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श्री अय्यप्प अष्टोत्तरशतनामावली — Word-by-Word Meaning

श्री अय्यप्प अष्टोत्तरशतनामावली

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

ॐ महाशास्त्रे नमः
Om Mahashastre Namah
महाशास्ता (परम धर्मशास्ता, अय्यप्प) को नमस्कार
ॐ महादेवसुताय नमः
Om Mahadevasutaya Namah
महादेव (शिव) के पुत्र को नमस्कार
ॐ लोककर्त्रे नमः
Om Lokakartre Namah
लोकों के रचयिता को नमस्कार
ॐ परात्पराय नमः
Om Paratparaya Namah
श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ को नमस्कार
ॐ त्रिलोकरक्षकाय नमः
Om Trilokarakshakaya Namah
तीनों लोकों के रक्षक को नमस्कार
ॐ भूतसैनिकाय नमः
Om Bhutasainikaya Namah
भूतगणों की सेना वाले को नमस्कार
ॐ हयारूढाय नमः
Om Hayarudhaya Namah
अश्व पर आरूढ़ को नमस्कार
ॐ इक्षुधन्विने नमः
Om Ikshudhanvine Namah
इक्षु (गन्ने) के धनुष वाले को नमस्कार
ॐ पुष्पबाणाय नमः
Om Pushpabanaya Namah
पुष्प-बाण वाले को नमस्कार
ॐ मायादेवीसुताय नमः
Om Mayadevisutaya Namah
मायादेवी (मोहिनी, विष्णु के रूप) के पुत्र को नमस्कार
ॐ महाशैवाय नमः
Om Mahashaivaya Namah
शिव के परम भक्त (महाशैव) को नमस्कार
ॐ वैष्णवाय नमः
Om Vaishnavaya Namah
जो विष्णु के भक्त (वैष्णव) भी हैं, उन्हें नमस्कार
ॐ षण्मुखप्रियाय नमः
Om Shanmukhapriyaya Namah
षण्मुख (कार्तिकेय) के प्रिय को नमस्कार
ॐ मेरुशृङ्गसमासीनाय नमः
Om Merushringasamasinaya Namah
मेरु पर्वत के शिखर पर विराजमान को नमस्कार
ॐ सगुणाय नमः
Om Sagunaya Namah
सगुण (रूप एवं गुणों सहित) को नमस्कार
ॐ निर्गुणाय नमः
Om Nirgunaya Namah
निर्गुण (सब गुणों से परे) को नमस्कार
ॐ ऋग्यजुःसामाथर्वात्मने नमः
Om Rigyajuhsamatharvatmane Namah
चारों वेदों (ऋक्, यजुः, साम, अथर्व) के आत्मस्वरूप को नमस्कार
ॐ संसारतापविच्छेत्त्रे नमः
Om Samsaratapavichchhettre Namah
संसार के तापों को छिन्न करने वाले को नमस्कार
ॐ रोगहन्त्रे नमः
Om Rogahantre Namah
रोग के नाशक को नमस्कार
ॐ सुब्रह्मण्यानुजाय नमः
Om Subrahmanyanujaya Namah
सुब्रह्मण्य (कार्तिकेय) के अनुज को नमस्कार
ॐ भक्तवत्सलाय नमः
Om Bhaktavatsalaya Namah
भक्तों पर अपार स्नेह रखने वाले को नमस्कार

Complete Translation

यह श्री अय्यप्प (धर्मशास्ता, हरिहरपुत्र) के एक सौ आठ नामों की अष्टोत्तरशतनामावली है। प्रत्येक नाम के पूर्व 'ॐ' और अन्त में 'नमः' लगाकर अर्पित किया जाता है। 'महाशास्ता को नमस्कार' से आरम्भ होकर 'भक्तवत्सल को नमस्कार' पर समाप्त होते हुए, ये नाम उन्हें शिव (महादेव) और मोहिनी (मायादेवी) के पुत्र, तीनों लोकों के रक्षक, मेरुशिखर पर विराजमान प्रभु, चारों वेदों के आत्मस्वरूप, सगुण एवं निर्गुण दोनों, रोग एवं संसार-ताप के नाशक, सुब्रह्मण्य के अनुज, तथा भक्तों के नित्य करुणामय आश्रय के रूप में स्तुत करते हैं।

Origin & History

Source: Traditional Shasta / Ayyappa devotional liturgy (South Indian temple tradition)

Author: Traditional (composer unknown)

Period: Traditional

भगवान अय्यप्प की अष्टोत्तरशतनामावली धर्मशास्ता-उपासना की मन्दिर-परम्परा से सम्बद्ध है, जिसका केन्द्र केरल का प्रसिद्ध पर्वत-तीर्थ शबरीमला है। अय्यप्प हरिहरपुत्र के रूप में पूजे जाते हैं, जो विष्णु के मोहिनी रूप एवं शिव के मिलन से उत्पन्न हुए, वैष्णव एवं शैव परम्पराओं की एकता के प्रतीक — यह भाव महाशैव, वैष्णव एवं विष्णुपूजक जैसे नामों में प्रतिबिम्बित है। ये 108 नाम अर्चना के रूप में पढ़े जाते हैं, प्रत्येक नाम देवता के चरणों में पुष्प सहित अर्पित किया जाता है, और शबरीमला यात्रा से पूर्व किए जाने वाले कठोर 41 दिवसीय व्रत में किए जाने वाले भक्ति-कर्मों का केन्द्रीय अंग हैं।

Frequently Asked Questions

अय्यप्प अष्टोत्तरशतनामावली क्या है?
यह भगवान अय्यप्प के 108 नामों की 'नाम-माला' (अष्टोत्तरशतनामावली) है। प्रत्येक पंक्ति उनके 108 पवित्र नामों में से एक को 'ॐ' के पूर्व एवं 'नमः' (नमस्कार) के पश्चात् अर्पित करती है, जो उनके दिव्य रूपों, शक्तियों एवं कृपा का वर्णन करती है।
अय्यप्प को हरिहरपुत्र क्यों कहा जाता है?
परम्परा के अनुसार अय्यप्प हरि (मोहिनी के मोहक रूप में विष्णु) एवं हर (शिव) से उत्पन्न हुए, इसलिए उन्हें हरिहरपुत्र — दोनों का पुत्र — कहा जाता है। नामावली इसे महाशैव एवं वैष्णव दोनों कहकर दर्शाती है, जो भक्ति की दो महान धाराओं को एक करती है।
इन 108 नामों के पाठ का सर्वोत्तम समय कौन-सा है?
इनका पाठ विशेषतः मण्डल-मकरविलक्कु यात्रा-काल में एवं शबरीमला जाने से पूर्व भक्तों द्वारा किए जाने वाले 41 दिवसीय व्रत (तपस्या) के दौरान किया जाता है। शनिवार एवं स्नान के पश्चात् प्रातःकाल विशेष रूप से शुभ माने जाते हैं।
पूजा में नामावली का उपयोग किस प्रकार होता है?
इसका प्रयोग सामान्यतः अर्चना हेतु होता है — प्रत्येक 108 नाम के साथ देवता के चरणों में पुष्प, तुलसी-दल या चन्दन की चुटकी अर्पित करना। इसका एक बार पाठ करना ही पूर्ण पूजा है, जो प्रायः 'स्वामिये शरणम् अय्यप्पा' के जयघोष से पूर्व एवं पश्चात् किया जाता है।

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