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श्रीमद्भगवद्गीता १३.२८ — समं सर्वेषु भूतेषु — Word-by-Word Meaning

श्रीमद्भगवद्गीता १३.२८ — समं सर्वेषु भूतेषु

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

समम्
samam
समभाव से
सर्वेषु
sarveṣhu
समस्त में
भूतेषु
bhūteṣhu
भूतों में
तिष्ठन्तम्
tiṣhṭhan-tam
स्थित
परमेश्वरम्
parama-īśhvaram
परमेश्वर को
विनश्यत्सु
vinaśhyatsu
नश्वरों के बीच
अविनश्यन्तम्
avinaśhyantam
अनश्वर
यः
yaḥ
जो
पश्यति
paśhyati
देखता है
सः
saḥ
वही
पश्यति
paśhyati
वास्तव में देखता है

Complete Translation

जो पुरुष समस्त नश्वर भूतों में अनश्वर परमेश्वर को समभाव से स्थित देखता है, वही (वास्तव में) देखता है।।

Origin & History

Source: Bhagavad Gita Chapter 13, Verse 28

Author: Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva)

Period: Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)

तेरहवें अध्याय, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग में, श्रीकृष्ण शरीर (क्षेत्र) और क्षेत्र के ज्ञाता (आत्मा), तथा सभी में स्थित परम ज्ञाता (परमात्मा) के बीच भेद समझाते हैं। यह श्लोक उस उपदेश का शिखर है, जो प्रत्येक नश्वर भूत में समभाव से स्थित उसी अनश्वर प्रभु को देखने की मुक्तिदायक दृष्टि का वर्णन करता है।

Frequently Asked Questions

भगवद्गीता 13.28 का अर्थ क्या है?
यह सिखाता है कि जो परमेश्वर (परमात्मा) को समस्त भूतों में समभाव से स्थित देखता है — जो कुछ भी नष्ट होता है उसके भीतर अनश्वर उपस्थिति को — वही वास्तव में देखता है। सच्ची दृष्टि रूपों की विविधता के नीचे एक ही दिव्य आत्मा को पहचानना है।
'समदर्शन' क्या है?
समदर्शन वह सिद्ध अनुभूति है कि बाहरी भेदों के बावजूद एक ही ईश्वर प्रत्येक जीव में निवास करता है। यह शरीरों के भेद को नकारता नहीं, अपितु उन सबमें समान रूप से स्थित एक अपरिवर्तनशील आत्मा को देखता है, जिससे करुणा और द्वेष से मुक्ति आती है।
यह श्लोक मुक्ति की ओर कैसे ले जाता है?
अगला ही श्लोक (13.29) कहता है कि जो इस प्रकार देखता है, वह आत्मा द्वारा आत्मा का अधःपतन नहीं करता और इसलिए परम लक्ष्य को प्राप्त होता है। अहंकार की भेद-भावना को पार कर सार्वभौम आत्मा में स्थित होकर साधक मुक्ति की ओर बढ़ता है।
समदर्शन को दैनिक जीवन में कैसे अभ्यास करें?
दूसरों के साथ व्यवहार में सचेत रूप से यह स्मरण करके कि वही प्रभु उनके भीतर निवास करता है। इससे सामान्य व्यवहार श्रद्धा और दयालुता के अवसर बन जाते हैं, और निर्णय, क्रोध तथा भेद की आदतें क्रमशः क्षीण होती हैं।

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