Mantra.Tips

श्री भगवद्ध्यानसोपानम् PDF

श्री भगवद्ध्यानसोपानम् की पूरी लिरिक्स — संस्कृत, रोमन व अर्थ सहित। एक क्लिक में PDF सेव करें या प्रिंट करें।

अन्तर्ज्योतिः किमपि यमिनामञ्जनं योगदृष्टे- श्चिन्तारत्नं सुलभमिह नः सिद्धिमोक्षानुरूपम् । दीनानाथव्यसनशमनं दैवतं दैवतानां दिव्यं चक्षुः श्रुतिपरिषदां दृश्यते रङ्गमध्ये ॥ १ ॥

antarjyotiḥ kimapi yaminām añjanaṃ yogadṛṣṭe- ścintāratnaṃ sulabhamiha naḥ siddhimokṣānurūpam | dīnānāthavyasanaśamanaṃ daivataṃ daivatānāṃ divyaṃ cakṣuḥ śrutipariṣadāṃ dṛśyate raṅgamadhye || 1 ||

वहाँ श्रीरंगम के मध्य दर्शन होता है — किसी अनिर्वचनीय अन्तर्ज्योति का, जो यमी (संयमी) मुनियों की योगदृष्टि का अञ्जन है, जो हमें यहाँ सुलभ चिन्तामणि है और सिद्धि एवं मोक्ष दोनों के अनुरूप है, जो दीन-अनाथों के दुःख का शमन करने वाला, देवों का भी देव तथा श्रुति-परिषद् का दिव्य नेत्र है। (1)

वेदातीतश्रुतिपरिमलं वेधसां मौलिसेव्यं प्रादुर्भूतं कनकसरितः सैकते हंसजुष्टे । लक्ष्मीभूम्योः करसरसिजैर्लालितं रङ्गभर्तुः पादाम्भोजं प्रतिफलति मे भावनादीर्घिकायाम् ॥ २ ॥

vedātītaśrutiparimalaṃ vedhasāṃ maulisevyaṃ prādurbhūtaṃ kanakasaritaḥ saikate haṃsajuṣṭe | lakṣmībhūmyoḥ karasarasijairlālitaṃ raṅgabhartuḥ pādāmbhojaṃ pratiphalati me bhāvanādīrghikāyām || 2 ||

मेरी भावना-रूपी दीर्घिका (सरोवर) में श्रीरंगनाथ के चरण-कमल प्रतिफलित होते हैं — जो वेद से भी परे की सुगन्ध एवं वेदों के परिमल-स्वरूप हैं, ब्रह्मादि के मुकुटों से सेव्य हैं, स्वर्ण-सरिता (कावेरी) के हंस-सेवित पुलिन पर प्रादुर्भूत हैं, तथा लक्ष्मी एवं भूमि के कर-कमलों से लालित हैं। (2)

चित्राकारां कटकरुचिभिश्चारुवृत्तानुपूर्वां काले दूत्यद्रुततरगतिं कान्तिलीलाकलाचीम् । जानुच्छायाद्विगुणसुभगां रङ्गभर्तुर्मदात्मा जङ्घां दृष्ट्वा जननपदवीजाङ्घिकत्वं जहाति ॥ ३ ॥

citrākārāṃ kaṭakarucibhiścāruvṛttānupūrvāṃ kāle dūtyadrutataragatiṃ kāntilīlākalācīm | jānucchāyādviguṇasubhagāṃ raṅgabharturmadātmā jaṅghāṃ dṛṣṭvā jananapadavījāṅghikatvaṃ jahāti || 3 ||

रंगनाथ की जंघाओं को देखकर — जो विचित्र आकृति वाली, सुन्दर-वृत्त एवं क्रमशः तनी हुई, समय पर दूत-समान द्रुतगामी, कान्ति एवं लीला से कलित, तथा घुटनों की आभा से द्विगुणित सुभग हैं — मेरा मुग्ध मन जन्म-पथ पर भटकने का स्वभाव त्याग देता है। (3)

कामारामस्थिरकदलिकास्तम्भसम्भावनीयं क्षौमाश्लिष्टं किमपि कमलाभूमिनीलोपधानम् । न्यञ्चत्काञ्चीकिरणरुचिरं निर्विशत्यूरुयुग्मं लावण्यौघद्वयमिव मतिर्मामिका रङ्गयूनः ॥ ४ ॥

kāmārāmasthirakadalikāstambhasambhāvanīyaṃ kṣaumāśliṣṭaṃ kimapi kamalābhūminīlopadhānam | nyañcatkāñcīkiraṇaruciraṃ nirviśatyūruyugmaṃ lāvaṇyaughadvayamiva matirmāmikā raṅgayūnaḥ || 4 ||

मेरी बुद्धि युवा रंगनाथ की ऊरु-युगल में प्रवेश करती है — जो काम के उद्यान के स्थिर कदली-स्तम्भों के समान सम्भावनीय, क्षौम (रेशम) से आवृत, लक्ष्मी के लिए अनिर्वचनीय नील उपधान (तकिया), तथा नीचे झरती मेखला की किरणों से रुचिर हैं — मानो दो लावण्य-धाराओं में। (4)

सम्प्रीणाति प्रतिकलमसौ मानसं मे सुजाता गम्भीरत्वात्क्वचन समये गूढनिक्षिप्तविश्वा । नालीकेन स्फुरितरजसा वेधसो निर्मिमाणा रम्यावर्तद्युतिसहचरी रङ्गनाथस्य नाभिः ॥ ५ ॥

samprīṇāti pratikalamasau mānasaṃ me sujātā gambhīratvātkvacana samaye gūḍhanikṣiptaviśvā | nālīkena sphuritarajasā vedhaso nirmimāṇā ramyāvartadyutisahacarī raṅganāthasya nābhiḥ || 5 ||

प्रत्येक क्षण रंगनाथ की सुजात नाभि मेरे मानस को आनन्दित करती है — जो इतनी गम्भीर है कि प्रलयकाल में समस्त विश्व को गूढ़ रूप से अपने भीतर रख लेती है, जो विकसित पराग वाले कमल से ब्रह्मा का निर्माण करती है, तथा रम्य आवर्त की द्युति की सहचरी है। (5)

श्रीवत्सेन प्रथितविभवं श्रीपदन्यासधन्यं मध्यं बाह्वोर्मणिवररुचा रञ्जितं रङ्गधाम्नः । सान्द्रच्छायं तरुणतुलसीचित्रया वैजयन्त्या सन्तापं मे शमयति धियश्चन्द्रिकोदारहारम् ॥ ६ ॥

śrīvatsena prathitavibhavaṃ śrīpadanyāsadhanyaṃ madhyaṃ bāhvormaṇivararucā rañjitaṃ raṅgadhāmnaḥ | sāndracchāyaṃ taruṇatulasīcitrayā vaijayantyā santāpaṃ me śamayati dhiyaścandrikodārahāram || 6 ||

रंगधाम के मध्य भाग (कटि) — जो श्रीवत्स से विभव-प्रसिद्ध, श्री के चरण-न्यास से धन्य, भुजाओं के बीच श्रेष्ठ मणियों की आभा से रंजित, ताज़ी तुलसी से विचित्र वैजयन्ती माला से सान्द्र-छाया वाला, तथा चन्द्रिका-समान उदार हार से युक्त है — मेरे मन के सन्ताप का शमन करता है। (6)

एकं लीलोपहितमितरं बाहुमाजानुलम्बं प्राप्तौ रङ्गे शयितुरखिलप्रार्थनापारिजातम् । दृप्ता सेयं दृढनियमिता रश्मिभिर्भूषणानां चिन्ताहस्तिन्यनुभवति मे चित्रमालानयन्त्रम् ॥ ७ ॥

ekaṃ līlopahitamitaraṃ bāhumājānulambaṃ prāptau raṅge śayiturakhilaprārthanāpārijātam | dṛptā seyaṃ dṛḍhaniyamitā raśmibhirbhūṣaṇānāṃ cintāhastinyanubhavati me citramālānayantram || 7 ||

शयन करते रंगनाथ की दो भुजाएँ — एक लीला से रखी, दूसरी घुटनों तक लम्बित, समस्त प्रार्थनाओं को पूर्ण करने वाला पारिजात — गर्वित होकर भी आभूषणों की किरणों से दृढ़तापूर्वक बँधी हैं; मेरी चिन्ता-रूपी हस्तिनी उन्हें विचित्र आलान-स्तम्भ के रूप में अनुभव करती है। (7)

साभिप्रायस्मितविकसितं चारुबिम्बाधरोष्ठं दुःखापायप्रणयिनि जने दूरदत्ताभिमुख्यम् । कान्तं वक्त्रं कनकतिलकालङ्कृतं रङ्गभर्तुः स्वान्ते गाढं विलगति मम स्वागतोदारनेत्रम् ॥ ८ ॥

sābhiprāyasmitavikasitaṃ cārubimbādharoṣṭhaṃ duḥkhāpāyapraṇayini jane dūradattābhimukhyam | kāntaṃ vaktraṃ kanakatilakālaṅkṛtaṃ raṅgabhartuḥ svānte gāḍhaṃ vilagati mama svāgatodāranetram || 8 ||

रंगनाथ का कान्त मुख — सार्थक मुस्कान से विकसित, सुन्दर बिम्ब-समान अधरोष्ठ वाला, दूर से ही दुःखी भक्त की ओर अभिमुख, स्वर्ण-तिलक से अलंकृत — अपने स्वागतपूर्ण उदार नेत्रों सहित मेरे हृदय में गाढ़ रूप से लग जाता है। (8)

माल्यैरन्तःस्थिरपरिमलैर्वल्लभास्पर्शमान्यैः कुप्यच्चोलीवचनकुटिलैः कुन्तलैः श्लिष्टमूले । रत्नापीडद्युतिशबलिते रङ्गभर्तुः किरीटे राजन्वत्यः स्थितिमधिगता वृत्तयश्चेतसो मे ॥ ९ ॥

mālyairantaḥsthiraparimalairvallabhāsparśamānyaiḥ kupyaccolīvacanakuṭilaiḥ kuntalaiḥ śliṣṭamūle | ratnāpīḍadyutiśabalite raṅgabhartuḥ kirīṭe rājanvatyaḥ sthitimadhigatā vṛttayaścetaso me || 9 ||

रंगनाथ के किरीट में — जिसका मूल उनके कुन्तलों (केशों) से वेष्टित है, तथा जो रत्नापीड की द्युति से शबल है — मेरे चित्त की वृत्तियाँ राजन्वती (सुशासित) होकर स्थिति को प्राप्त हो गई हैं। (9)

पादाम्भोजं स्पृशति भजते रङ्गनाथस्य जङ्घा- मूरुद्वन्द्वे विलगति शनैरूर्ध्वमभ्येति नाभिम् । वक्षस्यास्ते वलति भुजयोर्मामिकेयं मनीषा वक्त्राभिख्यां पिबति वहते वासनां मौलिबन्धे ॥ १० ॥

pādāmbhojaṃ spṛśati bhajate raṅganāthasya jaṅghā- mūrudvandve vilagati śanairūrdhvamabhyeti nābhim | vakṣasyāste valati bhujayormāmikeyaṃ manīṣā vaktrābhikhyāṃ pibati vahate vāsanāṃ maulibandhe || 10 ||

मेरी यह बुद्धि रंगनाथ के चरण-कमल का स्पर्श एवं सेवन करती है, जंघा एवं ऊरु-युगल में लगती है, धीरे-धीरे ऊपर नाभि तक जाती है, वक्ष पर ठहरती है, भुजाओं पर विचरती है, मुख की शोभा का पान करती है, और किरीट-बन्ध में वासना (अनुराग) धारण करती है। (10)

कान्तोदाररयैरिह भुजैः कङ्कणज्याकिणाङ्कै- र्लक्ष्मीधाम्नः पृथुलपरिघैर्लक्षिता भीतिहेतिः । अग्रे किञ्चिद्भुजगशयनः स्वात्मनैवात्मनः सन् मध्येरङ्गं मम च हृदये वर्तते सावरोधः ॥ ११ ॥

kāntodāararayairiha bhujaiḥ kaṅkaṇajyākiṇāṅkai- rlakṣmīdhāmnaḥ pṛthulaparighairlakṣitā bhītihetiḥ | agre kiñcidbhujagaśayanaḥ svātmanaivātmanaḥ san madhyeraṅgaṃ mama ca hṛdaye vartate sāvarodhaḥ || 11 ||

यहाँ सर्पशायी भगवान् विराजमान हैं — उनकी भुजाएँ कान्त, उदार-वेग वाली, ज्या (धनुष-डोरी) के किणांक (घट्टे) से चिह्नित, लक्ष्मी-धाम के विशाल अर्गल-समान, तथा भय से रक्षा करने वाली आयुध-स्वरूप हैं; अपने ही आत्मा से अपने ही लिए विद्यमान वे श्रीरंगम के मध्य, और अब अपने परिवार सहित मेरे हृदय में भी, वास करते हैं। (11)

रङ्गास्थाने रसिकमहिते रञ्जिताशेषचित्ते विद्वत्सेवाविमलमनसा वेङ्कटेशेन कॢप्तम् । अक्लेशेन प्रणिहितधियामारुरुक्षोरवस्थां भक्तिं गाढां दिशतु भगवद्ध्यानसोपानमेतत् ॥ १२ ॥

raṅgāsthāne rasikamahite rañjitāśeṣacitte vidvatsevāvimalamanasā veṅkaṭeśena kḷptam | aktleśena praṇihitadhiyāmārurukṣoravasthāṃ bhaktiṃ gāḍhāṃ diśatu bhagavaddhyānasopānametat || 12 ||

यह भगवद्ध्यानसोपानम् — जिसे विद्वानों की सेवा से विमल-मन वेङ्कटेश (वेदान्त देशिक) ने श्रीरंगम के रसिक-पूजित, समस्त चित्त को रंजित करने वाले स्थान में रचा — उन प्रणिहित-बुद्धि वालों को, जो उस अवस्था तक चढ़ना चाहते हैं, अनायास ही गाढ़ भक्ति प्रदान करे। (12)

॥ इति श्रीमद्वेङ्कटेशार्यप्रणीतं भगवद्ध्यानसोपानं सम्पूर्णम् ॥

|| iti śrīmadveṅkaṭeśāryapraṇītaṃ bhagavaddhyānasopānaṃ sampūrṇam ||

इस प्रकार श्रीमद् वेङ्कटेशार्य (वेदान्त देशिक) द्वारा रचित भगवद्ध्यानसोपानम् सम्पूर्ण हुआ।