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एष ब्रह्मा च विष्णुश्च — Word-by-Word Meaning

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

एष
Esha
यह (यही सूर्य)
ब्रह्मा
Brahma
ब्रह्मा (सृष्टिकर्ता)
च विष्णुः च
cha Vishnuh cha
और विष्णु (पालनकर्ता)
शिवः
Shivah
शिव (कल्याणकारी, संहारकर्ता)
स्कन्दः
Skandah
स्कन्द (कार्तिकेय, युद्ध-देव)
प्रजापतिः
Prajapatih
प्रजापति, प्राणियों के स्वामी
महेन्द्रः
Mahendrah
महेन्द्र, देवों के राजा
धनदः
Dhanadah
धनद कुबेर, धन के दाता
कालः
Kalah
काल, स्वयं समय
यमः
Yamah
यम, मृत्यु और धर्म के स्वामी
सोमः
Somah
सोम, चन्द्रमा
हि अपां पतिः
hi apam patih
और निश्चय ही वरुण, जल के स्वामी

Complete Translation

यह सूर्य ही ब्रह्मा, विष्णु और शिव है; यही स्कन्द और प्रजापति है; यही महेन्द्र, कुबेर (धनद), काल, यम, सोम (चन्द्र) और वरुण (जल का स्वामी) है।

Origin & History

Source: Aditya Hridayam, verse 8 (Valmiki Ramayana, Yuddha Kanda)

Author: Sage Valmiki (recorded); taught by Sage Agastya

Period: Ancient (Treta Yuga traditionally)

लंका के रणक्षेत्र में, जब राम अजेय प्रतीत होते रावण के समक्ष थके खड़े थे, तब महर्षि अगस्त्य देखते हुए देवों के बीच से उतरे और आदित्य हृदयम् — सूर्य का हृदय — प्रकट किया। इस अष्टम श्लोक में ऋषि घोषणा करते हैं कि सूर्य ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव और समस्त देवों का स्वरूप है, जिससे सूर्य की उपासना में राम ने उन सभी की उपासना की। इस स्तोत्र से बलशाली होकर राम ने रावण का वध किया।

Frequently Asked Questions

'एष ब्रह्मा च विष्णुश्च' का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है 'यह (सूर्य) ब्रह्मा और विष्णु है' और आगे यह शिव, स्कन्द, प्रजापति, इन्द्र, कुबेर, काल, यम, सोम और वरुण को नाम देता है। यह श्लोक घोषित करता है कि सूर्य समस्त महान देवों का स्वरूप है।
यह श्लोक किस स्तोत्र से है?
यह वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड में आए आदित्य हृदयम् (आदित्य हृदय स्तोत्र) का अष्टम श्लोक है, जिसे महर्षि अगस्त्य ने रावण के साथ अन्तिम युद्ध से पूर्व श्रीराम को सिखाया।
यह श्लोक इतना महत्त्वपूर्ण क्यों है?
यही इस विश्वास का शास्त्रीय आधार है कि सूर्य की उपासना समस्त देवों की उपासना है। चूँकि यहाँ सूर्य को ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि के साथ एक माना गया है, आदित्य हृदयम् का पाठ एक साथ प्रत्येक देव का सम्मान माना जाता है।
इसका पाठ कब करना चाहिए?
सूर्योदय के समय सूर्य की ओर मुख करके, विशेषकर रविवार, रथसप्तमी और मकर संक्रान्ति पर, तथा किसी भी महत्त्वपूर्ण कार्य से पूर्व — ठीक वैसे ही जैसे अगस्त्य ने विजय की पूर्वसन्ध्या पर राम को यह सिखाया था।

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