शिव तांडव स्तोत्रम्
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✦ अर्थ
शिव तांडव स्तोत्र लंकापति रावण द्वारा रचित एक ओजस्वी स्तुति है, जो शिव के ब्रह्मांडीय तांडव नृत्य की महिमा गाती है। डमरू-जैसे गर्जते छंदों में यह जटाओं में गंगा, गले में सर्पमाला और डमरू की ताल वाले शिव का वर्णन करती है। इसका पाठ अटल भक्ति, बल, समृद्धि और शिव की शीघ्र कृपा देने वाला माना जाता है।
उत्पत्ति और कथा
Composed independently · Ravana, King of Lanka · Treta Yuga (mythological era)
रामायण के अनुसार रावण भगवान शिव के सबसे बड़े भक्तों में से एक था। जब उसने कैलाश पर्वत को उठाने का प्रयास किया, तो शिव ने पर्वत को दबाकर रावण की उँगलियाँ कुचल दीं। वेदना और भक्ति में रावण ने शिव तांडव स्तोत्र की रचना की — जो इतना प्रभावशाली था कि शिव ने प्रसन्न होकर उसे अजेय खड्ग का वरदान दिया।
✦ शास्त्रों में वर्णित
शिव इस स्तोत्र से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने कैलाश को उखाड़ने के प्रयास के लिए रावण को क्षमा कर दिया और उसे चन्द्रहास खड्ग प्रदान किया। यह दर्शाता है कि सच्ची भक्ति के लिए शिव का प्रेम अहंकार के कृत्यों से भी ऊपर है।
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जटाटवी गलज्जल प्रवाह पावितस्थले गलेवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् । डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥
Jatatavi galajjala pravaha pavitasthale Galevalambya lambitam bhujangatungamalikam Damaddamaddamaddamanninadavaddamarvayam Chakara chandatandavam tanotu nah shivah shivam
अर्थ:जिनकी जटारूपी अटवी से बहती गंगा की धारा ने स्थल को पवित्र किया है, गले में सर्पों की ऊँची माला लटकाए, 'डमड्-डमड्-डमड्' डमरू बजाते हुए जिन्होंने प्रचण्ड ताण्डव किया — वे शिव हमारा कल्याण करें।
जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि । धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाट पट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥
Jatakatahasambhramabhramannilimpanirjhari Vilolavichivallari virajamanamurdhani Dhagaddhagaddhagajjvalallalata pattapavake Kishorachandrashekhare ratih pratikshanam mama
अर्थ:जिनके मस्तक पर जटाओं में गंगा वेग से घूमती है, जिनके ललाट पर 'धगद्-धगद्' अग्नि जलती है, और जो किशोर चन्द्र को शेखर रूप में धारण किए हैं — उन शिव में मेरा अनुराग प्रतिक्षण बना रहे।
धराधरेन्द्र नन्दिनी विलासबन्धु बन्धुर स्फुरद्दिगन्त सन्तति प्रमोद मानमानसे । कृपाकटाक्षधोरणी निरुद्ध दुर्धरापदि क्वचिद्दिगम्बरे मनोविनोदमेतु वस्तुनि ॥
Dharadharendra nandini vilasabandhu bandhura Sphuraddiganta santati pramoda manamanase Kripakatakshadhorani niruddha durdharapadi Kvachiddigambare manovinodametu vastuni
अर्थ:पर्वतराजपुत्री (पार्वती) के विलास के बन्धु, समस्त दिशाओं को आनन्दित करने वाले मन वाले, जिनकी कृपाकटाक्ष-धारा दुर्धर आपदाओं को रोक देती है — उन दिगम्बर शिव में मेरा मन विनोद पाए।
जटाभुजङ्ग पिङ्गल स्फुरत्फणा मणिप्रभा कदम्ब कुङ्कुम द्रव प्रलिप्त दिग्वधूमुखे । मदान्ध सिन्धुर स्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥
Jatabhujanga pingala sphuratphana maniprabha Kadamba kunkuma drava pralipta digvadhumukhe Madandha sindhura sphurattvaguttariyamedure Mano vinodamadbhutam bibhartu bhutabhartari
अर्थ:जटाओं के सर्पों की पिंगल फणमणियों की प्रभा जिनके चारों ओर कदम्ब-कुंकुम-सी छा रही है, मदमत्त गजचर्म का उत्तरीय धारण किए — उन भूतभर्ता शिव में मेरा मन अद्भुत विनोद धारण करे।
सहस्रलोचन प्रभृत्यशेषलेख शेखर प्रसूनधूलि धोरणी विधूसराङ्घ्रि पीठभूः । भुजङ्गराजमालया निबद्ध जाटजूटकः श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धु शेखरः ॥
Sahasralochana prabhrityasheshalekha shekhara Prasunadhuli dhorani vidhusaranghri pithabhuh Bhujangarajamalaya nibaddha jatajutakah Shriyai chiraya jayatam chakorabandhu shekharah
अर्थ:इन्द्र आदि समस्त देवों के नमन से उनके मुकुटपुष्पों की धूलि से जिनका चरणपीठ धूसरित है, सर्पराज की माला से जिनकी जटा बँधी है, चन्द्रशेखर — वे शिव हमें चिर श्री (सम्पदा) दें।
ललाट चत्वरज्वलद्धनञ्जय स्फुलिङ्गभा निपीत पञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् । सुधामयूखलेखया विराजमान शेखरं महाकपालि सम्पदे शिरोजटालमस्तु नः ॥
Lalata chatvarajvaladdhananjaya sphulingabha Nipita panchasayakam namannilimpanayakam Sudhamayukhalekhaya virajamana shekharam Mahakapali sampade shirojatalamastu nah
अर्थ:ललाट की अग्नि से कामदेव (पंचसायक) को पी जाने वाले, जिन्हें देवनायक नमन करते हैं, अमृतमय चन्द्रकला से सुशोभित मुकुट वाले — उन महाकपाली की जटा हमें सम्पदा दे।
कराल फालपट्टिका धगद्धगद्धगज्ज्वल द्धनञ्जयाहुतीकृत प्रचण्ड पञ्चसायके । धराधरेन्द्र नन्दिनी कुचाग्र चित्रपत्रक प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥
Karala phalapattika dhagaddhagaddhagajjvala Ddhananjayahutikrita prachanda panchasayake Dharadharendra nandini kuchagra chitrapatraka Prakalpanaikashilpini trilochane ratirmama
अर्थ:जिनके कराल ललाट की 'धगद्-धगद्' जलती अग्नि में प्रचण्ड पंचसायक (काम) की आहुति दी गई, जो पार्वती के वक्ष पर चित्र रचने वाले एकमात्र शिल्पी हैं — उन त्रिलोचन में मेरा अनुराग हो।
नवीनमेघमण्डली निरुद्ध दुर्धर स्फुरत् कुहू निशीथिनी तमः प्रबन्ध बद्ध कन्धरः । निलिम्प निर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः कलानिधान बन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः ॥
Navinameghamandali niruddha durdhara sphurat Kuhu nishithini tamah prabandha baddha kandharah Nilimpa nirjharidharastanotu krittisindhurah Kalanidhana bandhurah shriyam jagaddhurandharah
अर्थ:नवीन मेघमण्डली-सी, अमावस्या की रात्रि के तम-समान श्याम कण्ठ वाले, गंगा और गजचर्म धारण किए, चन्द्र के आश्रय, जगत् का भार वहन करने वाले — वे शिव हमें श्री प्रदान करें।
प्रफुल्ल नील पङ्कज प्रपञ्च कालिमप्रभा वलम्बि कण्ठ कन्दली रुचि प्रबद्ध कन्धरम् । स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥
Praphulla nila pankaja prapancha kalimaprabha Valambi kantha kandali ruchi prabaddha kandharam Smarachchhidam purachchhidam bhavachchhidam makhachchhidam Gajachchhidandhakachchhidam tamantakachchhidam bhaje
अर्थ:खिले नील कमल की श्यामप्रभा-सा सुशोभित कण्ठ वाले; काम, त्रिपुर, संसार, दक्षयज्ञ, गज और अन्धकासुर का तथा यम (मृत्यु) तक का नाश करने वाले — उन शिव का मैं भजन करता हूँ।
अखर्व सर्वमङ्गला कलाकदम्बमञ्जरी रसप्रवाह माधुरी विजृम्भणा मधुव्रतम् । स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥
Akharva sarvamangala kalakadambamanjari Rasapravaha madhuri vijrimbhana madhuvratam Smarantakam purantakam bhavantakam makhantakam Gajantakandhakantakam tamantakantakam bhaje
अर्थ:समस्त मंगलमयी कलाओं की कदम्बमंजरी के मधुर रसप्रवाह का पान करने वाले भ्रमर; काम, त्रिपुर, भव, यज्ञ, गज और अन्धक का तथा यम का अन्त करने वाले — उन शिव का मैं भजन करता हूँ।
जयत्वदभ्र विभ्रम भ्रमद्भुजङ्गमश्वस द्विनिर्गमत् क्रमस्फुरत् कराल फालहव्यवाट् । धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन् मृदङ्ग तुङ्ग मङ्गल ध्वनिक्रम प्रवर्तित प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥
Jayatvadabhra vibhrama bhramadbhujangamashvasa Dvinirgamat kramasphurat karala phalahavyavat Dhimiddhimiddhimidhvanan mridanga tunga mangala Dhvanikrama pravartita prachanda tandavah shivah
अर्थ:लहराते सर्पों की फुफकार और कराल ललाटाग्नि के बीच, 'धिमिद्-धिमिद्' मृदंग की मंगलध्वनि पर प्रचण्ड ताण्डव करते हुए शिव विजयी हों।
दृषद्विचित्र तल्पयोर्भुजङ्ग मौक्तिक स्रजो र्गरिष्ठ रत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्ष पक्षयोः । तृणारविन्द चक्षुषोः प्रजामही महेन्द्रयोः समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम् ॥
Drishadvichitra talpayorbhujanga mauktika srajo Rgarishtha ratnaloshthayoh suhridvipaksha pakshayoh Trinaravinda chakshushoh prajamahi mahendrayoh Samapravrittikah kada sadashivam bhajamyaham
अर्थ:पत्थर और रत्नशय्या, सर्प और मोतीमाला, कंकड़ और बहुमूल्य रत्न, मित्र और शत्रु, तृण और कमलनयना सुन्दरी, प्रजा और महान सम्राट — इन सबमें समान दृष्टि रखते हुए मैं सदाशिव का भजन कब करूँगा?
कदा निलिम्पनिर्झरी निकुञ्जकोटरे वसन् विमुक्त दुर्मतिः सदा शिरस्थमञ्जलिं वहन् । विलोल लोललोचनो ललामफाललग्नकः शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ॥
Kada nilimpanirjhari nikunjakotare vasan Vimukta durmatih sada shirasthamanjalim vahan Vilola lolalochano lalamaphalalagnakah Shiveti mantramuchcharan kada sukhi bhavamyaham
अर्थ:गंगा के कुंजों की कन्दरा में निवास करते हुए, दुर्बुद्धि से मुक्त, सिर पर सदा अंजलि धारण किए, चंचल नेत्रों को पवित्र कर, 'शिव' मन्त्र का उच्चारण करते हुए मैं कब सुखी होऊँगा?
इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं पठन् स्मरन् ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति सन्ततम् । हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम् ॥
Imam hi nityamevamuktamuttamottamam stavam Pathan smaran bruvannaro vishuddhimeti santatam Hare gurau subhaktimashu yati nanyatha gatim Vimohanam hi dehinam sushankarasya chintanam
अर्थ:इस उत्तमोत्तम स्तोत्र का जो नित्य पाठ, स्मरण अथवा उच्चारण करता है, वह निरन्तर शुद्ध होता है और शीघ्र ही हर तथा गुरु में सुदृढ़ भक्ति पाता है — इसके बिना अन्य कोई गति नहीं; शंकर का चिन्तन देहधारियों के मोह का नाश करता है।
पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे । तस्य स्थिरां रथगजेन्द्र तुरङ्गयुक्तां लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥
Pujavasanasamaye dashavaktragitam Yah shambhupujanaparam pathati pradoshe Tasya sthiram rathagajendra turangayuktam Lakshmim sadaiva sumukhim pradadati shambhuh
अर्थ:जो प्रदोषकाल में, शम्भु की पूजा के अन्त में, दशमुख रावण द्वारा रचित इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे शम्भु रथ-गज-अश्व से युक्त स्थिर लक्ष्मी (सम्पदा) सदा प्रदान करते हैं।
॥ इति श्रीरावणकृतं शिवताण्डवस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
Iti shriravanakritam shivatandavastotram sampurnam
अर्थ:इस प्रकार दशमुख रावण द्वारा रचित श्रीशिवताण्डवस्तोत्र सम्पूर्ण हुआ।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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शिव तांडव स्तोत्रम् पाठ के लाभ
भगवान शिव की प्रचण्ड रक्षक ऊर्जा का आवाहन करता है।
नकारात्मकता, दृष्टि-दोष और अशुभ शक्तियों का नाश करता है।
अपार साहस, निर्भयता और आंतरिक बल प्रदान करता है।
आध्यात्मिक रूपांतरण और जागृति के लिए अत्यंत प्रभावशाली है।
भगवान शिव को गहराई से प्रसन्न करता है — कहा जाता है यह उनका प्रिय स्तोत्र है।
भक्ति से पढ़ने पर बाधाओं और शत्रुओं को दूर करता है।
शिव तांडव स्तोत्रम् जप विधि
यह भगवान शिव की स्तुति में स्वयं रावण द्वारा रचित प्रभावशाली स्तोत्र है। गहन एकाग्रता और श्रद्धा से पढ़ें। प्रदोष काल (संध्या-वेला) में पढ़ना सर्वोत्तम है। यदि संभव हो तो दीप जलाएँ और बिल्वपत्र अर्पित करें। संस्कृत की लय और शक्ति आवश्यक है — यथासंभव उसी छंद-गति को बनाए रखें।
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