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अनन्याश्चिन्तयन्तो माम् — Word-by-Word Meaning

अनन्याश्चिन्तयन्तो माम्

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

अनन्याः
ananyāḥ
अनन्य मन से, किसी अन्य का चिन्तन न करते हुए
चिन्तयन्तः
chintayantaḥ
निरन्तर चिन्तन / ध्यान करते हुए
मां
māṃ
मुझ (भगवान) का
ये जनाः
ye janāḥ
जो लोग
पर्युपासते
paryupāsate
हर प्रकार से / दृढ़तापूर्वक मेरी उपासना करते हैं
तेषां
teṣāṃ
उनका, उनके लिए
नित्याभियुक्तानां
nityābhiyuktānāṃ
जो सदा युक्त एवं भक्तिपरायण हैं
योगक्षेमं
yoga-kṣemaṃ
अप्राप्त की प्राप्ति तथा प्राप्त की रक्षा (कल्याण)
वहामि अहम्
vahāmy-aham
मैं स्वयं वहन करता हूँ / प्रदान एवं रक्षा करता हूँ

Complete Translation

जो लोग अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, उन नित्य-युक्त (निरन्तर लगे हुए) भक्तों का योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ — अप्राप्त की प्राप्ति और प्राप्त की रक्षा मैं स्वयं करता हूँ।

Origin & History

Source: Bhagavad Gita, Chapter 9 (Raja Vidya Raja Guhya Yoga), verse 22

Author: Spoken by Lord Krishna; part of the Mahabharata (Veda Vyasa)

Period: Classical antiquity (part of the Mahabharata)

भगवद्गीता के नवें अध्याय में कृष्ण भक्ति का परम गोपनीय ज्ञान प्रकट करते हैं। विभिन्न उपासक किस प्रकार ईश्वर के समीप आते हैं, यह बताने के पश्चात् वे यह सर्वोच्च आश्वासन देते हैं: जो अपने मन को केवल उन्हीं में स्थिर करके अविचल भाव से उनकी उपासना करते हैं, उनके कल्याण का दायित्व वे स्वयं ले लेते हैं और उनकी समस्त आवश्यकताओं की प्राप्ति एवं रक्षा करते हैं। यह श्लोक समस्त वैष्णव परम्पराओं में भगवान का अपने भक्तों के प्रति कृपा-वचन माना जाता है।

Frequently Asked Questions

'अनन्याश्चिन्तयन्तो माम्' कहाँ से है?
यह भगवद्गीता का 9.22 श्लोक है, जो राजविद्या-राजगुह्य योग नामक अध्याय में आता है और भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा है।
'योगक्षेम' का क्या अर्थ है?
'योग' का अर्थ है जो प्राप्त नहीं है उसकी प्राप्ति, और 'क्षेम' का अर्थ है जो प्राप्त है उसकी रक्षा एवं पालन। अतः भगवान अपने सच्चे भक्तों के पालन और रक्षा दोनों का — उनके सम्पूर्ण कल्याण का — वचन देते हैं।
यह वचन किसे प्राप्त होता है?
यह 'अनन्य' भक्तों के लिए है — जो किसी अन्य का चिन्तन न करते हुए केवल भगवान की उपासना करते हैं और सदा युक्त ('नित्य-अभियुक्त') रहते हैं। ऐसे भक्तों के कल्याण का भार भगवान स्वयं उठाते हैं।
यह श्लोक इतना प्रिय क्यों है?
यह शास्त्रों के सर्वाधिक आश्वासनदायक वचनों में से एक है। असंख्य भक्त आवश्यकता या भय के समय इसका पाठ करते हैं, इस विश्वास से कि जो पूर्णतः उन पर निर्भर हैं उनकी देखभाल कृष्ण स्वयं करते हैं।

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