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गायत्री कवचम् PDF

गायत्री कवचम् की पूरी लिरिक्स — संस्कृत, रोमन व अर्थ सहित। एक क्लिक में PDF सेव करें या प्रिंट करें।

अस्य श्रीगायत्रीकवचस्य ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा ऋषयः। ऋग्यजुःसामाथर्वाणि छन्दांसि। परब्रह्मस्वरूपिणी गायत्री देवता। तद्बीजम्। भर्गः शक्तिः। धियः कीलकम्। मोक्षार्थे जपे विनियोगः॥

Asya Shri Gayatri Kavachasya Brahma Vishnu Maheshvara Rishayah Rig Yajuh Sama Atharvani Chhandamsi Parabrahma Svarupini Gayatri Devata Tad Bijam Bhargah Shaktih Dhiyah Kilakam Mokshartthe Jape Viniyogah

इस श्रीगायत्री-कवच के ऋषि ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर हैं; छन्द ऋक्, यजुः, साम और अथर्व हैं; देवता परब्रह्मस्वरूपिणी गायत्री हैं; 'तत्' बीज है, 'भर्गः' शक्ति है, 'धियः' कीलक है; मोक्ष की प्राप्ति हेतु जप में इसका विनियोग है।

ॐ तत्सवितुर्ब्रह्मात्मने हृदयाय नमः। ॐ वरेण्यं विष्ण्वात्मने शिरसे स्वाहा। ॐ भर्गोदेवस्य रुद्रात्मने शिखायै वषट्। ॐ धीमहि ईश्वरात्मने कवचाय हुम्। ॐ धियो यो नः सदाशिवात्मने नेत्रत्रयाय वौषट्। ॐ प्रचोदयात् परब्रह्मतत्त्वात्मने अस्त्राय फट्॥

Om Tat Savitur Brahmatmane Hridayaya Namah Om Varenyam Vishnvatmane Shirase Svaha Om Bhargo Devasya Rudratmane Shikhayai Vashat Om Dhimahi Ishvaratmane Kavachaya Hum Om Dhiyo Yo Nah Sadashivatmane Netratrayaya Vaushat Om Prachodayat Parabrahma Tattvatmane Astraya Phat

ॐ 'तत्सवितुः' ब्रह्मस्वरूप — हृदय को नमः। 'वरेण्यं' विष्णुस्वरूप — शिर को स्वाहा। 'भर्गोदेवस्य' रुद्रस्वरूप — शिखा को वषट्। 'धीमहि' ईश्वरस्वरूप — कवच को हुम्। 'धियो यो नः' सदाशिवस्वरूप — नेत्रत्रय को वौषट्। 'प्रचोदयात्' परब्रह्मतत्त्वस्वरूप — अस्त्र को फट्।

ध्यानम् — मुक्ताविद्रुमहेमनीलधवलच्छायैर्मुखैस्त्रीक्षणैः युक्तामिन्दुनिबद्धरत्नमकुटां तत्त्वार्थवर्णात्मिकाम्। गायत्रीं वरदाभयाङ्कुशकशाः शुभ्रं कपालं गदां शङ्खं चक्रमथारविन्दयुगलं हस्तैर्वहन्तीं भजे॥

Dhyanam — Mukta Vidruma Hema Nila Dhavala Chhayair Mukhais Trikshanaih Yuktam Indu Nibaddha Ratna Makutam Tattvartha Varnatmikam Gayatrim Varada Abhaya Ankusha Kashah Shubhram Kapalam Gadam Shankham Chakram Atha Aravinda Yugalam Hastair Vahantim Bhaje

ध्यान — मैं उन गायत्री का भजन करता हूँ जिनके मुख मोती, मूँगा, स्वर्ण, नील और श्वेत वर्ण के तथा त्रिनेत्रयुक्त हैं; जो चन्द्रबद्ध रत्नमुकुट धारण करती हैं; जो तत्त्वार्थ-वर्णस्वरूपा हैं; और जो अपने हाथों में वरद-अभय मुद्रा, अंकुश, कशा (कोड़ा), उज्ज्वल कपाल, गदा, शंख, चक्र और कमल-युगल धारण करती हैं।

नारायण उवाच — गायत्री पूर्वतः पातु सावित्री पातु दक्षिणे। ब्रह्मसन्ध्या तु मे पश्चादुत्तरस्यां सरस्वती॥

Narayana Uvacha — Gayatri Purvatah Patu Savitri Patu Dakshine Brahmasandhya Tu Me Pashchad Uttarasyam Saraswati

नारायण बोले— गायत्री पूर्व में मेरी रक्षा करें, सावित्री दक्षिण में रक्षा करें; ब्रह्मसन्ध्या पश्चिम में और सरस्वती उत्तर में मेरी रक्षा करें।

पार्वती मे दिशं रक्षेद्वारुणीं वायुगोचराम्। ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद्वैष्णवी सदा॥

Parvati Me Disham Rakshed Varunim Vayugocharam Urdhvam Brahmani Me Rakshed Adhastad Vaishnavi Sada

पार्वती मेरी (प्रत्येक) दिशा की रक्षा करें, वारुणी वायुगोचर (वायव्य) की; ऊपर ब्रह्माणी सदा मेरी रक्षा करें और नीचे वैष्णवी शक्ति।

एवं दश दिशो रक्षेत्सर्वदा भुवनेश्वरी। रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु॥

Evam Dasha Disho Rakshet Sarvada Bhuvaneshvari Rakshahinam Tu Yat Sthanam Varjitam Kavachena Tu

इस प्रकार भुवनेश्वरी सदा दसों दिशाओं की रक्षा करें। और जो स्थान इस कवच से छूट गया, असुरक्षित रह गया—

तत्सर्वं रक्ष मे देवि गायत्री वेदमातृका। इदं तु कवचं दिव्यं सर्वपापविनाशनम्॥

Tat Sarvam Raksha Me Devi Gayatri Veda Matrika Idam Tu Kavacham Divyam Sarva Papa Vinashanam

हे देवी गायत्री, वेदमातृका, उस सबकी रक्षा करें। यह दिव्य कवच समस्त पापों का नाशक है।

यो धारयेद्भक्तियुक्तो विद्यावान् स महायशाः। त्रिकालं यः पठेन्नित्यं श्रद्धया च समन्वितः॥

Yo Dharayed Bhakti Yukto Vidyavan Sa Mahayashah Trikalam Yah Pathen Nityam Shraddhaya Cha Samanvitah

जो भक्तियुक्त होकर इसे धारण करता है, वह विद्यावान् और महायशस्वी होता है। जो श्रद्धायुक्त होकर नित्य त्रिकाल में इसका पाठ करता है—

सर्वान्कामानवाप्नोति गायत्र्याः प्रसादतः। मोक्षं च लभते मर्त्यो वेदमातुः प्रसादतः॥

Sarvan Kamanavapnoti Gayatryah Prasadatah Moksham Cha Labhate Martyo Veda Matuh Prasadatah

वह गायत्री की कृपा से समस्त कामनाओं को प्राप्त करता है; और वेदमाता की कृपा से मनुष्य मोक्ष को भी प्राप्त करता है।