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श्रीमद्भगवद्गीता १८.६५ — मन्मना भव मद्भक्तो — Word-by-Word Meaning

श्रीमद्भगवद्गीता १८.६५ — मन्मना भव मद्भक्तो

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

मन्मनाः
mat-manāḥ
मेरा चिन्तन करने वाला
भव
bhava
बनो
मद्भक्तः
mat-bhaktaḥ
मेरे भक्त
मद्याजी
mat-yājī
मेरा पूजन करो
माम्
mām
मुझको
नमस्कुरु
namaskuru
नमस्कार करो
माम्
mām
मुझको
एव
eva
निश्चय ही
एष्यसि
eṣhyasi
तुम आओगे
सत्यम्
satyam
सत्य
ते
te
तुमको
प्रतिजाने
pratijāne
मैं प्रतिज्ञा करता हूँ
प्रियः
priyaḥ
प्रिय
असि
asi
तुम हो
मे
me
मुझको

Complete Translation

तुम मच्चित, मद्भक्त और मेरे पूजक (मद्याजी) बनो और मुझे नमस्कार करो; (इस प्रकार) तुम मुझे ही प्राप्त होगे; यह मैं तुम्हे सत्य वचन देता हूँ,(क्योंकि) तुम मेरे प्रिय हो।।

Origin & History

Source: Bhagavad Gita Chapter 18, Verse 65

Author: Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva)

Period: Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)

अन्तिम अध्याय, मोक्ष संन्यास योग में, श्रीकृष्ण अर्जुन को अपना सर्वाधिक गोपनीय उपदेश देते हैं। प्रसिद्ध चरम-श्लोक (18.66) से ठीक पहले, वे यह स्नेहमय चतुर्विध उपदेश देते हैं और इसे एक व्यक्तिगत प्रतिज्ञा से दृढ़ करते हैं, अर्जुन को प्राप्ति का आश्वासन देते हुए, क्योंकि वह भगवान को प्रिय है।

Frequently Asked Questions

भगवद्गीता 18.65 में चार उपदेश कौन से हैं?
श्रीकृष्ण चार आदेश देते हैं: (1) मन्मना — अपना मन मुझमें लगाओ; (2) मद्भक्त — मेरे भक्त बनो; (3) मद्याजी — मेरा पूजन करो; (4) मां नमस्कुरु — मुझे नमस्कार करो। इनका पालन करने पर, वे प्रतिज्ञा करते हैं, भक्त निश्चय ही उन्हें प्राप्त होगा।
यह श्लोक गीता 9.34 से कैसे सम्बन्धित है?
पहली पंक्ति श्लोक 9.34 के लगभग समान है। श्रीकृष्ण इस चतुर्विध उपदेश को यहाँ समापन अध्याय में दोहराते हैं, और इसे एक गम्भीर व्यक्तिगत प्रतिज्ञा ('यह मैं तुम्हें सत्य वचन देता हूँ') तथा स्नेहमय आश्वासन 'तुम मुझे प्रिय हो' से दृढ़ करते हैं, जिससे यह एक अन्तिम परामर्श के रूप में विशेष महत्व पाता है।
श्रीकृष्ण 'तुम मुझे प्रिय हो' क्यों कहते हैं?
ये आत्मीय शब्द प्रकट करते हैं कि भगवान और भक्त का सम्बन्ध परस्पर प्रेम का है। श्रीकृष्ण अर्जुन को — और उसके माध्यम से प्रत्येक सच्चे साधक को — आश्वासन देते हैं कि भक्त भगवान को प्रिय है, जिससे मिलन की प्रतिज्ञा गहराई से व्यक्तिगत और आश्वस्तकारी बन जाती है।
क्या यह श्लोक भगवद्गीता का सार है?
अनेक लोग 18.65 (18.66 के साथ) को गीता के शिखर उपदेशों में मानते हैं। यह सम्पूर्ण भक्ति-मार्ग को चार सरल अभ्यासों में समेटता है, जिसे भगवान की अपनी प्रतिज्ञा से दृढ़ किया गया है, जिससे यह भक्त के लिए एक पूर्ण मार्गदर्शन बन जाता है।

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