एकदन्त स्तोत्रम् (एकदन्तशरणागति स्तोत्रम्) — Word-by-Word Meaning
एकदन्त स्तोत्रम् (एकदन्तशरणागति स्तोत्रम्)
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
तम् एकदन्तं शरणं व्रजामः
tam ekadantaṁ śaraṇaṁ vrajāmaḥ
उस एकदन्त (एक दाँत वाले प्रभु) की हम शरण लेते हैं — प्रत्येक श्लोक के अन्त में आने वाली टेक
सदात्मरूपम्
sadātma-rūpam
सदात्मस्वरूप — नित्य सत् (अस्तित्व) के स्वरूप वाले
सकलादिभूतम्
sakalādi-bhūtam
सकलादिभूत — समस्त विद्यमान के आदिस्रोत
अमायिनम्
amāyinam
अमायी — माया से परे, मायारहित
अचिन्त्यबोधम्
achintya-bodham
अचिन्त्यबोध — अचिन्त्य चैतन्य / अकल्पनीय बोधस्वरूप
अनादिमध्यान्तविहीनम्
anādi-madhyānta-vihīnam
अनादि-मध्य-अन्त से रहित — आदि, मध्य और अन्त से रहित
अनन्तचिद्रूपमयम्
ananta-chid-rūpa-mayam
अनन्तचिद्रूपमय — अनन्त शुद्ध चैतन्य (चित्) के स्वरूपमय
अभेदभेदादिविहीनम्
abheda-bhedādi-vihīnam
अभेद-भेद आदि से रहित — भेद, अभेद और समस्त भेदों से रहित
समाधिसंस्थम्
samādhi-saṁstham
समाधिसंस्थ — योगियों की समाधि (गहन ध्यान) में स्थित
निरालम्बसमाधिगम्यम्
nirālamba-samādhi-gamyam
निरालम्बसमाधिगम्य — निरालम्ब (निराधार) समाधि से प्राप्य
तुरीयकम्
turīyakam
तुरीयक — तुरीय, जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति से परे चतुर्थ अवस्था
त्वदाज्ञया
tvad-ājñayā
त्वदाज्ञया — आपकी आज्ञा / आदेश से
सृष्टिकरो विधाता
sṛṣṭi-karo vidhātā
सृष्टिकर विधाता — ब्रह्मा सृष्टिकर्ता (आपकी आज्ञा से कार्य करते हैं)
पालक एव विष्णुः
pālaka eva viṣṇuḥ
पालक एव विष्णुः — विष्णु पालक (आपकी आज्ञा से पालन करते हैं)
संहरको हरः
saṁharako haraḥ
संहरक हरः — हर (शिव) संहारक (आपकी आज्ञा से संहार करते हैं)
वरदं भो वृणुत
varadaṁ bho vṛṇuta
वरदं भो वृणुत — 'वर माँगो!' — स्तोत्र से प्रसन्न एकदन्त का उत्तर
एकविंशतिवारम्
ekaviṁśati-vāram
एकविंशतिवार — इक्कीस बार (पाठ का विहित संख्याक्रम)
असाध्यं साधयेत्
asādhyaṁ sādhayet
असाध्यं साधयेत् — असाध्य को भी सिद्ध कर लेता है
ब्रह्मभूतः स वै नरः
brahma-bhūtaḥ sa vai naraḥ
ब्रह्मभूतः स वै नरः — वह मनुष्य निश्चय ही ब्रह्मरूप हो जाता है
Complete Translation
श्रीगणेश को नमस्कार। देवों और ऋषियों ने कहा:
जो सदा सत्स्वरूप, समस्त के आदिकारण, माया से रहित, अचिन्त्य बोधस्वरूप 'सोऽहम्', आदि-मध्य-अन्त से रहित एकमेव हैं — उस एकदन्त की हम शरण लेते हैं।
जो अनन्त चिद्रूपमय गणेश हैं, भेद-अभेद आदि से रहित आदिपुरुष, हृदय में प्रकाश के धारक, हमारी बुद्धि में स्थित — उस एकदन्त की हम शरण लेते हैं।
जिन्हें योगीजन हृदय की समाधि में प्रकाशरूप से विभासित देखते हैं, जो सदा निरालम्ब समाधि से प्राप्य हैं — उस एकदन्त की हम शरण लेते हैं।
जो अपने बिम्बभाव से विलासयुक्त, प्रत्यक्ष विविधरूपा माया को अपना वीर्य (शक्ति) प्रदान करते हैं — उस एकदन्त की हम शरण लेते हैं।
जिनके वीर्य से समर्थ हुई स्वमाया द्वारा यह विश्व रचा गया है, जो तुरीय अर्थात् आत्मप्रतीति-संज्ञक हैं — उस एकदन्त की हम शरण लेते हैं।
आपकी आज्ञा से समस्त ग्रह प्रकाशित होते हैं और आकाश में ज्योतियाँ विभासित होती हैं, नित्य अपने विहार-कार्य में भ्रमण करती हैं — उस एकदन्त की हम शरण लेते हैं।
आपकी आज्ञा से विधाता सृष्टि करते हैं, आपकी आज्ञा से विष्णु पालन करते हैं, और आपकी आज्ञा से हर (शिव) भी संहार करते हैं — उस एकदन्त की हम शरण लेते हैं।
जिनकी आज्ञा से स्वर्गस्थ देवगण नित्य कर्मफल देते हैं, जिनकी आज्ञा से पर्वतगण स्थिर रहते हैं — उस एकदन्त की हम शरण लेते हैं।
जिनके भीतर एकदन्त स्थित हैं, जिनकी आज्ञा से यह सब विभासित होता है, अनन्तरूप, हृदय में बोध कराने वाले — उस एकदन्त की हम शरण लेते हैं।
जो सुयोगी योगबल से साध्य को सिद्ध करते हैं, उनकी स्तवन से कौन स्तुति कर सकता है? अतः प्रणाम से ही सुसिद्धि देने वाले हों — उस एकदन्त की हम शरण लेते हैं।
एकदन्त बोले: हे देवों और ऋषिगणों! मैं इस स्तोत्र से प्रसन्न हूँ। वर माँगो, मैं तुम्हारा मनोवांछित दूँगा।
तुम्हारे द्वारा रचित मेरा यह स्तोत्र प्रीतिप्रद है और समस्त सिद्धियों को देने वाला होगा — इसमें सन्देह नहीं।
जो मनुष्य इन इक्कीस श्लोकों को इक्कीस बार, हृदय में मेरा स्मरण करते हुए, इक्कीस दिन तक पढ़ता है —
उसके लिए तीनों लोकों में कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता; वह असाध्य को भी साध लेता है और सर्वत्र विजयी होता है।
जो नित्य इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह मनुष्य ब्रह्मरूप हो जाता है, और उसके दर्शन से समस्त देव पवित्र हो जाते हैं।
इस प्रकार श्रीमुद्गलपुराण का एकदन्तशरणागति स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ।
Origin & History
Source: Mudgala Purana (Second Khanda, Chapter 3)
Author: Traditional; spoken by the Devarshis (gods and sages), narrated by Gritsamada / Mudgala
Period: Puranic
श्रीमुद्गलपुराण में — गणेश के अवतारों को समर्पित महान् गाणपत्य ग्रन्थ में — देव और ऋषि, एकदन्त के माहात्म्य से अभिभूत होकर, यह पूर्ण शरणागति का स्तोत्र अर्पित करते हैं। उनकी पर्याप्त स्तुति में असमर्थ होकर वे श्लोक-दर-श्लोक उन्हें उस परब्रह्म के रूप में शरण लेते हैं जिनसे और जिनकी आज्ञा से समस्त सृष्टि प्रवृत्त होती है। प्रसन्न होकर एकदन्त प्रकट होते हैं, उनकी स्तुति स्वीकार करते हैं, और वर देते हैं कि जो इसे विधिपूर्वक पढ़ेगा वह समस्त सिद्धि और ब्रह्म से एकत्व प्राप्त करेगा।
Frequently Asked Questions
एकदन्त स्तोत्रम् क्या है?▼
यह श्रीमुद्गलपुराण का एकदन्तशरणागति स्तोत्र है, जिसमें एकत्रित देव और ऋषि (देवर्षि) गणेश को 'एकदन्त', एक दाँत वाले परब्रह्म के रूप में शरण लेते हैं। प्रत्येक श्लोक 'तम् एकदन्तं शरणं व्रजामः' — 'उस एकदन्त की हम शरण लेते हैं' — से समाप्त होता है।
गणेश को एकदन्त क्यों कहा जाता है?▼
एकदन्त का अर्थ है 'एक दाँत वाले'। परम्परा के अनुसार गणेश ने एक दाँत तोड़ा (अथवा परशुराम के साथ युद्ध में खोया) और उससे व्यास के निर्देशन में महाभारत लिखा। इस स्तोत्र में एकदन्त एकमेव अद्वैत सत्ता का भी प्रतीक है।
एकदन्त स्तोत्रम् का फल पाने के लिए इसका पाठ कैसे करें?▼
स्तोत्र की अपनी फलश्रुति विधान करती है कि इसके श्लोकों का इक्कीस बार प्रतिदिन, इक्कीस दिन तक, हृदय में गणेश का स्मरण करते हुए पाठ किया जाए। इसका वचन है कि तब भक्त अप्राप्य को भी प्राप्त कर लेता है और सर्वत्र विजयी होता है।
यह स्तोत्र अन्य गणेश स्तोत्रों से कैसे भिन्न है?▼
यह अत्यन्त तत्त्वपरक है: गणेश के रूप का वर्णन करने के बजाय यह उन्हें निराकार परम तत्त्व — सत्स्वरूप, अनन्त चैतन्य, तुरीय अवस्था — के रूप में चिन्तन करता है, जिनकी एकमात्र आज्ञा से ब्रह्मा, विष्णु और शिव सृष्टि, पालन और संहार करते हैं।
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