Mantra.Tips

अग्ने नय सुपथा राये — Word-by-Word Meaning

अग्ने नय सुपथा राये

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

अग्ने
agne
हे अग्नि (दिव्य अग्नि, अन्तर्ज्योति एवं मार्गदर्शक)
नय
naya
ले चलें, मार्ग दिखाएँ, ले जाएँ (हमें)
सुपथा
supathā
श्रेष्ठ मार्ग से, उत्तम पथ से
राये
rāye
ऐश्वर्य / समृद्धि की ओर (यहाँ आध्यात्मिक पूर्णता का सच्चा धन)
अस्मान्
asmān
हमें
विश्वानि
viśvāni
समस्त, सब
देव
deva
हे देव, हे प्रकाशमय, हे ईश
वयुनानि
vayunāni
मार्ग, पथ, कर्म, ज्ञान / वस्तुओं के व्यवहार
विद्वान्
vidvān
जानने वाले, आप जो जानते हैं
युयोधि
yuyodhi
दूर करें, हटाएँ, अलग करें
अस्मत्
asmat
हमसे
जुहुराणम्
juhurāṇam
कुटिल, छली, भटकाने वाला
एनः
enaḥ
पाप, दोष, बुराई
भूयिष्ठाम्
bhūyiṣṭhām
सर्वाधिक प्रचुर, अनेक, पूर्णतम
ते
te
आपको, आपके प्रति
नमउक्तिम्
nama-uktim
नमस्कार-वचन, वन्दना की उक्ति
विधेम
vidhema
हम अर्पित करते हैं, हम प्रस्तुत करते हैं, हम करते हैं

Complete Translation

हे अग्निदेव, जो हमारे समस्त मार्गों और कर्मों को जानने वाले हैं, हमें श्रेष्ठ मार्ग से सच्चे ऐश्वर्य (पूर्णता और मोक्ष) की ओर ले चलें। हमसे उस कुटिल पाप को दूर करें जो भटकाता है। आपको हम अपनी सर्वाधिक प्रचुर नमस्कार-वाणी अर्पित करते हैं। हे तेजोमय प्रभु, हमें उत्तम पथ पर ले चलें, हर भ्रामक दोष से हमें शुद्ध करें, और हम बार-बार आपको प्रणाम करते हैं।

Origin & History

Source: Isha Upanishad 18 (Shukla Yajurveda); also Rigveda 1.189.1

Author: Vedic seers (the verse is also ascribed in the Rigveda to Rishi Agastya)

Period: Vedic period

यह श्लोक ईशावास्य उपनिषद् का समापन करता है, जो प्रमुख उपनिषदों में से एक है, और शुक्ल यजुर्वेद में स्थित है। सर्वव्यापी आत्मा का चिन्तन कर और सत्य के स्वर्णिम मुख के दर्शन की प्रार्थना कर चुकने के पश्चात्, साधक अग्नि — दिव्य अग्नि और अन्तर्-मार्गदर्शक — की ओर इस अन्तिम याचना के साथ मुड़ता है कि वह उसे श्रेष्ठ मार्ग से मोक्ष के सच्चे ऐश्वर्य की ओर ले चले और हर कुटिल पाप से मुक्त करे। यही श्लोक ऋग्वेद में भी प्राप्त होता है, जहाँ यह अग्नि के एक सूक्त का अंग है।

Frequently Asked Questions

'अग्ने नय सुपथा राये' का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है 'हे अग्नि, हमें श्रेष्ठ मार्ग से (सच्चे) ऐश्वर्य की ओर ले चलें।' साधक उस दिव्य अग्नि से, जो हमारे समस्त मार्गों और कर्मों को जानते हैं, याचना करता है कि वे उसे उत्तम पथ पर ले चलें, हर भ्रामक पाप को दूर करें, और बदले में प्रचुर नमस्कार अर्पित करने का दायित्व स्वीकार करता है।
यह मन्त्र कहाँ से आता है?
यह ईशावास्य उपनिषद् का अन्तिम श्लोक (१८) है, जो शुक्ल यजुर्वेद से सम्बन्धित है, और यह ऋग्वेद में भी प्राप्त होता है। यह उपनिषद् द्वारा परम आत्मा के प्रकाशन के पश्चात् समापन-प्रार्थना का रूप लेता है।
इस प्रार्थना में अग्नि कौन हैं?
यहाँ अग्नि भौतिक अग्नि से कहीं अधिक हैं — वे दिव्य ज्योति, अन्तर्-मार्गदर्शक और शोधक हैं जो 'हमारे समस्त मार्ग और कर्म' (विश्वानि वयुनानि) जानते हैं। साधक इस अन्तर्-अग्नि की ओर मुड़ता है ताकि सम्यक् रूप से चलाया जाए और हर भटकाने वाले से शुद्ध किया जाए।
'श्रेष्ठ मार्ग' और जिस 'ऐश्वर्य' की ओर वह ले जाता है, वे क्या हैं?
'श्रेष्ठ मार्ग' (सुपथ) धर्म और सत्य का पथ है, और 'ऐश्वर्य' (राये) परम धन के रूप में समझा जाता है — आध्यात्मिक पूर्णता और मोक्ष, केवल भौतिक लाभ नहीं।

Ready to start chanting?

See Benefits & How to Chant →