चतुःश्लोकी PDF
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कान्तस्ते पुरुषोत्तमः फणिपतिः शय्यासनं वाहनं वेदात्मा विहगेश्वरो यवनिका माया जगन्मोहिनी । ब्रह्मेशादिसुरव्रजः सदयितस्त्वद्दासदासीगणः श्रीरित्येव च नाम ते भगवति ब्रूमः कथं त्वां वयम् ॥ १ ॥
kāntaste puruṣottamaḥ phaṇipatiḥ śayyāsanaṃ vāhanaṃ vedātmā vihageśvaro yavanikā māyā jaganmohinī | brahmeśādisuravrajaḥ sadayitastvaddāsadāsīgaṇaḥ śrīrityeva ca nāma te bhagavati brūmaḥ kathaṃ tvāṃ vayam || 1 ||
हे भगवति! आपके पति पुरुषोत्तम (नारायण) हैं, नागराज शेष आपकी शय्या एवं आसन हैं, वेदस्वरूप पक्षिराज गरुड़ आपका वाहन हैं, जगन्मोहिनी माया आपकी यवनिका (परदा) है; ब्रह्मा, शिव आदि देवगण अपनी पत्नियों सहित आपके दास-दासियों का समूह हैं, और 'श्री' ही आपका नाम है — तब हम आपका वर्णन कैसे करें?
यस्यास्ते महिमानमात्मन इव त्वद्वल्लभोऽपि प्रभुर् नालं मातुमियत्तया निरवधिं नित्यानुकूलं स्वतः । तां त्वां दास इति प्रपन्न इति च स्तोष्याम्यहं निर्भयो लोकैकेश्वरि लोकनाथदयिते दान्ते दयां ते विदन् ॥ २ ॥
yasyāste mahimānamātmana iva tvadvallabho'pi prabhur nālaṃ mātumiyattayā niravadhiṃ nityānukūlaṃ svataḥ | tāṃ tvāṃ dāsa iti prapanna iti ca stoṣyāmyahaṃ nirbhayo lokaikeśvari lokanāthadayite dānte dayāṃ te vidan || 2 ||
जिसकी महिमा को आपके प्रियतम सर्वसमर्थ प्रभु भी अपनी ही महिमा के समान पूर्ण रूप से नहीं माप सकते — जो असीम और स्वभाव से नित्य अनुकूल है — उन आपको, हे लोकैकेश्वरि! हे लोकनाथ की प्रिया! जितेन्द्रियों पर भी की गई आपकी दया को जानकर, मैं निर्भय होकर 'दास' और 'शरणागत' कहकर स्तुति करूँगा।
ईषत्त्वत्करुणानिरीक्षणसुधासन्धुक्षणाद्रक्ष्यते नष्टं प्राक्तदलाभतस्त्रिभुवनं सम्प्रत्यनन्तोदयम् । श्रेयो न ह्यरविन्दलोचनमनःकान्ताप्रसादादृते संसृत्यक्षरवैष्णवाध्वसु नृणां सम्भाव्यते कर्हिचित् ॥ ३ ॥
īṣattvatkaruṇānirīkṣaṇasudhāsandhukṣaṇādrakṣyate naṣṭaṃ prāktadalābhatastribhuvanaṃ sampratyanantodayam | śreyo na hyaravindalocanamanaḥkāntāprasādādṛte saṃsṛtyakṣaravaiṣṇavādhvasu nṛṇāṃ sambhāvyate karhicit || 3 ||
आपकी थोड़ी-सी करुणामयी दृष्टिरूपी अमृत के सिंचन से, पहले उसके अभाव में नष्ट हुए तीनों लोक अब रक्षित होकर अनन्त उन्नति को प्राप्त हैं। कमलनयन प्रभु के हृदय की प्रिया (लक्ष्मी) के प्रसाद के बिना, मनुष्यों को संसार, कैवल्य अथवा वैष्णव-सेवा के मार्ग पर कभी कल्याण नहीं हो सकता।
शान्तानन्तमहाविभूति परमं यद्ब्रह्म रूपं हरेर् मूर्तं ब्रह्म ततोऽपि तत्प्रियतरं रूपं यदत्यद्भुतम् । यान्यन्यानि यथासुखं विहरतो रूपाणि सर्वाणि तान्य् आहुः स्वैरनुरूपरूपविभवैर्गाढोपगूढानि ते ॥ ४ ॥
śāntānantamahāvibhūti paramaṃ yadbrahma rūpaṃ harer mūrtaṃ brahma tato'pi tatpriyataraṃ rūpaṃ yadatyadbhutam | yānyanyāni yathāsukhaṃ viharato rūpāṇi sarvāṇi tāny āhuḥ svairanurūparūpavibhavairgāḍhopagūḍhāni te || 4 ||
हरि का जो शान्त, अनन्त, महाविभूतिमय परम ब्रह्मस्वरूप है, उससे भी प्रियतर जो अत्यन्त अद्भुत मूर्त ब्रह्म (दिव्य विग्रह) है, तथा जो अन्य समस्त रूप वे लीला हेतु धारण करते हैं — ये सभी रूप, ऋषि कहते हैं, अपने-अपने अनुरूप वैभव के साथ आपसे सघन रूप से आलिंगित (अभिन्न) हैं।