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गणेशाष्टकम् PDF

गणेशाष्टकम् की पूरी लिरिक्स — संस्कृत, रोमन व अर्थ सहित। एक क्लिक में PDF सेव करें या प्रिंट करें।

यतोऽनन्तशक्तेरनन्ताश्च जीवा यतो निर्गुणादप्रमेया गुणास्ते । यतो भाति सर्वं त्रिधा भेदभिन्नं सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥

Yato'nanta-shakter ananta-shcha jiva Yato nirgunad aprameya gunaste Yato bhati sarvam tridha bhedabhinnam Sada tam ganesham namamo bhajamah

जिस अनन्त-शक्ति से अनन्त जीव उत्पन्न होते हैं; जिस निर्गुण से सृष्टि के अप्रमेय गुण प्रकट होते हैं; जिससे यह समस्त त्रिविध भेदों में विभक्त जगत् प्रकाशित होता है — उस गणेश को हम सदा प्रणाम एवं भजन करते हैं।

यतश्चाविरासीज्जगत्सर्वमेतत् तथाब्जासनो विश्वगो विश्वगोप्ता । तथेन्द्रादयो देवसङ्घा मनुष्याः सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥

Yata-shchavirasij jagat sarvam etat Tathabjasano vishvago vishvagopta Tathendradayo devasangha manushyah Sada tam ganesham namamo bhajamah

जिससे यह समस्त जगत् प्रकट हुआ, तथा कमलासन ब्रह्मा, विश्वव्यापी रक्षक विष्णु, एवं इन्द्रादि देवगण एवं मनुष्य — उस गणेश को हम सदा प्रणाम एवं भजन करते हैं।

यतो वह्निभानू भवो भूर्जलं च यतः सागराश्चन्द्रमा व्योम वायुः । यतः स्थावरा जङ्गमा वृक्षसङ्घाः सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥

Yato vahnibhanu bhavo bhurjalam cha Yatah sagara-shchandrama vyoma vayuh Yatah sthavara jangama vriksha-sanghah Sada tam ganesham namamo bhajamah

जिससे अग्नि एवं सूर्य, सृष्टि, पृथ्वी एवं जल; जिससे सागर, चन्द्रमा, आकाश एवं वायु; जिससे स्थावर-जंगम प्राणी एवं समस्त वृक्ष — उस गणेश को हम सदा प्रणाम एवं भजन करते हैं।

यतो दानवाः किन्नरा यक्षसङ्घा यतश्चारणा वारणाः श्वापदाश्च । यतः पक्षिकीटा यतो वीरुधश्च सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥

Yato danavah kinnara yaksha-sangha Yata-shcharana varanah shvapada-shcha Yatah pakshikita yato virudha-shcha Sada tam ganesham namamo bhajamah

जिससे दानव, किन्नर एवं यक्षगण; जिससे चारण, हाथी एवं हिंसक पशु; जिससे पक्षी एवं कीट, एवं जिससे लताएँ — उस गणेश को हम सदा प्रणाम एवं भजन करते हैं।

यतो बुद्धिरज्ञाननाशो मुमुक्षोः यतः सम्पदो भक्तसन्तोषिकाः स्युः । यतो विघ्ननाशो यतः कार्यसिद्धिः सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥

Yato buddhir ajnana-nasho mumukshoh Yatah sampado bhakta-santoshikah syuh Yato vighnanasho yatah karyasiddhih Sada tam ganesham namamo bhajamah

जिससे मुमुक्षु को बुद्धि एवं अज्ञान का नाश; जिससे भक्तों को सन्तोष देने वाली सम्पत्ति; जिससे विघ्नों का नाश एवं कार्य की सिद्धि — उस गणेश को हम सदा प्रणाम एवं भजन करते हैं।

यतः पुत्रसम्पद्यतो वाञ्छितार्थो यतोऽभक्तविघ्नास्तथानेकरूपाः । यतः शोकमोहौ यतः काम एव सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥

Yatah putra-sampad yato vanchhitartho Yato'bhakta-vighnas tathaneka-rupah Yatah shoka-mohau yatah kama eva Sada tam ganesham namamo bhajamah

जिससे पुत्र-सम्पत्ति एवं वाञ्छित अर्थ; जिससे अभक्तों के लिए अनेक रूप के विघ्न; जिससे शोक एवं मोह, एवं जिससे काम — उस गणेश को हम सदा प्रणाम एवं भजन करते हैं।

यतोऽनन्तशक्तिः स शेषो बभूव धराधारणेऽनेकरूपे च शक्तः । यतोऽनेकधा स्वर्गलोका हि नानाः सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥

Yato'nanta-shaktih sa shesho babhuva Dharadharane'neka-rupe cha shaktah Yato'nekadha svarga-loka hi nanah Sada tam ganesham namamo bhajamah

जिससे अनन्त-शक्ति शेषनाग प्रकट हुए, जो अनेक रूपों में पृथ्वी को धारण करने में समर्थ हैं; जिससे अनेक प्रकार के नाना स्वर्गलोक हुए — उस गणेश को हम सदा प्रणाम एवं भजन करते हैं।

यतो वेदवाचो विकुण्ठा मनोभिः सदा नेति नेतीति यत्ता गृणन्ति । परब्रह्मरूपं चिदानन्दभूतं सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥

Yato vedavacho vikuntha manobhih Sada neti netiti yatta grinanti Parabrahma-rupam chidananda-bhutam Sada tam ganesham namamo bhajamah

जिससे वेद-वाणी मन सहित विमुख होकर सदा 'नेति-नेति' कहती हुई स्तुति करती है — उस परब्रह्मस्वरूप, चिदानन्दमय को — उस गणेश को हम सदा प्रणाम एवं भजन करते हैं।

पुनश्चेदमष्टकं भक्तियुक्तो पठेद्यो नरो भक्तिभावेन नित्यम् । इह श्रीसमृद्धिं परत्रापि मुक्तिं लभेद्भक्तियुक्तः स्तुतो येन देवः ॥

Punash chedam ashtakam bhaktiyukto Pathedyo naro bhaktibhavena nityam Iha shri-samriddhim paratrapi muktim Labhed bhaktiyuktah stuto yena devah

जो मनुष्य भक्तियुक्त होकर इस अष्टक का नित्य प्रेमपूर्वक पाठ करता है, वह इस लोक में श्री-समृद्धि एवं परलोक में मुक्ति प्राप्त करता है — क्योंकि इससे स्वयं देव की स्तुति की गई है।