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भीष्म स्तुति PDF

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इति मतिरुपकल्पिता वितृष्णा भगवति सात्वतपुङ्गवे विभूम्नि । स्वसुखमुपगते क्वचिद्विहर्तुं प्रकृतिमुपेयुषि यद्भवप्रवाहः ॥

iti matir-upakalpitā vitṛṣṇā bhagavati sātvata-puṅgave vibhūmni | sva-sukham-upagate kvacid-vihartuṃ prakṛtim-upeyuṣi yad-bhava-pravāhaḥ ||

इस प्रकार समस्त तृष्णा से रहित होकर मैं अपने मन को उस सर्वव्यापी सात्वतश्रेष्ठ भगवान् में लगाता हूँ, जो अपने ही आनन्द में मग्न रहते हुए कभी लीला हेतु अवतार लेकर रूप धारण करते हैं, और जिनसे यह समस्त संसार-प्रवाह उत्पन्न होता है।

त्रिभुवनकमनं तमालवर्णं रविकरगौरवराम्बरं दधाने । वपुरलककुलावृताननाब्जं विजयसखे रतिरस्तु मेऽनवद्या ॥

tri-bhuvana-kamanaṃ tamāla-varṇaṃ ravi-kara-gaura-varāmbaraṃ dadhāne | vapur-alaka-kulāvṛtānanābjaṃ vijaya-sakhe ratir-astu me'navadyā ||

मेरी निर्मल, निर्दोष प्रीति उन पर हो — जो अर्जुन के सखा हैं, तीनों लोकों में सर्वाधिक सुन्दर, तमालवृक्ष-सदृश श्यामवर्ण, सूर्य की किरणों-सी देदीप्यमान पीताम्बर धारण किए, जिनका कमल-मुख घुँघराले केशों से घिरा है।

युधि तुरगरजोविधूम्रविष्वक्- कचलुलितश्रमवार्यलङ्कृतास्ये । मम निशितशरैर्विभिद्यमान- त्वचि विलसत्कवचेऽस्तु कृष्ण आत्मा ॥

yudhi turaga-rajo-vidhūmra-viṣvak- kaca-lulita-śrama-vāry-alaṅkṛtāsye | mama niśita-śarair-vibhidyamāna- tvaci vilasat-kavace'stu kṛṣṇa ātmā ||

रणभूमि में, जिनका मुख घोड़ों के खुरों से उठी धूल से धूसर तथा श्रमजनित स्वेदबिन्दुओं से सुशोभित था, जिनकी त्वचा मेरे तीक्ष्ण बाणों से बिंध रही थी, जिनका कवच चमक रहा था — उन कृष्ण में मेरी आत्मा स्थित हो।

सपदि सखिवचो निशम्य मध्ये निजपरयोर्बलयो रथं निवेश्य । स्थितवति परसैनिकायुरक्ष्णा हृतवति पार्थसखे रतिर्ममास्तु ॥

sapadi sakhi-vaco niśamya madhye nija-parayor-balayo rathaṃ niveśya | sthitavati para-sainikāyur-akṣṇā hṛtavati pārtha-sakhe ratir-mamāstu ||

अपने सखा (अर्जुन) के वचन सुनते ही जिन्होंने दोनों सेनाओं के बीच रथ खड़ा कर दिया, और वहीं अपनी दृष्टिमात्र से शत्रुपक्ष के सैनिकों की आयु हर ली — उन पार्थसखा में मेरी प्रीति हो।

व्यवहितपृतनामुखं निरीक्ष्य स्वजनवधाद्विमुखस्य दोषबुद्ध्या । कुमतिमहरदात्मविद्यया यश्- चरणरतिः परमस्य तस्य मेऽस्तु ॥

vyavahita-pṛtanā-mukhaṃ nirīkṣya sva-jana-vadhād-vimukhasya doṣa-buddhyā | kumatim-aharad-ātma-vidyayā yaś- caraṇa-ratiḥ paramasya tasya me'stu ||

जब मुझे सेना के अग्रभाग में देखकर अर्जुन स्वजनों के वध से विमुख हो गए, इसे पाप समझकर, तब जिन्होंने आत्मविद्या के उपदेश से उनकी कुमति (मोह) हर ली — उन परमेश्वर के चरणों में मेरी रति हो।

स्वनिगममपहाय मत्प्रतिज्ञा- मृतमधिकर्तुमवप्लुतो रथस्थः । धृतरथचरणोऽभ्ययाच्चलद्गु- र्हरिरिव हन्तुमिभं गतोत्तरीयः ॥

sva-nigamam-apahāya mat-pratijñām- ṛtam-adhi-kartum-avapluto ratha-sthaḥ | dhṛta-ratha-caraṇo'bhyayāc-calad-gur- harir-iva hantum-ibhaṃ gatottarīyaḥ ||

मेरी प्रतिज्ञा को सत्य करने के लिए जिन्होंने अपनी प्रतिज्ञा (अस्त्र न उठाने की) त्याग दी — रथ से कूदकर, रथचक्र उठाकर, उत्तरीय गिराते हुए, पृथ्वी को कँपाते हुए, सिंह के हाथी पर झपटने के समान मुझ पर दौड़े।

शितविशिखहतो विशीर्णदंशः क्षतजपरिप्लुत आततायिनो मे । प्रसभमभिससार मद्वधार्थं स भवतु मे भगवान्गतिर्मुकुन्दः ॥

śita-viśikha-hato viśīrṇa-daṃśaḥ kṣataja-paripluta ātatāyino me | prasabham-abhisasāra mad-vadhārthaṃ sa bhavatu me bhagavān-gatir-mukundaḥ ||

मेरे तीक्ष्ण बाणों से आहत, कवच छिन्न-भिन्न, शरीर रक्त से सना हुआ — वे आततायी मुझ पर मेरा वध करने हेतु वेग से दौड़े; वे ही भगवान् मुकुन्द मेरी गति हों।

विजयरथकुटुम्ब आत्ततोत्रे धृतहयरश्मिनि तच्छ्रियेक्षणीये । भगवति रतिरस्तु मे मुमूर्षो- र्यमिह निरीक्ष्य हता गताः स्वरूपम् ॥

vijaya-ratha-kuṭumba ātta-totre dhṛta-haya-raśmini tac-chriyekṣaṇīye | bhagavati ratir-astu me mumūrṣor- yam-iha nirīkṣya hatā gatāḥ sva-rūpam ||

इस मृत्यु के समय मेरी प्रीति उन भगवान् में हो, जो अर्जुन के रथ के अश्वों की रास और चाबुक धारण किए हैं, जिनकी शोभा अनुपम है — जिन्हें यहाँ रणभूमि में देखकर प्राण त्यागने वाले उन्हीं के स्वरूप को प्राप्त हुए।

ललितगतिविलासवल्गुहास- प्रणयनिरीक्षणकल्पितोरुमानाः । कृतमनुकृतवत्य उन्मदान्धाः प्रकृतिमगन्किल यस्य गोपवध्वः ॥

lalita-gati-vilāsa-valgu-hāsa- praṇaya-nirīkṣaṇa-kalpitoru-mānāḥ | kṛtam-anu-kṛtavatya unmadāndhāḥ prakṛtim-agan-kila yasya gopa-vadhvaḥ ||

जिनकी मनोहर चाल, सुन्दर मुस्कान और प्रेमभरी चितवन से व्रज की गोपियाँ गर्वित हो उठीं, और प्रेमोन्माद में जिनकी प्रत्येक चेष्टा का अनुकरण करती हुई उनके ही स्वरूप को प्राप्त हुईं — उन प्रभु में मेरा मन रमे।

मुनिगणनृपवर्यसङ्कुलेऽन्तः सदसि युधिष्ठिरराजसूय एषाम् । अर्हणमुपपेद ईक्षणीयो मम दृशिगोचर एष आविरात्मा ॥

muni-gaṇa-nṛpa-varya-saṅkule'ntaḥ sadasi yudhiṣṭhira-rāja-sūya eṣām | arhaṇam-upapeda īkṣaṇīyo mama dṛśi-gocara eṣa āvir-ātmā ||

ऋषियों और श्रेष्ठ नरेशों से भरी राजा युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ की महान् सभा में जिन्हें सर्वप्रथम अग्रपूजा के योग्य चुना गया — वही परमात्मा आज मेरे नेत्रों के समक्ष प्रकट हैं।

तमिममहमजं शरीरभाजां हृदि हृदि धिष्ठितमात्मकल्पितानाम् । प्रतिदृशमिव नैकधार्कमेकं समधिगतोऽस्मि विधूतभेदमोहः ॥

tam-imam-aham-ajaṃ śarīra-bhājāṃ hṛdi hṛdi dhiṣṭhitam-ātma-kalpitānām | prati-dṛśam-iva naikadhārkam-ekaṃ samadhigato'smi vidhūta-bheda-mohaḥ ||

वे अजन्मा प्रभु प्रत्येक देहधारी के हृदय में अन्तरात्मा रूप से स्थित हैं, एक होते हुए भी अनेक से प्रतीत होते हैं — जैसे एक ही सूर्य अनेक नेत्रों में प्रतिबिम्बित होता है। भेद के मोह से रहित होकर अब मैंने उन्हें प्राप्त कर लिया है।