Uski Kathin Kabhi Nahin Dooja

अर्थ:जो कोई महेश्वर की इस पूजा को पढ़ता है, उसे कोई कठिनाई कभी नहीं छू सकती।

अंतिम दोहा

दोहा मंत्र तंत्र विज्ञान के जो कुछ होवे सार। शिव शिव शिव सत्य है शिव का नाम अपार॥

|| Doha || Mantra Tantra Vigyan Ke Jo Kuchh Hove Saar Shiv Shiv Shiv Satya Hai Shiv Ka Naam Apaar

अर्थ:समापन दोहा: समस्त मन्त्र, तन्त्र और विद्याओं में — जो भी सार है — शिव, शिव, शिव ही सत्य है। शिव का नाम अनन्त है।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

गिरिजापति🔊Girijapatiगिरिजा (पार्वती) के स्वामी — शिव
दीनदयाला🔊Deendayalaदीनों पर दयालु
चन्द्रमा🔊Chandramaअर्धचन्द्र (मस्तक पर)
नागफनी🔊Nagphaniसर्प का फण (कुण्डल)
गंग🔊Gangगंगा नदी (केशों से बहती हुई)
मुण्डमाल🔊Mundmalमुण्डमाला
छार🔊Chharभस्म (शरीर पर लगी हुई)
बाघम्बर🔊Baghambrव्याघ्रचर्म
त्रिशूल🔊Trishulत्रिशूल
नन्दि🔊Nandiशिव का पवित्र वृषभ (नन्दी)
कार्तिक🔊Kartikकार्तिकेय (शिव-पुत्र)
तारक🔊Tarakतारकासुर दैत्य
क्षयकारी🔊Kshayakari(शत्रुओं का) संहारक
षडानन🔊Shadananषण्मुख (कार्तिकेय/मुरुगन)
जलन्धर🔊Jalandharजालन्धर दैत्य
त्रिपुरासुर🔊Tripurasurत्रिपुर का दैत्य
भागीरथ🔊Bhagirathगंगा को धरती पर लाने वाला राजा
नीलकंठ🔊Neelkanthनीलकण्ठ — विषपान के बाद शिव
अनन्त🔊Anantअनन्त, अन्तहीन
अविनाशी🔊Avinashiअविनाशी, अक्षय
कैलाश🔊Kailashकैलाश पर्वत — शिव का धाम
भृंगी🔊Bhringiशिव का भक्त मुनि-गण
त्रिपुरारी🔊Tripurariत्रिपुर का संहारक (शिव)
महेश्वर🔊Maheshwarमहान प्रभु (शिव)
तंत्र🔊Tantraपवित्र तान्त्रिक साधनाएँ
सम्पत्ति🔊Sampattiधन, समृद्धि
अयोध्यादास🔊Ayodhyadasकवि अयोध्यादास (चालीसा के रचयिता)
अभय🔊Abhayनिर्भयता
वरदान🔊Vardaanवर, दिव्य आशीर्वाद
उदधि🔊Udadhiसमुद्र (कॉस्मिक सागर का संकेत)
सुरासुर🔊Surasurदेव (सुर) और दैत्य (असुर)
आशुतोष🔊Ashutoshसरलता से प्रसन्न होने वाले — शिव का नाम
शम्भु🔊Shambhuसुख के स्रोत — शिव का नाम
पुरारी🔊Purariत्रिपुर का संहारक — शिव
घटवासी🔊Ghatvasiसबके हृदय में वास करने वाले
विश्वनाथ🔊Vishwanathविश्व के स्वामी — काशी में शिव
विभीषण🔊Vibhishanरावण का भाई, राम का भक्त
संकट🔊Sankatसंकट, कठिनाई, विपत्ति

शिव चालीसा पाठ के लाभ

भगवान शिव की संपूर्ण कृपा और रक्षा का आवाहन करता है

सोमवार, महाशिवरात्रि और श्रावण मास में विशेष रूप से प्रभावशाली है

मन को शांति देता है, क्रोध और नकारात्मक भावनाओं को दूर करता है

चौपाइयों में वर्णित अनुसार शत्रुओं और बाधाओं का नाश करता है

वैवाहिक जीवन में सामंजस्य लाता है (शिव-पार्वती आदर्श दंपति हैं)

नियमित सोमवार का पाठ साधक के आध्यात्मिक जीवन को बदल देता है

शिव चालीसा जप विधि

जप संख्या11बार
उत्तम समयसोमवार प्रातः, महाशिवरात्रि, श्रावण मास

शिव लिंग या प्रतिमा के सम्मुख बैठें। घी का दीपक जलाएँ। बिल्व पत्र और जल अर्पित करें। नियमित अभ्यास के लिए सोमवार को 11 बार पाठ करें। श्रावण मास (जुलाई-अगस्त) में नित्य पाठ विशेष फलदायी है। अधिक भक्ति के लिए शिव चालीसा के बाद 'ॐ नमः शिवाय' का 108 बार जप किया जा सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवान शिव की स्तुति में चालीस चौपाइयों का भक्ति-गान, जो उनके दिव्य रूप, उनके परिवार (पार्वती, गणेश, कार्तिकेय), उनके गुणों (त्रिशूल, चंद्रमा, गंगा, नाग) और भक्तों तथा देवों की रक्षा के कार्यों का वर्णन करता है।
सोमवार को (शिव का दिन), महाशिवरात्रि पर, समस्त श्रावण मास में (शिव पूजा के लिए सर्वाधिक शुभ) और प्रदोष काल (संध्या) में।
ॐ नमः शिवाय पाँच अक्षरों का मंत्र है, जो निरंतर जप के लिए है। शिव चालीसा चालीस चौपाइयों का स्तुति-गान है जो एक कथा कहता है — शिव के रूप, उनके कार्य और रक्षक स्वभाव का वर्णन। दोनों शिव की उपासना हैं पर भिन्न भक्ति-प्रयोजन रखते हैं।

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