लक्ष्मी चालीसा
अन्य नाम / खोज: matu lakshmi kari kripa karo hridaya mem vasa · lakshmi chalisa lyrics
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✦ अर्थ
लक्ष्मी चालीसा धन, वैभव और सौभाग्य की देवी माँ महालक्ष्मी की चालीस छंदों वाली हिंदी स्तुति है। इसमें क्षीरसागर मंथन से उनके प्रकट होने तथा भक्तों पर कृपा का स्मरण है। नित्य पाठ से धन, समृद्धि, संतान-सुख और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।
उत्पत्ति और कथा
Traditional Hindi devotional hymn · Traditional (signed 'Ramdas') · Devotional era
लक्ष्मी चालीसा महालक्ष्मी—धन और सौभाग्य की देवी—की चालीस छंदों वाली हिंदी स्तुति है, जो क्षीरसागर मंथन से विष्णु की प्रिया रूप में प्रकट हुईं। यह स्मरण कराती है कि वे युग-युग में प्रत्येक अवतार में भगवान के साथ रहती हैं—राम के साथ सीता रूप में—और श्रद्धालु, संतुष्ट हृदय से उपासना करने वाले सभी को प्रचुरता, आरोग्य और आनंद का वचन देती है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
चालीसा स्वयं यह वचन अंकित करती है कि संतानहीन, निर्धन, यहाँ तक कि अंधे, बधिर और रोगी भी, जो इसे श्रद्धापूर्वक चालीस दिन तक पाठ कराते हैं, उनका कष्ट दूर होता है और समृद्धि लौट आती है। भारत भर के असंख्य घरानों में पीढ़ियों से शुक्रवार और दीपावली का दीप जलाकर ये छंद पढ़े जाते हैं, इस प्राचीन आश्वासन पर विश्वास करते हुए—लक्ष्मी की उपासना करो, अभाव कभी न आएगा।
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मातु लक्ष्मी करि कृपा, करो हृदय में वास। मनोकामना सिद्ध करि, परुवहु मेरी आस॥
Matu lakshmi kari kripa, karo hridaya mem vasa Manokamana siddha kari, paruvahu meri asa
अर्थ:हे माता लक्ष्मी, कृपा करो और मेरे हृदय में निवास करो; मेरे मन की इच्छाएँ पूर्ण करो और मेरी हर आशा पूरी करो।
यही मोर अरदास, हाथ जोड़ विनती करों। सब विधि करहु सुवास, जय जननि जगदंबिका॥
Yahi mora aradasa, hatha joड़ vinati karom Saba vidhi karahu suvasa, jaya janani jagadambika
अर्थ:हाथ जोड़कर यही एक प्रार्थना है: हर प्रकार से मंगल करो, हे जगत की विजयिनी माता, जगदम्बिका।
सिंधु सुता विष्णुप्रिये नत शिर बारंबार । ऋद्धि सिद्धि मंगलप्रदे नत शिर बारंबार ॥
Simdhu suta vishnupriye nata shira barambara Riddhi siddhi mamgalaprade nata shira barambara
अर्थ:हे सिंधु-सुता, विष्णुप्रिया, बार-बार मैं शीश झुकाता हूँ; हे ऋद्धि, सिद्धि और हर वरदान देने वाली, बार-बार नमन।
सिन्धु सुता मैं सुमिरौं तोही । ज्ञान बुद्धि विद्या दो मोहि ॥
Sindhu suta maim sumiraum tohi Jnana buddhi vidya do mohi
अर्थ:हे सिंधु-सुता, मैं तुम्हें स्मरण करता हूँ; मुझे ज्ञान, बुद्धि और विद्या प्रदान करो।
तुम समान नहिं कोई उपकारी । सब विधि पुरबहु आस हमारी ॥
Tuma samana nahim koi upakari Saba vidhi purabahu asa hamari
अर्थ:तुम्हारे समान कोई हितकारी नहीं; हर प्रकार से हमारी आशाएँ पूर्ण करो।
जै जै जगत जननि जगदम्बा । सबके तुमही हो स्वलम्बा ॥
Jai jai jagata janani jagadamba Sabake tumahi ho svalamba
अर्थ:जय हो, जय हो, हे जगत की माता जगदम्बा; तुम सबका आधार हो।
तुम ही हो घट घट के वासी । विनती यही हमारी खासी ॥
Tuma hi ho ghata ghata ke vasi Vinati yahi hamari khasi
अर्थ:तुम हर एक हृदय में निवास करती हो; यह हमारी हार्दिक प्रार्थना है।
जग जननी जय सिन्धु कुमारी । दीनन की तुम हो हितकारी ॥
Jaga janani jaya sindhu kumari Dinana ki tuma ho hitakari
अर्थ:हे जगत की माता, जय हो, हे सिंधु-सुता; तुम दीन-हीन की हितकारिणी हो।
विनवौं नित्य तुमहिं महारानी । कृपा करौ जग जननि भवानी ॥
Vinavaum nitya tumahim maharani Kripa karau jaga janani bhavani
अर्थ:मैं प्रतिदिन तुमसे प्रार्थना करता हूँ, हे महारानी; कृपा करो, हे जगत की माता भवानी।
केहि विधि स्तुति करौं तिहारी । सुधि लीजै अपराध बिसारी ॥
Kehi vidhi stuti karaum tihari Sudhi lijai aparadha bisari
अर्थ:मैं किस प्रकार तुम्हारी स्तुति करूँ? मेरी सुध लो और मेरे दोषों को क्षमा करो।
कृपा दृष्टि चितवो मम ओरी । जगत जननि विनती सुन मोरी ॥
Kripa drishti chitavo mama ori Jagata janani vinati suna mori
अर्थ:मुझ पर अपनी कृपादृष्टि डालो; हे जगत की माता, मेरी प्रार्थना सुनो।
ज्ञान बुद्धि जय सुख की दाता । संकट हरो हमारी माता ॥
Jnana buddhi jaya sukha ki data Samkata haro hamari mata
अर्थ:हे ज्ञान, बुद्धि, विजय और आनंद देने वाली; हमारी पीड़ा हरो, हे माता।
क्षीर सिंधु जब विष्णु मथायो । चौदह रत्न सिंधु में पायो ॥
Kshira simdhu jaba vishnu mathayo Chaudaha ratna simdhu mem payo
अर्थ:जब विष्णु ने क्षीरसागर का मंथन किया, तब समुद्र में चौदह रत्न मिले।
चौदह रत्न में तुम सुखरासी । सेवा कियो प्रभुहिं बनि दासी ॥
Chaudaha ratna mem tuma sukharasi Seva kiyo prabhuhim bani dasi
अर्थ:चौदह रत्नों में तुम आनंद का सच्चा खजाना थीं; तुमने प्रभु की सेवा की और उनकी पत्नी बनीं।
जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा । रूप बदल तहं सेवा कीन्हा ॥
Jaba jaba janma jaham prabhu linha Rupa badala taham seva kinha
अर्थ:जहाँ-जहाँ और जब-जब प्रभु ने जन्म लिया, रूप बदलकर तुमने वहाँ उनकी सेवा की।
स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा । लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा ॥
Svayam vishnu jaba nara tanu dhara Linheu avadhapuri avatara
अर्थ:जब विष्णु ने स्वयं मनुष्य देह धारण की, तो अवधपुरी में (राम रूप में) अवतार लिया।
तब तुम प्रकट जनकपुर माहीं । सेवा कियो हृदय पुलकाहीं ॥
Taba tuma prakata janakapura mahim Seva kiyo hridaya pulakahim
अर्थ:तब तुम जनकपुर में (सीता रूप में) प्रकट हुईं और आनंदपूर्ण हृदय से उनकी सेवा की।
अपनायो तोहि अन्तर्यामी । विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी ॥
Apanayo tohi antaryami Vishva vidita tribhuvana ki svami
अर्थ:अंतर्यामी ने तुम्हें अपनाया; तुम तीनों लोकों की स्वामिनी के रूप में जगत में विख्यात हो।
तुम सब प्रबल शक्ति नहिं आनी । कहँ तक महिमा कहौं बखानी ॥
Tuma saba prabala shakti nahim ani Kahan taka mahima kahaum bakhani
अर्थ:तुम्हारी महाशक्ति की कोई बराबरी नहीं कर सकता; मैं तुम्हारी महिमा कहाँ तक कहूँ और वर्णन करूँ?
मन क्रम वचन करै सेवकाई । मन-इच्छित वांछित फल पाई ॥
Mana krama vachana karai sevakai Mana-ichchhita vamchhita phala pai
अर्थ:जो मन, वचन और कर्म से तुम्हारी सेवा करता है, वह मनवांछित और इच्छित फल पाता है।
तजि छल कपट और चतुराई । पूजहिं विविध भाँति मन लाई ॥
Taji chhala kapata aura chaturai Pujahim vividha bhanti mana lai
अर्थ:छल, कपट और चालाकी त्यागकर, वे भक्तिमय हृदय से अनेक प्रकार से तुम्हारी पूजा करते हैं।
और हाल मैं कहौं बुझाई । जो यह पाठ करे मन लाई ॥
Aura hala maim kahaum bujhai Jo yaha patha kare mana lai
अर्थ:और मैं तुम्हें एक और सत्य कहता हूँ: जो भक्तिमय मन से इसका पाठ करता है —
ताको कोई कष्ट न होई । मन इच्छित फल पावै फल सोई ॥
Tako koi kashta na hoi Mana ichchhita phala pavai phala soi
अर्थ:— उस पर कोई दुख नहीं आता; वह वही फल पाता है जिसकी उसका हृदय कामना करता है।
त्राहि-त्राहि जय दुःख निवारिणी । त्रिविध ताप भव बंधन हारिणि ॥
Trahi-trahi jaya duhkha nivarini Trividha tapa bhava bamdhana harini
अर्थ:'रक्षा करो, रक्षा करो!' — जय हो, हे दुखहर्ता, त्रिविध तापों और भवबंधन की नाशिनी।
जो यह चालीसा पढ़े और पढ़ावे । इसे ध्यान लगाकर सुने सुनावै ॥
Jo yaha chalisa padha़e aura padha़ave Ise dhyana lagakara sune sunavai
अर्थ:जो इस चालीसा को पढ़ता है और पढ़वाता है, और ध्यानपूर्वक सुनता और पढ़ता है —
ताको कोई न रोग सतावै । पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै ॥
Tako koi na roga satavai Putra adi dhana sampatti pavai
अर्थ:— उसे कोई रोग नहीं सताता; उसे संतान, धन और समृद्धि प्राप्त होती है।
पुत्र हीन और सम्पत्ति हीना । अन्धा बधिर कोढ़ी अति दीना ॥
Putra hina aura sampatti hina Andha badhira kodha़i ati dina
अर्थ:जो पुत्रहीन और धनहीन है, अंधा, बहरा, कोढ़ी, अत्यंत दीन —
विप्र बोलाय कै पाठ करावै । शंका दिल में कभी न लावै ॥
Vipra bolaya kai patha karavai Shamka dila mem kabhi na lavai
अर्थ:— वह किसी ब्राह्मण को बुलाकर इसका पाठ करवाए, हृदय में कभी संदेह न रखे।
पाठ करावै दिन चालीसा । ता पर कृपा करैं गौरीसा ॥
Patha karavai dina chalisa Ta para kripa karaim gaurisa
अर्थ:चालीस दिन तक चालीसा का पाठ करवाओ, और गौरीश (शिव) तथा माता कृपा करेंगे।
सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै । कमी नहीं काहू की आवै ॥
Sukha sampatti bahuta si pavai Kami nahim kahu ki avai
अर्थ:उन्हें प्रचुर सुख और धन प्राप्त होता है; उन्हें कभी किसी वस्तु की कमी नहीं होती।
बारह मास करै जो पूजा । तेहि सम धन्य और नहिं दूजा ॥
Baraha masa karai jo puja Tehi sama dhanya aura nahim duja
अर्थ:जो बारह माह तक यह पूजा करता है — उससे बढ़कर कोई भाग्यशाली नहीं।
प्रतिदिन पाठ करै मन माहीं । उन सम कोई जग में नाहिं ॥
Pratidina patha karai mana mahim Una sama koi jaga mem nahim
अर्थ:जो प्रतिदिन हृदय में इसका पाठ करता है — जगत में उसके समान कोई नहीं।
बहु विधि क्या मैं करौं बड़ाई । लेय परीक्षा ध्यान लगाई ॥
Bahu vidhi kya maim karaum bada़ai Leya pariksha dhyana lagai
अर्थ:मैं कितने प्रकार से तुम्हारी स्तुति गाऊँ? ध्यान में मन लगाकर इसे परखो।
करि विश्वास करैं व्रत नेमा । होय सिद्ध उपजै उर प्रेमा ॥
Kari vishvasa karaim vrata nema Hoya siddha upajai ura prema
अर्थ:जो श्रद्धा और नियम से व्रत रखता है, वह सिद्धि पाता है, और हृदय में प्रेम उमड़ता है।
जय जय जय लक्ष्मी महारानी । सब में व्यापित जो गुण खानी ॥
Jaya jaya jaya lakshmi maharani Saba mem vyapita jo guna khani
अर्थ:जय हो, जय हो, जय हो, हे लक्ष्मी रानी, सर्वगुणों की खान जो सर्वत्र व्याप्त हैं।
तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं । तुम सम कोउ दयाल कहूँ नाहीं ॥
Tumharo teja prabala jaga mahim Tuma sama kou dayala kahun nahim
अर्थ:जगत में तुम्हारा तेज महान है; तुम्हारे समान कहीं कोई करुणामय नहीं।
मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै । संकट काटि भक्ति मोहि दीजे ॥
Mohi anatha ki sudhi aba lijai Samkata kati bhakti mohi dije
अर्थ:अब मुझ अनाथ की सुध लो; मेरी पीड़ा काटो और मुझे भक्ति प्रदान करो।
भूल चूक करी क्षमा हमारी । दर्शन दीजै दशा निहारी ॥
Bhula chuka kari kshama hamari Darshana dijai dasha nihari
अर्थ:मेरी भूल-चूक क्षमा करो; मेरी दशा देखकर मुझे अपने दर्शन दो।
बिन दरशन व्याकुल अधिकारी । तुमहिं अक्षत दुःख सहते भारी ॥
Bina darashana vyakula adhikari Tumahim akshata duhkha sahate bhari
अर्थ:तुम्हारे दर्शन बिना भक्त व्याकुल है; तुम्हारे अभाव में मैं घोर दुख सहता हूँ।
नहिं मोहिं ज्ञान बुद्धि है तन में । सब जानत हो अपने मन में ॥
Nahim mohim jnana buddhi hai tana mem Saba janata ho apane mana mem
अर्थ:मुझमें कोई ज्ञान या बुद्धि नहीं; तुम अपने मन में सब कुछ जानती हो।
रूप चतुर्भुज करके धारण । कष्ट मोर अब करहु निवारण ॥
Rupa chaturbhuja karake dharana Kashta mora aba karahu nivarana
अर्थ:अपना चतुर्भुज रूप धारण कर, अब मेरी हर पीड़ा हरो।
कहि प्रकार मैं करौं बड़ाई । ज्ञान बुद्धि मोहिं नहिं अधिकाई ॥
Kahi prakara maim karaum bada़ai Jnana buddhi mohim nahim adhikai
अर्थ:मैं किस प्रकार तुम्हारी महिमा गाऊँ? मुझमें न महान ज्ञान है, न बुद्धि।
रामदास अब कहै पुकारी । करो दूर तुम विपति हमारी ॥
Ramadasa aba kahai pukari Karo dura tuma vipati hamari
अर्थ:रामदास अब पुकारकर प्रार्थना करता है: हमारी हर विपत्ति दूर भगाओ, हे माता।
त्राहि त्राहि दुःख हारिणी हरो बेगि सब त्रास । जयति जयति जय लक्ष्मी करो शत्रुन का नाश ॥
Trahi trahi duhkha harini haro begi saba trasa Jayati jayati jaya lakshmi karo shatruna ka nasha
अर्थ:रक्षा करो, रक्षा करो, हे दुखहर्ता! हमारा सब भय शीघ्र दूर करो; जय हो, जय हो, हे लक्ष्मी, हमारे शत्रुओं का नाश करो।
रामदास धरि ध्यान नित विनय करत कर जोर । मातु लक्ष्मी दास पर करहु दया की कोर ॥
Ramadasa dhari dhyana nita vinaya karata kara jora Matu lakshmi dasa para karahu daya ki kora
अर्थ:रामदास सदा हाथ जोड़कर ध्यान और प्रार्थना करता है: हे माता लक्ष्मी, अपने सेवक पर थोड़ी-सी कृपा तो करो।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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लक्ष्मी चालीसा पाठ के लाभ
लक्ष्मी चालीसा के नित्य पाठ से देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है, जो धन, समृद्धि और वैभव देती है।
इसे दरिद्रता, ऋण और अभाव दूर करने तथा संतान, आरोग्य और चिरस्थायी सौभाग्य देने वाला माना जाता है।
शुक्रवार तथा दीपावली—जब लक्ष्मी की पूजा होती है—पर इसका विशेष प्रभाव होता है।
चालीसा वचन देती है कि जो चालीस दिन पाठ करे या बारह मास पूजा करे, उसे बिना किसी अभाव के प्रचुर धन प्राप्त होता है।
भौतिक समृद्धि के साथ-साथ कृतज्ञता, संतोष और भक्ति का भाव जगाती है।
यह सरल, प्रिय चालीस छंदों का भजन है जो पूरे परिवार के लिए तथा लक्ष्मी पूजा का केंद्र है।
लक्ष्मी चालीसा जप विधि
शुक्रवार या दीपावली को स्नान के पश्चात देवी लक्ष्मी की प्रतिमा के सम्मुख बैठें। घी का दीप जलाएँ, लाल पुष्प, कुमकुम, अक्षत और मिष्ठान्न अर्पित करें, और श्रद्धापूर्वक आरम्भिक दोहा एवं चालीस चौपाइयों का पाठ करें। ग्रंथ पूर्ण कृपा हेतु चालीस दिन, अथवा वर्ष भर पूजा की सलाह देता है। अंत में लक्ष्मी आरती करें।
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