Mantra.Tips
durgaaartinavratriambe

दुर्गा आरती — जय अम्बे गौरी

🕉️ hindu·📿 1× जप·🕐 नवरात्रि में हर संध्या। साथ ही मंगलवार, शुक्रवार और अष्टमी (चंद्र चक्र की 8वीं तिथि) को·🎵 ऑडियो सहित·📜 Hindu devotional folk tradition; references Devi Mahatmyam (Durga Saptashati)

अन्य नाम / खोज: jai ambe gauri · jai ambe gauri maiya jai shyama gauri · ambe gauri aarti

Share:

अर्थ

दुर्गा आरती ('जय अम्बे गौरी') माँ दुर्गा को समर्पित सबसे लोकप्रिय आरती है, जो नवरात्रि से अभिन्न रूप से जुड़ी है। यह देवी महात्म्य के प्रसंगों — महिषासुर, शुम्भ-निशुम्भ और रक्तबीज के वध — का स्मरण करते हुए दुर्गा को विश्व की करुणामयी माता और दुष्टों की संहारिणी रूप में वर्णित करती है। इसे श्रद्धा से गाने वाला सुख-समृद्धि पाता है।

उत्पत्ति और कथा

Hindu devotional folk tradition; references Devi Mahatmyam (Durga Saptashati) · Attributed to Swami Shivananda (folk tradition) · Medieval period

दुर्गा आरती 'जय अम्बे गौरी' माँ दुर्गा को समर्पित सबसे लोकप्रिय आरती है और नवरात्रि के उत्सव से अभिन्न है। यह अपनी विषयवस्तु देवी महात्म्य (मार्कण्डेय पुराण) से लेती है, उन महान युद्धों का स्मरण करते हुए जिनमें दुर्गा ने महिषासुर, शुम्भ-निशुम्भ, रक्तबीज जैसे प्रबल राक्षसों का संहार किया। आरती दुर्गा को उनके पूर्ण वैभव में प्रस्तुत करती है — स्वर्णकाय, रक्ताम्बरधारिणी, सिंहवाहिनी, खड्गधारिणी, फिर भी विश्व की करुणामयी माता जो भक्तों के दुख हरती हैं। अंतिम पद में स्वामी शिवानन्द को इसका श्रेय इसे संत-प्रामाणिकता का भाव देता है।

शास्त्रों में वर्णित

दुर्गा आरती स्वयं नवरात्रि के चमत्कार से गहराई से जुड़ी है। परंपरा के अनुसार, नवरात्रि की नौ रातों में देवी दुर्गा की शक्ति पृथ्वी पर विशेष रूप से सुलभ होती है। असंख्य भक्त बताते हैं कि जागरण के समय 'जय अम्बे गौरी' गाने से एक स्पष्ट आध्यात्मिक ऊर्जा उत्पन्न होती है — दीये की लौ असामान्य तीव्रता से काँपती है, कुछ भक्त स्वतः भाव-समाधि में चले जाते हैं, और वातावरण एक अमिट दिव्य उपस्थिति से भर जाता है। भारत भर के मंदिर बताते हैं कि नवरात्रि में दुर्गा मूर्ति पर चढ़ाए गए पुष्प अन्य किसी समय की अपेक्षा कहीं अधिक देर तक ताजे रहते हैं, मानो देवी स्वयं उपस्थित होकर इस आरती के साथ चढ़ाए गए अर्घ्य को स्वीकार कर रही हों।

सुनें और साथ में जपें

सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित

किसी भी पंक्ति या ▶ बटन पर टैप कर सुनें

श्लोक 1

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी। तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥ जय अम्बे गौरी॥

Jai Ambe Gauri, Maiya Jai Shyama Gauri Tumko Nishdin Dhyavat, Hari Brahma Shivri Jai Ambe Gauri

अर्थ:माँ अम्बे गौरी की जय! प्यारी माँ, श्यामा गौरी की जय! हरि, ब्रह्मा और शिव दिन-रात तुम्हारा ध्यान करते हैं। माँ अम्बे गौरी की जय!

श्लोक 2

मांग सिन्दूर विराजत, टीको मृगमद को। उज्ज्वल से दो नैना, चन्द्रवदन नीको॥ जय अम्बे गौरी॥

Mang Sindoor Virajat, Teeko Mrigmad Ko Ujjwal Se Do Naina, Chandravadan Neeko Jai Ambe Gauri

अर्थ:तुम्हारी माँग में सिन्दूर शोभित है और माथे पर कस्तूरी का तिलक सुशोभित है। तुम्हारे दोनों नेत्र उज्ज्वल चमकते हैं और चन्द्रमा-सा मुख अति सुन्दर है। माँ अम्बे गौरी की जय!

श्लोक 3

कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजे। रक्तपुष्प गल माला, कण्ठन पर साजे॥ जय अम्बे गौरी॥

Kanak Saman Kalevar, Raktambar Raje Raktpushp Gal Mala, Kanthan Par Saje Jai Ambe Gauri

अर्थ:तुम्हारा शरीर शुद्ध स्वर्ण-सा कान्तिमान है और तुम रक्त-वस्त्र धारण किए हो। लाल पुष्पों की माला तुम्हारे कण्ठ को सुन्दरता से सुशोभित करती है। माँ अम्बे गौरी की जय!

श्लोक 4

केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी। सुर नर मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी॥ जय अम्बे गौरी॥

Kehari Vahan Rajat, Khadg Khappar Dhari Sur Nar Munijan Sevat, Tinke Dukh Hari Jai Ambe Gauri

अर्थ:तुम सिंह पर वैभव से विराजमान हो, हाथ में खड्ग और खप्पर धारण किए। देव, मनुष्य और मुनिजन तुम्हारी सेवा करते हैं — तुम उनके दुःखों को हरने वाली हो। माँ अम्बे गौरी की जय!

श्लोक 5

कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती। कोटिक चन्द्र दिवाकर, सम राजत ज्योती॥ जय अम्बे गौरी॥

Kanan Kundal Shobhit, Nasagre Moti Kotik Chandra Divakar, Sam Rajat Jyoti Jai Ambe Gauri

अर्थ:तुम्हारे कानों में कुण्डल सुन्दरता से शोभित हैं और नासिका के अग्रभाग पर मोती सुशोभित है। तुम्हारी आभा करोड़ों चन्द्र और सूर्य के समान चमकती है। माँ अम्बे गौरी की जय!

श्लोक 6

शुम्भ निशुम्भ विदारे, महिषासुर घाती। धूम्रविलोचन नैना, निशदिन मदमाती॥ जय अम्बे गौरी॥

Shumbh Nishumbh Vidare, Mahishasur Ghati Dhumravilochan Naina, Nishdin Madmati Jai Ambe Gauri

अर्थ:तुमने शुम्भ और निशुम्भ का संहार किया और महिषासुर का वध किया। अपने धूम्र-नेत्रों की दृष्टि से तुम सदा दिव्य शक्ति में मदमाती रहती हो। माँ अम्बे गौरी की जय!

श्लोक 7

चण्ड मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे। मधु कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥ जय अम्बे गौरी॥

Chand Mund Sanhare, Shonit Bij Hare Madhu Kaitabh Dou Mare, Sur Bhayahin Kare Jai Ambe Gauri

अर्थ:तुमने चण्ड और मुण्ड का संहार किया और रक्तबीज दैत्य का नाश किया। तुमने मधु और कैटभ दोनों का वध कर देवों को भयरहित किया। माँ अम्बे गौरी की जय!

श्लोक 8

ब्रह्माणी रुद्राणी, तुम कमला रानी। आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी॥ जय अम्बे गौरी॥

Brahmani Rudrani, Tum Kamla Rani Agam Nigam Bakhani, Tum Shiv Patrani Jai Ambe Gauri

अर्थ:तुम ब्रह्माणी, रुद्राणी और कमला (लक्ष्मी) हो, हे रानी! आगम और निगम तुम्हारी स्तुति गाते हैं — तुम शिव की परम पटरानी हो। माँ अम्बे गौरी की जय!

श्लोक 9

चौँसठ योगिनी गावत, नृत्य करत भैरों। बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरू॥ जय अम्बे गौरी॥

Chaunsath Yogini Gavat, Nritya Karat Bhairon Bajat Taal Mridanga, Aru Bajat Damru Jai Ambe Gauri

अर्थ:चौंसठ योगिनियाँ तुम्हारा यश गाती हैं और भैरव आनन्द में नृत्य करते हैं। मृदंग पर ताल बजता है और शिव का डमरू बजता है। माँ अम्बे गौरी की जय!

श्लोक 10

तुम ही जग की माता, तुम ही हो भर्ता। भक्तन की दुख हर्ता, सुख सम्पत्ति कर्ता॥ जय अम्बे गौरी॥

Tum Hi Jag Ki Mata, Tum Hi Ho Bharta Bhaktan Ki Dukh Harta, Sukh Sampatti Karta Jai Ambe Gauri

अर्थ:तुम ही जगत की माता हो, तुम ही इसकी पालनकर्ता हो। तुम भक्तों के दुःख हरती हो और सुख-सम्पत्ति प्रदान करती हो। माँ अम्बे गौरी की जय!

श्लोक 11

भुजा चार अति शोभित, वर मुद्रा धारी। मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी॥ जय अम्बे गौरी॥

Bhuja Char Ati Shobhit, Var Mudra Dhari Manvanchhit Phal Pavat, Sevat Nar Nari Jai Ambe Gauri

अर्थ:तुम्हारी चार भुजाएँ महान तेज से शोभित हैं, वरमुद्रा धारण किए। जो नर-नारी तुम्हारी सेवा करते हैं वे मनोवांछित फल प्राप्त करते हैं। माँ अम्बे गौरी की जय!

श्लोक 12

कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती। मालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योती॥ जय अम्बे गौरी॥

Kanchan Thal Virajat, Agar Kapur Bati Malketu Mein Rajat, Koti Ratan Jyoti Jai Ambe Gauri

अर्थ:स्वर्ण-थाल में अगर और कपूर की बातियाँ जल रही हैं। उस महान ज्योति में करोड़ों रत्नों की आभा चमकती है। माँ अम्बे गौरी की जय!

श्लोक 13

श्री अम्बेजी की आरती, जो कोई नर गावे। कहत शिवानन्द स्वामी, सुख सम्पत्ति पावे॥ जय अम्बे गौरी॥

Shri Ambeji Ki Aarti, Jo Koi Nar Gave Kahat Shivanand Swami, Sukh Sampatti Pave Jai Ambe Gauri

अर्थ:जो कोई श्री अम्बे की यह आरती गाता है — स्वामी शिवानन्द कहते हैं — वह सुख और सम्पत्ति प्राप्त करता है। माँ अम्बे गौरी की जय!

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

अम्बे🔊Ambeमाता (दुर्गा का एक नाम)
गौरी🔊Gauriगौरवर्णा, पार्वती/दुर्गा
श्यामा🔊Shyamaश्यामवर्णा (काली रूप)
सिन्दूर🔊Sindoorमाँग में सिन्दूर
मृगमद🔊Mrigmadकस्तूरी (मृग-कस्तूरी का तिलक)
चन्द्रवदन🔊Chandravadanचन्द्रमा-सा मुख
कनक🔊Kanakस्वर्ण
रक्ताम्बर🔊Raktambarरक्त-वस्त्र
केहरि वाहन🔊Kehari Vahanसिंह वाहन (दुर्गा का वाहन)
खड्ग🔊Khadgखड्ग (तलवार)
खप्पर🔊Khapparखप्पर (कपाल-पात्र)
शुम्भ निशुम्भ🔊Shumbh Nishumbhदुर्गा द्वारा वध किए गए दो दैत्य-भाई
महिषासुर🔊Mahishasurदुर्गा द्वारा वध किया गया महिषासुर
धूम्रविलोचन🔊Dhumravilochanदुर्गा द्वारा वध किया गया धूम्र-नेत्र दैत्य
चण्ड मुण्ड🔊Chand Mundचामुण्डा द्वारा वध किए गए दो दैत्य-सेनापति
शोणित बीज🔊Shonit Bijरक्तबीज — जिसके रक्त से प्रतिरूप उत्पन्न होते थे
मधु कैटभ🔊Madhu Kaitabhविष्णु/देवी द्वारा वध किए गए दो आदि-दैत्य
ब्रह्माणी🔊Brahmaniब्रह्मा की शक्ति
रुद्राणी🔊Rudraniरुद्र (शिव) की शक्ति
चौँसठ योगिनी🔊Chaunsath Yoginiचौंसठ योगिनियाँ (दिव्य परिचारिकाएँ)
भैरों🔊Bhaironभैरव, शिव का उग्र रूप
मृदंगा🔊Mridangaदो मुख वाला मृदंग
डमरू🔊Damruशिव का डमरू

दुर्गा आरती — जय अम्बे गौरी पाठ के लाभ

देवी दुर्गा की प्रचंड रक्षक शक्ति का आह्वान करती है।

घर से भय, नकारात्मकता और दुष्ट प्रभावों का नाश करती है।

भक्त में साहस, बल और आत्मविश्वास भरती है।

नवरात्रि की अनिवार्य आरती — नौ रातों तक हर रात गाई जाती है।

दुखों को हरती है और सुख-समृद्धि प्रदान करती है।

श्रद्धा से पूजा करने वाले नर-नारी की मनोकामनाएँ पूर्ण करती है।

शक्ति ऊर्जा से ओतप्रोत एक प्रबल पावन वातावरण रचती है।

दुर्गा आरती — जय अम्बे गौरी जप विधि

जप संख्या1बार
उत्तम समयनवरात्रि में हर संध्या। साथ ही मंगलवार, शुक्रवार और अष्टमी (चंद्र चक्र की 8वीं तिथि) को

थाली में घी या कपूर का दीया जलाएं। दुर्गा के चित्र या मूर्ति के सामने खड़े हों, अधिमानतः वह जो उन्हें सिंह पर सवार दर्शाती हो। आरती गाते हुए थाली को देवी के सामने घड़ी की दिशा में गोलाकार घुमाएं। घंटी बजाएं या ताल में ताली बजाएं। नवरात्रि में यह आरती हर संध्या की पूजा का चरम क्षण होती है। लाल पुष्प, लाल वस्त्र और नारियल दुर्गा को अर्पित किए जाने वाले पारंपरिक चढ़ावे हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा आरती 'जय अम्बे गौरी' नवरात्रि की नौ रातों में हर संध्या को गाई जाती है। यह उत्सव की केंद्रीय आरती है और संध्या पूजा व जागरण (रात्रि-जागरण) के बाद की जाती है। यह दुर्गा पूजा के समय और दुर्गा मंदिरों में वर्ष भर भी गाई जाती है।
अंतिम पद इस आरती का श्रेय स्वामी शिवानन्द को देता है, यद्यपि ठीक-ठीक ऐतिहासिक पहचान विवादित है। इसे व्यापक रूप से एक लोक भक्ति-रचना माना जाता है जो उत्तर भारत में सदियों से गाई जाती रही है।
आरती पाँच राक्षस-युद्धों का उल्लेख करती है: शुम्भ और निशुम्भ (दो राक्षस भाई), महिषासुर (भैंसा राक्षस), धूम्रविलोचन (धुएँ-सी आँखों वाला राक्षस), चण्ड और मुण्ड (दो सेनापति), रक्तबीज (रक्त-बीज राक्षस), और मधु-कैटभ (आदि राक्षस)। ये सब देवी महात्म्य से हैं।
सिंह (केहरि/सिंह) दुर्गा का वाहन है, जो शक्ति, साहस और सार्वभौमता का प्रतीक है। सिंह पर सवार दुर्गा बुरी शक्तियों पर दिव्य शक्ति की विजय का प्रतिनिधित्व करती हैं। 'केहरि वाहन राजत' पद इसी भव्य रूप का गुणगान करता है।
बिलकुल। आरती कहती है 'सेवत नर नारी' — दुर्गा की सेवा करने वाले नर और नारी दोनों की मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। दुर्गा की पूजा लिंग के भेद बिना सबके लिए है।

ये भी पढ़ें

उपयोगी लगा? अपनों के साथ साझा करें 🙏

Share:

Explore more sacred mantras with complete meaning and chanting guides