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अति सर्वत्र वर्जयेत् PDF

अति सर्वत्र वर्जयेत् की पूरी लिरिक्स — संस्कृत, रोमन व अर्थ सहित। एक क्लिक में PDF सेव करें या प्रिंट करें।

अति रूपेण वै सीता अतिगर्वेण रावणः। अतिदानाद्बलिर्बद्धो अति सर्वत्र वर्जयेत्॥

ati rūpeṇa vai sītā ati-garveṇa rāvaṇaḥ। ati-dānād balir baddho ati sarvatra varjayet॥

अत्यधिक रूप (सौन्दर्य) के कारण सीता को कष्ट हुआ, अत्यधिक गर्व से रावण नष्ट हुआ, और अत्यधिक दान से राजा बलि बँध गए; इसलिए मनुष्य को हर बात में अति (अतिशयता) से बचना चाहिए। तीन प्रसिद्ध उदाहरणों के द्वारा यह सुभाषित मध्यम मार्ग (संयम) का कालजयी ज्ञान सिखाता है — कि अच्छे गुण भी, अति पर पहुँचकर, पतन का कारण बन सकते हैं।