दृष्टिपूतं न्यसेत्पादम् PDF
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दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्। सत्यपूतं वदेद्वाक्यं मनःपूतं समाचरेत्॥
dṛṣṭi-pūtaṁ nyaset pādaṁ vastra-pūtaṁ jalaṁ pibet। satya-pūtaṁ vaded vākyaṁ manaḥ-pūtaṁ samācaret॥
देखकर ही (भूमि को दृष्टि से शुद्ध करके) पैर रखो; वस्त्र से छानकर ही जल पिओ; सत्य से शुद्ध वचन ही बोलो; और मन से विचार कर शुद्ध आचरण ही करो। यह श्लोक सजग जीवन की चार साधनाएँ बताता है — सावधान पग, स्वच्छ जल, सत्य वाणी और विचारपूर्ण कर्म — ताकि मनुष्य किसी को हानि न पहुँचाए और पवित्रता से जिए।