अहं सर्वस्य प्रभवो — Word-by-Word Meaning
अहं सर्वस्य प्रभवो
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
अहं
ahaṃ
मैं (श्रीकृष्ण, परमेश्वर)
सर्वस्य
sarvasya
सबका (समस्त का)
प्रभवः
prabhavaḥ
उद्गम, मूल, जिससे सब उत्पन्न होता है
मत्तः
mattaḥ
मुझसे
सर्वं
sarvaṃ
सब कुछ
प्रवर्तते
pravartate
प्रवृत्त होता है, उद्भूत होता है, गति में आता है
इति मत्वा
iti matvā
ऐसा जानकर / समझकर
भजन्ते मां
bhajante māṃ
मेरी उपासना करते हैं, मुझमें भक्तियुक्त रहते हैं
बुधाः
budhāḥ
बुद्धिमान, ज्ञानी जन
भावसमन्विताः
bhāva-samanvitāḥ
प्रेमपूर्ण भाव और दृढ़ निष्ठा से युक्त
Complete Translation
मैं ही सबका उद्गम (मूल) हूँ; मुझसे ही समस्त सृष्टि प्रवृत्त होती है। ऐसा जानकर, श्रद्धा-भाव से युक्त बुद्धिमान भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं।
Origin & History
Source: Bhagavad Gita, Chapter 10 (Vibhuti Yoga), verse 8
Author: Spoken by Lord Krishna; part of the Mahabharata (Veda Vyasa)
Period: Classical antiquity (part of the Mahabharata)
भगवद्गीता के दसवें अध्याय में श्रीकृष्ण अपनी अनन्त दिव्य विभूतियों को प्रकट करते हैं। वे इस प्रकटीकरण का आरम्भ स्वयं को समस्त अस्तित्व का मूल, वह जिससे सब कुछ प्रवृत्त होता है, घोषित करते हुए करते हैं, और कहते हैं कि जो इसे सचमुच जानते हैं वे प्रेममयी भक्ति से उनकी उपासना करते हैं। वैष्णव टीकाकार इसे गीता के भक्ति-उपदेश के मूल चार (अथवा अनेक) 'सार-श्लोकों' (चतुःश्लोकी) में गिनते हैं।
Frequently Asked Questions
'अहं सर्वस्य प्रभवो' कहाँ से आता है?▼
यह भगवद्गीता का श्लोक 10.8 है, जो दिव्य विभूतियों के अध्याय (विभूति योग) से है, जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा।
यह श्लोक भक्तों के लिए इतना महत्त्वपूर्ण क्यों है?▼
अनेक आचार्य, विशेषकर भक्ति और गौड़ीय वैष्णव परम्पराओं में, 10.8 को गीता का 'सार-श्लोक' मानते हैं। यह सत्य (श्रीकृष्ण सबके मूल हैं) और उस सत्य की प्रतिक्रिया (बुद्धिमान प्रेमपूर्वक उनकी उपासना करते हैं) — दोनों को बताता है, और इस प्रकार ज्ञान तथा भक्ति को एक करता है।
'भावसमन्विताः' का क्या अर्थ है?▼
इसका अर्थ है 'भाव से युक्त' — गहन प्रेममयी भावना और हार्दिक निष्ठा से युक्त। यह श्लोक सिखाता है कि ईश्वर की सच्ची उपासना कर्तव्य से नहीं, बल्कि इसी अन्तर्भाव के प्रेम से प्रवाहित होती है।
इस श्लोक का व्यवहार में प्रयोग कैसे होता है?▼
यह दैनिक उपासना और गीता-अध्ययन में पढ़ा जाता है, जप में प्रयुक्त होता है, और भक्ति पर प्रवचनों में प्रायः उद्धृत किया जाता है। भक्त श्रीकृष्ण को सबके मूल और आधार के रूप में प्रेमपूर्ण स्मरण जगाने हेतु इस पर ध्यान करते हैं।
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