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श्री भगवद्ध्यानसोपानम् Meaning — Line by Line

श्री भगवद्ध्यानसोपानम्

Every verse and every word explained in English & Hindi

Meaning — Line by Line

Every verse of श्री भगवद्ध्यानसोपानम् with its Hindi meaning. Tap any word to hear it, or ▶ to recite the verse.

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  1. Verse 1. antarjyotiḥ kimapi yaminām añjanaṃ yogadṛṣṭe-
  2. Verse 2. vedātītaśrutiparimalaṃ vedhasāṃ maulisevyaṃ
  3. Verse 3. citrākārāṃ kaṭakarucibhiścāruvṛttānupūrvāṃ
  4. Verse 4. kāmārāmasthirakadalikāstambhasambhāvanīyaṃ
  5. Verse 5. samprīṇāti pratikalamasau mānasaṃ me sujātā
  6. Verse 6. śrīvatsena prathitavibhavaṃ śrīpadanyāsadhanyaṃ
  7. Verse 7. ekaṃ līlopahitamitaraṃ bāhumājānulambaṃ
  8. Verse 8. sābhiprāyasmitavikasitaṃ cārubimbādharoṣṭhaṃ
  9. Verse 9. mālyairantaḥsthiraparimalairvallabhāsparśamānyaiḥ
  10. Verse 10. pādāmbhojaṃ spṛśati bhajate raṅganāthasya jaṅghā-
  11. Verse 11. kāntodāararayairiha bhujaiḥ kaṅkaṇajyākiṇāṅkai-
  12. Verse 12. raṅgāsthāne rasikamahite rañjitāśeṣacitte
  13. Verse 13. || iti śrīmadveṅkaṭeśāryapraṇītaṃ bhagavaddhyānasopānaṃ sampūrṇam ||
Verse 1#

antarjyotiḥ kimapi yaminām añjanaṃ yogadṛṣṭe-

अन्तर्ज्योतिः किमपि यमिनामञ्जनं योगदृष्टे- श्चिन्तारत्नं सुलभमिह नः सिद्धिमोक्षानुरूपम् दीनानाथव्यसनशमनं दैवतं दैवतानां दिव्यं चक्षुः श्रुतिपरिषदां दृश्यते रङ्गमध्ये

antarjyotiḥ kimapi yaminām añjanaṃ yogadṛṣṭe- ścintāratnaṃ sulabhamiha naḥ siddhimokṣānurūpam | dīnānāthavyasanaśamanaṃ daivataṃ daivatānāṃ divyaṃ cakṣuḥ śrutipariṣadāṃ dṛśyate raṅgamadhye || 1 ||

Meaningवहाँ श्रीरंगम के मध्य दर्शन होता है — किसी अनिर्वचनीय अन्तर्ज्योति का, जो यमी (संयमी) मुनियों की योगदृष्टि का अञ्जन है, जो हमें यहाँ सुलभ चिन्तामणि है और सिद्धि एवं मोक्ष दोनों के अनुरूप है, जो दीन-अनाथों के दुःख का शमन करने वाला, देवों का भी देव तथा श्रुति-परिषद् का दिव्य नेत्र है। (1)

Verse 2#

vedātītaśrutiparimalaṃ vedhasāṃ maulisevyaṃ

वेदातीतश्रुतिपरिमलं वेधसां मौलिसेव्यं प्रादुर्भूतं कनकसरितः सैकते हंसजुष्टे लक्ष्मीभूम्योः करसरसिजैर्लालितं रङ्गभर्तुः पादाम्भोजं प्रतिफलति मे भावनादीर्घिकायाम्

vedātītaśrutiparimalaṃ vedhasāṃ maulisevyaṃ prādurbhūtaṃ kanakasaritaḥ saikate haṃsajuṣṭe | lakṣmībhūmyoḥ karasarasijairlālitaṃ raṅgabhartuḥ pādāmbhojaṃ pratiphalati me bhāvanādīrghikāyām || 2 ||

Meaningमेरी भावना-रूपी दीर्घिका (सरोवर) में श्रीरंगनाथ के चरण-कमल प्रतिफलित होते हैं — जो वेद से भी परे की सुगन्ध एवं वेदों के परिमल-स्वरूप हैं, ब्रह्मादि के मुकुटों से सेव्य हैं, स्वर्ण-सरिता (कावेरी) के हंस-सेवित पुलिन पर प्रादुर्भूत हैं, तथा लक्ष्मी एवं भूमि के कर-कमलों से लालित हैं। (2)

Verse 3#

citrākārāṃ kaṭakarucibhiścāruvṛttānupūrvāṃ

चित्राकारां कटकरुचिभिश्चारुवृत्तानुपूर्वां काले दूत्यद्रुततरगतिं कान्तिलीलाकलाचीम् जानुच्छायाद्विगुणसुभगां रङ्गभर्तुर्मदात्मा जङ्घां दृष्ट्वा जननपदवीजाङ्घिकत्वं जहाति

citrākārāṃ kaṭakarucibhiścāruvṛttānupūrvāṃ kāle dūtyadrutataragatiṃ kāntilīlākalācīm | jānucchāyādviguṇasubhagāṃ raṅgabharturmadātmā jaṅghāṃ dṛṣṭvā jananapadavījāṅghikatvaṃ jahāti || 3 ||

Meaningरंगनाथ की जंघाओं को देखकर — जो विचित्र आकृति वाली, सुन्दर-वृत्त एवं क्रमशः तनी हुई, समय पर दूत-समान द्रुतगामी, कान्ति एवं लीला से कलित, तथा घुटनों की आभा से द्विगुणित सुभग हैं — मेरा मुग्ध मन जन्म-पथ पर भटकने का स्वभाव त्याग देता है। (3)

Verse 4#

kāmārāmasthirakadalikāstambhasambhāvanīyaṃ

कामारामस्थिरकदलिकास्तम्भसम्भावनीयं क्षौमाश्लिष्टं किमपि कमलाभूमिनीलोपधानम् न्यञ्चत्काञ्चीकिरणरुचिरं निर्विशत्यूरुयुग्मं लावण्यौघद्वयमिव मतिर्मामिका रङ्गयूनः

kāmārāmasthirakadalikāstambhasambhāvanīyaṃ kṣaumāśliṣṭaṃ kimapi kamalābhūminīlopadhānam | nyañcatkāñcīkiraṇaruciraṃ nirviśatyūruyugmaṃ lāvaṇyaughadvayamiva matirmāmikā raṅgayūnaḥ || 4 ||

Meaningमेरी बुद्धि युवा रंगनाथ की ऊरु-युगल में प्रवेश करती है — जो काम के उद्यान के स्थिर कदली-स्तम्भों के समान सम्भावनीय, क्षौम (रेशम) से आवृत, लक्ष्मी के लिए अनिर्वचनीय नील उपधान (तकिया), तथा नीचे झरती मेखला की किरणों से रुचिर हैं — मानो दो लावण्य-धाराओं में। (4)

Verse 5#

samprīṇāti pratikalamasau mānasaṃ me sujātā

सम्प्रीणाति प्रतिकलमसौ मानसं मे सुजाता गम्भीरत्वात्क्वचन समये गूढनिक्षिप्तविश्वा नालीकेन स्फुरितरजसा वेधसो निर्मिमाणा रम्यावर्तद्युतिसहचरी रङ्गनाथस्य नाभिः

samprīṇāti pratikalamasau mānasaṃ me sujātā gambhīratvātkvacana samaye gūḍhanikṣiptaviśvā | nālīkena sphuritarajasā vedhaso nirmimāṇā ramyāvartadyutisahacarī raṅganāthasya nābhiḥ || 5 ||

Meaningप्रत्येक क्षण रंगनाथ की सुजात नाभि मेरे मानस को आनन्दित करती है — जो इतनी गम्भीर है कि प्रलयकाल में समस्त विश्व को गूढ़ रूप से अपने भीतर रख लेती है, जो विकसित पराग वाले कमल से ब्रह्मा का निर्माण करती है, तथा रम्य आवर्त की द्युति की सहचरी है। (5)

Verse 6#

śrīvatsena prathitavibhavaṃ śrīpadanyāsadhanyaṃ

श्रीवत्सेन प्रथितविभवं श्रीपदन्यासधन्यं मध्यं बाह्वोर्मणिवररुचा रञ्जितं रङ्गधाम्नः सान्द्रच्छायं तरुणतुलसीचित्रया वैजयन्त्या सन्तापं मे शमयति धियश्चन्द्रिकोदारहारम्

śrīvatsena prathitavibhavaṃ śrīpadanyāsadhanyaṃ madhyaṃ bāhvormaṇivararucā rañjitaṃ raṅgadhāmnaḥ | sāndracchāyaṃ taruṇatulasīcitrayā vaijayantyā santāpaṃ me śamayati dhiyaścandrikodārahāram || 6 ||

Meaningरंगधाम के मध्य भाग (कटि) — जो श्रीवत्स से विभव-प्रसिद्ध, श्री के चरण-न्यास से धन्य, भुजाओं के बीच श्रेष्ठ मणियों की आभा से रंजित, ताज़ी तुलसी से विचित्र वैजयन्ती माला से सान्द्र-छाया वाला, तथा चन्द्रिका-समान उदार हार से युक्त है — मेरे मन के सन्ताप का शमन करता है। (6)

Verse 7#

ekaṃ līlopahitamitaraṃ bāhumājānulambaṃ

एकं लीलोपहितमितरं बाहुमाजानुलम्बं प्राप्तौ रङ्गे शयितुरखिलप्रार्थनापारिजातम् दृप्ता सेयं दृढनियमिता रश्मिभिर्भूषणानां चिन्ताहस्तिन्यनुभवति मे चित्रमालानयन्त्रम्

ekaṃ līlopahitamitaraṃ bāhumājānulambaṃ prāptau raṅge śayiturakhilaprārthanāpārijātam | dṛptā seyaṃ dṛḍhaniyamitā raśmibhirbhūṣaṇānāṃ cintāhastinyanubhavati me citramālānayantram || 7 ||

Meaningशयन करते रंगनाथ की दो भुजाएँ — एक लीला से रखी, दूसरी घुटनों तक लम्बित, समस्त प्रार्थनाओं को पूर्ण करने वाला पारिजात — गर्वित होकर भी आभूषणों की किरणों से दृढ़तापूर्वक बँधी हैं; मेरी चिन्ता-रूपी हस्तिनी उन्हें विचित्र आलान-स्तम्भ के रूप में अनुभव करती है। (7)

Verse 8#

sābhiprāyasmitavikasitaṃ cārubimbādharoṣṭhaṃ

साभिप्रायस्मितविकसितं चारुबिम्बाधरोष्ठं दुःखापायप्रणयिनि जने दूरदत्ताभिमुख्यम् कान्तं वक्त्रं कनकतिलकालङ्कृतं रङ्गभर्तुः स्वान्ते गाढं विलगति मम स्वागतोदारनेत्रम्

sābhiprāyasmitavikasitaṃ cārubimbādharoṣṭhaṃ duḥkhāpāyapraṇayini jane dūradattābhimukhyam | kāntaṃ vaktraṃ kanakatilakālaṅkṛtaṃ raṅgabhartuḥ svānte gāḍhaṃ vilagati mama svāgatodāranetram || 8 ||

Meaningरंगनाथ का कान्त मुख — सार्थक मुस्कान से विकसित, सुन्दर बिम्ब-समान अधरोष्ठ वाला, दूर से ही दुःखी भक्त की ओर अभिमुख, स्वर्ण-तिलक से अलंकृत — अपने स्वागतपूर्ण उदार नेत्रों सहित मेरे हृदय में गाढ़ रूप से लग जाता है। (8)

Verse 9#

mālyairantaḥsthiraparimalairvallabhāsparśamānyaiḥ

माल्यैरन्तःस्थिरपरिमलैर्वल्लभास्पर्शमान्यैः कुप्यच्चोलीवचनकुटिलैः कुन्तलैः श्लिष्टमूले रत्नापीडद्युतिशबलिते रङ्गभर्तुः किरीटे राजन्वत्यः स्थितिमधिगता वृत्तयश्चेतसो मे

mālyairantaḥsthiraparimalairvallabhāsparśamānyaiḥ kupyaccolīvacanakuṭilaiḥ kuntalaiḥ śliṣṭamūle | ratnāpīḍadyutiśabalite raṅgabhartuḥ kirīṭe rājanvatyaḥ sthitimadhigatā vṛttayaścetaso me || 9 ||

Meaningरंगनाथ के किरीट में — जिसका मूल उनके कुन्तलों (केशों) से वेष्टित है, तथा जो रत्नापीड की द्युति से शबल है — मेरे चित्त की वृत्तियाँ राजन्वती (सुशासित) होकर स्थिति को प्राप्त हो गई हैं। (9)

Verse 10#

pādāmbhojaṃ spṛśati bhajate raṅganāthasya jaṅghā-

पादाम्भोजं स्पृशति भजते रङ्गनाथस्य जङ्घा- मूरुद्वन्द्वे विलगति शनैरूर्ध्वमभ्येति नाभिम् वक्षस्यास्ते वलति भुजयोर्मामिकेयं मनीषा वक्त्राभिख्यां पिबति वहते वासनां मौलिबन्धे १०

pādāmbhojaṃ spṛśati bhajate raṅganāthasya jaṅghā- mūrudvandve vilagati śanairūrdhvamabhyeti nābhim | vakṣasyāste valati bhujayormāmikeyaṃ manīṣā vaktrābhikhyāṃ pibati vahate vāsanāṃ maulibandhe || 10 ||

Meaningमेरी यह बुद्धि रंगनाथ के चरण-कमल का स्पर्श एवं सेवन करती है, जंघा एवं ऊरु-युगल में लगती है, धीरे-धीरे ऊपर नाभि तक जाती है, वक्ष पर ठहरती है, भुजाओं पर विचरती है, मुख की शोभा का पान करती है, और किरीट-बन्ध में वासना (अनुराग) धारण करती है। (10)

Verse 11#

kāntodāararayairiha bhujaiḥ kaṅkaṇajyākiṇāṅkai-

कान्तोदाररयैरिह भुजैः कङ्कणज्याकिणाङ्कै- र्लक्ष्मीधाम्नः पृथुलपरिघैर्लक्षिता भीतिहेतिः अग्रे किञ्चिद्भुजगशयनः स्वात्मनैवात्मनः सन् मध्येरङ्गं मम हृदये वर्तते सावरोधः ११

kāntodāararayairiha bhujaiḥ kaṅkaṇajyākiṇāṅkai- rlakṣmīdhāmnaḥ pṛthulaparighairlakṣitā bhītihetiḥ | agre kiñcidbhujagaśayanaḥ svātmanaivātmanaḥ san madhyeraṅgaṃ mama ca hṛdaye vartate sāvarodhaḥ || 11 ||

Meaningयहाँ सर्पशायी भगवान् विराजमान हैं — उनकी भुजाएँ कान्त, उदार-वेग वाली, ज्या (धनुष-डोरी) के किणांक (घट्टे) से चिह्नित, लक्ष्मी-धाम के विशाल अर्गल-समान, तथा भय से रक्षा करने वाली आयुध-स्वरूप हैं; अपने ही आत्मा से अपने ही लिए विद्यमान वे श्रीरंगम के मध्य, और अब अपने परिवार सहित मेरे हृदय में भी, वास करते हैं। (11)

Verse 12#

raṅgāsthāne rasikamahite rañjitāśeṣacitte

रङ्गास्थाने रसिकमहिते रञ्जिताशेषचित्ते विद्वत्सेवाविमलमनसा वेङ्कटेशेन कॢप्तम् अक्लेशेन प्रणिहितधियामारुरुक्षोरवस्थां भक्तिं गाढां दिशतु भगवद्ध्यानसोपानमेतत् १२

raṅgāsthāne rasikamahite rañjitāśeṣacitte vidvatsevāvimalamanasā veṅkaṭeśena kḷptam | aktleśena praṇihitadhiyāmārurukṣoravasthāṃ bhaktiṃ gāḍhāṃ diśatu bhagavaddhyānasopānametat || 12 ||

Meaningयह भगवद्ध्यानसोपानम् — जिसे विद्वानों की सेवा से विमल-मन वेङ्कटेश (वेदान्त देशिक) ने श्रीरंगम के रसिक-पूजित, समस्त चित्त को रंजित करने वाले स्थान में रचा — उन प्रणिहित-बुद्धि वालों को, जो उस अवस्था तक चढ़ना चाहते हैं, अनायास ही गाढ़ भक्ति प्रदान करे। (12)

Verse 13#

|| iti śrīmadveṅkaṭeśāryapraṇītaṃ bhagavaddhyānasopānaṃ sampūrṇam ||

इति श्रीमद्वेङ्कटेशार्यप्रणीतं भगवद्ध्यानसोपानं सम्पूर्णम्

|| iti śrīmadveṅkaṭeśāryapraṇītaṃ bhagavaddhyānasopānaṃ sampūrṇam ||

Meaningइस प्रकार श्रीमद् वेङ्कटेशार्य (वेदान्त देशिक) द्वारा रचित भगवद्ध्यानसोपानम् सम्पूर्ण हुआ।

Word-by-Word Breakdown

अन्तर्ज्योतिः किमपि
antarjyotiḥ kimapi
कोई अनिर्वचनीय अन्तर्ज्योति
यमिनाम् अञ्जनं योगदृष्टेः
yaminām añjanaṃ yogadṛṣṭeḥ
संयमी मुनियों की योगदृष्टि का अञ्जन
चिन्तारत्नं
cintāratnaṃ
चिन्तारत्न (चिन्तामणि)
दैवतं दैवतानां
daivataṃ daivatānāṃ
देवों के भी देव
दृश्यते रङ्गमध्ये
dṛśyate raṅgamadhye
श्रीरंगम के मध्य दर्शन देते हैं
रङ्गभर्तुः पादाम्भोजं
raṅgabhartuḥ pādāmbhojaṃ
रंगनाथ के चरण-कमल
प्रतिफलति मे भावनादीर्घिकायाम्
pratiphalati me bhāvanādīrghikāyām
मेरी भावना-रूपी दीर्घिका में प्रतिफलित होते हैं
लक्ष्मीभूम्योः करसरसिजैः
lakṣmībhūmyoḥ karasarasijaiḥ
लक्ष्मी एवं भूमि के कर-कमलों से (चरण सहलाए जाते हैं)
जङ्घां दृष्ट्वा
jaṅghāṃ dṛṣṭvā
(भगवान् की) सुन्दर जंघाओं को देखकर
जननपदवीजाङ्घिकत्वं जहाति
jananapadavījāṅghikatvaṃ jahāti
मेरा मन '(बारंबार) जन्मों के मार्ग पर भटकना' त्याग देता है
ऊरुयुग्मं ... रङ्गयूनः
ūruyugmaṃ ... raṅgayūnaḥ
युवा रंगनाथ की ऊरु-युगल
रङ्गनाथस्य नाभिः
raṅganāthasya nābhiḥ
रंगनाथ की नाभि (जिससे ब्रह्मा का कमल उत्पन्न होता है)
वेधसो निर्मिमाणा
vedhaso nirmimāṇā
ब्रह्मा (सृष्टिकर्ता) को उत्पन्न करती हुई
श्रीवत्सेन प्रथितविभवं
śrīvatsena prathitavibhavaṃ
जिनकी महिमा श्रीवत्स चिह्न से (वक्ष पर) प्रसिद्ध है
वैजयन्त्या ... सान्द्रच्छायं
vaijayantyā ... sāndracchāyaṃ
ताज़ी तुलसी वाली वैजयन्ती माला से सान्द्र-छाया युक्त
अखिलप्रार्थनापारिजातम्
akhilaprārthanāpārijātam
समस्त प्रार्थनाओं को पूर्ण करने वाला पारिजात — भगवान् की भुजा
साभिप्रायस्मितविकसितं ... वक्त्रं
sābhiprāyasmitavikasitaṃ ... vaktraṃ
सार्थक मुस्कान से विकसित मुख
स्वागतोदारनेत्रम्
svāgatodāranetram
भक्त का प्रेमपूर्वक स्वागत करते विशाल नेत्रों सहित
रङ्गभर्तुः किरीटे
raṅgabhartuḥ kirīṭe
रंगनाथ के किरीट पर
भुजगशयनः
bhujagaśayanaḥ
जो सर्प (आदिशेष) पर शयन करते हैं
मम च हृदये वर्तते
mama ca hṛdaye vartate
और अब मेरे हृदय में भी वास करते हैं
भगवद्ध्यानसोपानम् एतत्
bhagavaddhyānasopānam etat
यह 'भगवान् के ध्यान की सीढ़ी' (स्तोत्र का नाम)

Origin & History

Source: Stotras of Swami Vedanta Desika (one of his three hymns on Lord Ranganatha of Srirangam)

Author: Swami Vedanta Desika (Venkatanatha / Venkateshacharya)

Period: 13th–14th century CE

स्वामी वेदान्त देशिक ने श्रीरंगम में भगवान् रंगनाथ — आदिशेष पर महान शयनमूर्ति विष्णु — की आराधना में भगवद्ध्यानसोपानम् की रचना की। तिरुप्पाणाळ्वार के तमिल 'अमलनादिपिरान्' के अनुसार — जिन्होंने भगवान् को चरण से मुख तक देखा और तत्पश्चात् किसी और वस्तु पर दृष्टि न डालने का संकल्प लिया — देशिक ने वही पादादि-केश (चरण-से-किरीट) दृष्टि सुन्दर संस्कृत श्लोकों में पिरोई। प्रत्येक श्लोक ध्यान करते मन को भगवान् के स्वरूप के एक-एक अंग पर ठहराता है, जिससे सम्पूर्ण स्तोत्र एक ध्यान की 'सीढ़ी' बन जाता है जिससे भक्त भगवान् से प्रेममय मिलन की ओर आरोहण करता है।

Frequently Asked Questions

'भगवद्ध्यानसोपानम्' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है 'भगवान् (भगवत्) के ध्यान (ध्यान) की सीढ़ी (सोपान)'। यह स्तोत्र इस प्रकार रचा गया है कि ध्यान करता हुआ मन भगवान् के दिव्य स्वरूप पर — चरण-कमल से लेकर किरीट तक — क्रमशः चढ़ता है, मानो उनसे मिलन के लक्ष्य की ओर सीढ़ियाँ चढ़ रहा हो।
इसकी रचना किसने और किस देवता पर की?
इसकी रचना स्वामी वेदान्त देशिक (वेङ्कटनाथ, 13वीं–14वीं सदी) ने की, जो महान श्री वैष्णव दार्शनिक-कवि थे। यह उनके केवल भगवान् रंगनाथ — श्रीरंगम में विष्णु के शयनरूप — को समर्पित तीन स्तोत्रों में से एक है, अभीति स्तवम् एवं न्यास तिलकम् के साथ।
यह आळ्वारों से कैसे जुड़ा है?
भगवद्ध्यानसोपानम् तिरुप्पाणाळ्वार के तमिल 'अमलनादिपिरान्' की भावना का अनुसरण करता है, जिन्होंने रंगनाथ की शोभा का चरण से मुख तक (पादादि-केश) गान किया। वेदान्त देशिक ने उसी चरण-से-किरीट क्रम में यह संस्कृत स्तोत्र रचा, उन आळ्वार की दृष्टि का सम्मान करते हुए।
अन्तिम श्लोक में कौन-सा फल वर्णित है?
बारहवाँ श्लोक (फलश्रुति) घोषित करता है कि यह स्तोत्र, अनायास ही, उन स्थिर-बुद्धि वालों को गाढ़ एवं तीव्र भक्ति प्रदान करेगा जो भगवान् से मिलन की अवस्था की ओर चढ़ना चाहते हैं — जिससे यह प्रेममय ध्यान की साधना का एक अनमोल साधन बन जाता है।

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