शिव चालीसा
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✦ अर्थ
शिव चालीसा भगवान शिव की स्तुति में चालीस चौपाइयों का भक्ति-गान है, जो उनके दिव्य रूप, उनके परिवार और भक्तों की रक्षा करने वाले कार्यों का वर्णन करता है। इसका पाठ शिव की कृपा, मन की शांति और संकटों से रक्षा प्रदान करता है।
उत्पत्ति और कथा
Hindu devotional tradition · Unknown (attributed to devotional folk tradition) · Medieval period
शिव चालीसा तुलसीदास द्वारा प्रचलित चालीसा परंपरा का अनुसरण करती है, किंतु इसके विशिष्ट रचयिता पर मतभेद है। यह भगवान शिव को उनके संपूर्ण रूप में वर्णित करती है — तपस्वी जो गृहस्थ भी हैं, संहारक जो सृष्टिकर्ता भी हैं, उग्र जो करुणामय भी हैं। इसकी कथा शिव पुराण से ली गई है, जिसमें त्रिपुरासुर का संहार, समुद्र मंथन में उनकी भूमिका और सृष्टि-संहार के उनके शाश्वत नृत्य का उल्लेख है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
शिव पुराण में वर्णित है कि समुद्र मंथन के समय जब हलाहल विष प्रकट हुआ और समस्त सृष्टि को नष्ट करने को था, तब न देव न दानव उसे रोक सके। भगवान शिव ने ब्रह्मांड की रक्षा के लिए सारा विष पी लिया। देवी पार्वती ने उसे शरीर में जाने से रोकने के लिए उनका कंठ दबा दिया, जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया — इसी से उनका नाम नीलकंठ पड़ा। समस्त सृष्टि के लिए यह आत्म-बलिदान शिव की करुणा का परम प्रमाण है।
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॥ दोहा ॥ जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान। कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥
|| Doha || Jai Ganesh Girija Suvan, Mangal Mool Sujaan Kahat Ayodhyadas Tum, Dehu Abhay Vardaan
अर्थ:आरम्भिक दोहा: गिरिजा (पार्वती) के पुत्र गणेश की जय, जो समस्त मंगल के बुद्धिमान मूल हैं। अयोध्यादास कहते हैं — हमें निर्भयता का वर दीजिए।
॥ चौपाई ॥ जय गिरिजा पति दीनदयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥
|| Chaupai || Jai Girijapati Deendayala Sada Karat Santan Pratipala
अर्थ:पार्वती के स्वामी की जय, जो दीनों पर दयालु हैं। आप सदा संतों की रक्षा करते हैं।
भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥
Bhal Chandrama Sohat Neeke Kanan Kundal Nagphani Ke
अर्थ:आपके मस्तक पर अर्धचन्द्र सुन्दर शोभा देता है। आपके कुण्डल सर्प के फण हैं।
अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन छार लगाये॥
Ang Gaur Shir Gang Bahaye Mundmal Tan Chhar Lagaye
अर्थ:आपका शरीर गौर है, सिर से गंगा बहती है। आप मुण्डमाला धारण करते हैं और शरीर पर भस्म लगाते हैं।
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देख नाग मुनि मोहे॥
Vastra Khal Baghambr Sohe Chhavi Ko Dekh Naag Muni Mohe
अर्थ:आप व्याघ्रचर्म से सुशोभित हैं। आपकी शोभा देखकर सर्प और मुनि भी मोहित हो जाते हैं।
मैना मातु की हवै दुलारी। वाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
Maina Matu Ki Havai Dulari Vam Ang Sohat Chhavi Nyari
अर्थ:मैना की प्रिय पुत्री पार्वती अनुपम शोभा से आपके वाम भाग में विराजती हैं।
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥
Kar Trishul Sohat Chhavi Bhari Karat Sada Shatrun Kshayakari
अर्थ:आपके हाथ का त्रिशूल अत्यन्त शोभायमान है। आप निरन्तर समस्त शत्रुओं का नाश करते हैं।
नन्दि गणेश सोहत तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
Nandi Ganesh Sohat Tahan Kaise Sagar Madhya Kamal Hain Jaise
अर्थ:नन्दी और गणेश आपके पास बैठते हैं, मानो सागर के मध्य कमल हों।
कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥
Kartik Shyam Aur Ganrau Ya Chhavi Ko Kahi Jaat Na Kau
अर्थ:श्याम वर्ण कार्तिकेय और गणेश — इस दिव्य दर्शन का वर्णन कोई नहीं कर सकता।
देवन जबहीं जाय पुकारा। तबहीं दुख प्रभु आप निवारा॥
Devan Jabahi Jaay Pukara Tabahi Dukh Prabhu Aap Nivara
अर्थ:जब-जब देवता रोते हुए आपके पास आते हैं, आप तत्काल उनके दुःख दूर करते हैं।
किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥
Kiya Upadrav Tarak Bhari Devan Sab Mili Tumhi Juhari
अर्थ:जब तारक दैत्य ने महाउत्पात मचाया, तब सब देवता मिलकर आपकी प्रार्थना करने आए।
तुरत षडानन आप पठायऊ। लवनिमेष महँ मारि गिरायऊ॥
Turat Shadanan Aap Pathayau Lav Nimesh Mahan Maari Girayau
अर्थ:आपने तुरन्त अपने षण्मुख पुत्र (कार्तिकेय) को भेजा। पलक झपकते ही उसने दैत्य का वध कर उसे गिरा दिया।
आप जलन्धर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥
Aap Jalandhar Asur Samhara Suyash Tumhar Vidit Sansara
अर्थ:आपने स्वयं जालन्धर दैत्य का नाश किया। आपकी महिमा सम्पूर्ण विश्व में विख्यात है।
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा करि लीन बचाई॥
Tripurasur San Yuddh Machai Sabhi Kripa Kari Leen Bachai
अर्थ:आपने त्रिपुरासुर दैत्य से युद्ध किया। अपनी कृपा से आपने सबकी रक्षा की।
किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥
Kiya Tapahi Bhagirath Bhari Purab Pratigya Tasu Purari
अर्थ:भगीरथ ने महान तप किया। हे प्रभु, आपने उनका प्राचीन व्रत पूर्ण किया।
दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥
Danin Mahan Tum Sam Kou Nahin Sevak Stuti Karat Sadahin
अर्थ:दानियों में कोई आपकी समानता नहीं करता। आपके भक्त सदा आपकी स्तुति गाते हैं।
वेद नाम महिमा तव गाईं। अकथ अनादि भेद नहिं पाईं॥
Ved Naam Mahima Tav Gayin Akath Anadi Bhed Nahin Payin
अर्थ:वेद आपके नाम की महिमा गाते हैं। अनिर्वचनीय, अनादि — वे आपके रहस्य को नहीं जान पाते।
प्रगट उदधि मंथन में ज्वाला। जरत सुरासुर भए बिहाला॥
Pragat Udadhi Manthan Mein Jwala Jarat Surasur Bhaye Bihala
अर्थ:समुद्र मंथन के समय भयंकर विष निकला। जलते हुए विष से देव और दैत्य दोनों व्याकुल हो उठे।
कीन्ह दया तहँ करी सहाई। नीलकंठ तब नाम कहाई॥
Keenh Daya Tahan Kari Sahai Neelkanth Tab Naam Kahai
अर्थ:आपने दया दिखाकर उनकी सहायता की। तब आप नीलकण्ठ कहलाए।
पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥
Poojan Ramchandra Jab Keenha Jeet Ke Lanka Vibheeshan Deenha
अर्थ:जब भगवान रामचन्द्र ने आपकी पूजा की, उन्होंने लंका जीतकर विभीषण को दे दी।
सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥
Sahas Kamal Mein Ho Rahe Dhari Keenh Pariksha Tabahi Purari
अर्थ:राम आपको सहस्र कमल अर्पित कर रहे थे। तब हे प्रभु, आपने उनकी भक्ति की परीक्षा ली।
एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहँ सोई॥
Ek Kamal Prabhu Rakheu Joi Kamal Nayan Poojan Chaha Soi
अर्थ:आपने एक कमल छिपा लिया। राम ने उसके स्थान पर अपना कमल-समान नेत्र अर्पित कर दिया।
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भए प्रसन्न दिए इच्छित वर॥
Kathin Bhakti Dekhi Prabhu Shankar Bhaye Prasanna Diye Ichchhit Var
अर्थ:ऐसी प्रगाढ़ भक्ति देखकर भगवान शंकर प्रसन्न हुए और उन्हें इच्छित वर दिया।
जय जय जय अनन्त अविनाशी। करत कृपा सबके घटवासी॥
Jai Jai Jai Anant Avinashi Karat Kripa Sabke Ghatvasi
अर्थ:जय, जय, जय अनन्त और अविनाशी! आप सबके हृदय में वास करते हैं और सब पर कृपा बरसाते हैं।
दुष्ट सकल मोहिं नित सतावैं। भ्रमत रहउँ मोहिं चैन न आवै॥
Dusht Sakal Mohi Nit Satavain Bhramat Rahau Mohi Chain Na Aavai
अर्थ:दुष्ट लोग मुझे निरन्तर सताते हैं। मैं बिना शान्ति के बेचैन भटकता हूँ।
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। यहि अवसर मोहिं आन उबारो॥
Trahi Trahi Main Naath Pukaro Yahi Avasar Mohi Aan Ubaro
अर्थ:मैं पुकारता हूँ — बचाओ, बचाओ, हे प्रभु! इसी क्षण आकर मेरा उद्धार करो।
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट से मोहिं आन उबारो॥
Lai Trishul Shatrun Ko Maro Sankat Se Mohi Aan Ubaro
अर्थ:अपना त्रिशूल उठाकर मेरे शत्रुओं का नाश करो। इस संकट से मेरी रक्षा करो।
मात पिता भ्राता सब कोई। संकट में पूछत नहिं कोई॥
Maat Pita Bhrata Sab Koi Sankat Mein Poochhat Nahin Koi
अर्थ:माता, पिता, भाई — सब — संकट के समय कोई मेरी सुध नहीं लेता।
स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु अब संकट भारी॥
Swami Ek Hai Aas Tumhari Aay Harahu Ab Sankat Bhari
अर्थ:हे प्रभु, मेरी एकमात्र आशा आप ही हैं। अब आकर इस महान कठिनाई को दूर करो।
धाम तुम्हारो कैलाश है भारी। सब जग जानत सुन्दर न्यारी॥
Dham Tumharo Kailash Hai Bhari Sab Jag Janat Sundar Nyari
अर्थ:आपका धाम विशाल कैलाश है। समस्त संसार उसकी अनुपम शोभा जानता है।
नन्दी भृंगी सदा सोहारी। करत भजन ब्रह्म सुकुमारी॥
Nandi Bhringi Sada Sohari Karat Bhajan Brahm Sukumari
अर्थ:वहाँ नन्दी और भृंगी सदा आनन्दित रहते हैं। ब्रह्मा आदि देवता पूजा करते हैं।
कंचन कुण्डल कर्णन शोभे। देवता दर्शन को अति लोभे॥
Kanchan Kundal Karnan Shobhe Devta Darshan Ko Ati Lobhe
अर्थ:स्वर्ण कुण्डल आपके कानों में सुन्दर शोभा देते हैं। देवता आपके दर्शन को आतुर रहते हैं।
प्रसन्न चित होइ शम्भु शूला। बाँट दे सबको अमर फला॥
Prasanna Chit Hoi Shambhu Shoola Bant De Sabko Amar Phala
अर्थ:जब भगवान शम्भु हृदय में प्रसन्न होते हैं, वे सबको अमृत फल बाँटते हैं।
नागपाश लपेट शरीरा। ऐसे शोभित त्रिपुरारी वीरा॥
Nagpash Lapet Sharira Aise Shobhit Tripurari Veera
अर्थ:आपके शरीर पर सर्प लिपटे रहते हैं। ऐसे सुशोभित होकर, हे वीर त्रिपुरारी, आप शोभायमान हैं।
करत सदा शत्रुन क्षयकारी। देवताओं के सदा सुखकारी॥
Karat Sada Shatrun Kshayakari Devtaon Ke Sada Sukhkari
अर्थ:आप सदा शत्रुओं का नाश करते हैं। आप सदा देवताओं को सुख देते हैं।
शिव चालीसा जो कोई गावे। सब सुख सम्पत्ति घर आवे॥
Shiv Chalisa Jo Koi Gaave Sab Sukh Sampatti Ghar Aave
अर्थ:जो कोई इस शिव चालीसा को गाता है, उसके घर समस्त सुख और समृद्धि आती है।
काशी में विराजत शम्भु शंकर। आरती होत सदा जय कर॥
Kashi Mein Virajat Shambhu Shankar Aarti Hot Sada Jai Kar
अर्थ:काशी में भगवान शम्भु शंकर विराजते हैं। उनकी आरती सदा विजयोल्लास से होती है।
विश्वनाथ दरबार है भारी। जहाँ बसत तीनों त्रिपुरारी॥
Vishwanath Darbar Hai Bhari Jahan Basat Teeno Tripurari
अर्थ:विश्वनाथ का दरबार अत्यन्त भव्य है। वहाँ त्रिलोकीनाथ वास करते हैं।
दशरथ एक अचम्भो देखा। शम्भु विवाह मनोहर पेखा॥
Dashrath Ek Achambho Dekha Shambhu Vivah Manohar Pekha
अर्थ:दशरथ ने एक अद्भुत दृश्य देखा — भगवान शम्भु का सुन्दर और मनोहर विवाह।
सुन्दरदास ज्ञान नहिं पायो। शिव चालीसा अल्प बनायो॥
Sundardas Gyan Nahin Payo Shiv Chalisa Alp Banayo
अर्थ:सुन्दरदास कहते हैं कि उन्हें पूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ, और उन्होंने यह विनम्र शिव चालीसा रची।
जो यह पढ़े महेश्वर पूजा। उसकी कठिन कभी नहिं दूजा॥
Jo Yah Padhe Maheshwar Pooja Uski Kathin Kabhi Nahin Dooja
अर्थ:जो कोई महेश्वर की इस पूजा को पढ़ता है, उसे कोई कठिनाई कभी नहीं छू सकती।
॥ दोहा ॥ मंत्र तंत्र विज्ञान के जो कुछ होवे सार। शिव शिव शिव सत्य है शिव का नाम अपार॥
|| Doha || Mantra Tantra Vigyan Ke Jo Kuchh Hove Saar Shiv Shiv Shiv Satya Hai Shiv Ka Naam Apaar
अर्थ:समापन दोहा: समस्त मन्त्र, तन्त्र और विद्याओं में — जो भी सार है — शिव, शिव, शिव ही सत्य है। शिव का नाम अनन्त है।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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शिव चालीसा पाठ के लाभ
भगवान शिव की संपूर्ण कृपा और रक्षा का आवाहन करता है
सोमवार, महाशिवरात्रि और श्रावण मास में विशेष रूप से प्रभावशाली है
मन को शांति देता है, क्रोध और नकारात्मक भावनाओं को दूर करता है
चौपाइयों में वर्णित अनुसार शत्रुओं और बाधाओं का नाश करता है
वैवाहिक जीवन में सामंजस्य लाता है (शिव-पार्वती आदर्श दंपति हैं)
नियमित सोमवार का पाठ साधक के आध्यात्मिक जीवन को बदल देता है
शिव चालीसा जप विधि
शिव लिंग या प्रतिमा के सम्मुख बैठें। घी का दीपक जलाएँ। बिल्व पत्र और जल अर्पित करें। नियमित अभ्यास के लिए सोमवार को 11 बार पाठ करें। श्रावण मास (जुलाई-अगस्त) में नित्य पाठ विशेष फलदायी है। अधिक भक्ति के लिए शिव चालीसा के बाद 'ॐ नमः शिवाय' का 108 बार जप किया जा सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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