अति सर्वत्र वर्जयेत् — Word-by-Word Meaning
अति सर्वत्र वर्जयेत्
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
अति
ati
अति, अत्यधिक, बहुत अधिक
रूपेण
rūpeṇa
(अपने) रूप (सौन्दर्य) के कारण
वै
vai
निश्चय ही, वस्तुतः
सीता
sītā
सीता (जिनके अत्यधिक सौन्दर्य ने उनके अपहरण का कारण बना)
अतिगर्वेण
ati-garveṇa
अत्यधिक गर्व/अहंकार के कारण
रावणः
rāvaṇaḥ
रावण (अपने अत्यधिक गर्व से नष्ट हुआ)
अतिदानात्
ati-dānāt
अत्यधिक दान/उदारता के कारण
बलिः
baliḥ
राजा बलि (अपनी असीम उदारता के कारण बँध गए)
बद्धः
baddhaḥ
बँध गए, बन्धन में पड़े
अति सर्वत्र
ati sarvatra
अति सर्वत्र, हर बात में अति
वर्जयेत्
varjayet
बचना चाहिए, त्यागना चाहिए
Complete Translation
अत्यधिक रूप (सौन्दर्य) के कारण सीता को कष्ट हुआ, अत्यधिक गर्व से रावण नष्ट हुआ, और अत्यधिक दान से राजा बलि बँध गए; इसलिए मनुष्य को हर बात में अति (अतिशयता) से बचना चाहिए। तीन प्रसिद्ध उदाहरणों के द्वारा यह सुभाषित मध्यम मार्ग (संयम) का कालजयी ज्ञान सिखाता है — कि अच्छे गुण भी, अति पर पहुँचकर, पतन का कारण बन सकते हैं।
Origin & History
Source: Subhashita (Sanskrit niti tradition)
Author: Anonymous (traditional Subhashita)
Period: Classical Sanskrit literature
यह श्लोक संस्कृत की समृद्ध सुभाषित परम्परा से सम्बद्ध है, जो ज्ञान एवं आचरण पर हजारों स्मरणीय श्लोकों को सुरक्षित रखती है। संयम के मूल्य को सिखाने के लिए यह महाकाव्यों एवं पुराणों के तीन व्यक्तियों का उल्लेख करता है, जिनकी अति — सौन्दर्य, गर्व एवं उदारता की — दुःख का कारण बनी, और हर बात में अति से बचने के कालजयी नियम के साथ समाप्त होता है।
Frequently Asked Questions
अति सर्वत्र वर्जयेत् का क्या अर्थ है?▼
इसका अर्थ है 'मनुष्य को हर बात में अति से बचना चाहिए।' यह श्लोक तीन उदाहरण देता है — सीता का अत्यधिक सौन्दर्य, रावण का अत्यधिक गर्व और बलि का अत्यधिक दान, जिनमें से प्रत्येक कठिनाई का कारण बना — यह सिखाने के लिए कि संयम सर्वत्र पालनीय है।
सीता, रावण और बलि का उल्लेख क्यों है?▼
प्रत्येक यह दर्शाता है कि किसी अन्यथा अच्छी वस्तु की भी अति पतन का कारण बन सकती है: सीता के अनुपम सौन्दर्य ने उनके अपहरण का कारण बना, रावण के गर्व ने उसे नष्ट किया, और राजा बलि की असीम उदारता ने उन्हें वामन द्वारा बँधवा दिया। मिलकर वे संयम का पक्ष प्रस्तुत करते हैं।
इस सुभाषित की केन्द्रीय शिक्षा क्या है?▼
संयम। यह श्लोक सिखाता है कि जीवन के सभी क्षेत्रों में संतुलन और संयम बुद्धिमत्ता है, क्योंकि कोई भी वस्तु अति पर पहुँचकर — सौन्दर्य, आत्मविश्वास या उदारता जैसा गुण भी — हानि ला सकती है।
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