हरि वायु स्तुति PDF
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पान्त्वस्मान् पुरुहूत-वैरि-बलवन्-मातङ्ग-माद्यद्-घटा- कुम्भोच्चाद्रि-विपाटन-अधिक-पटु-प्रत्येक-वज्रायिताः। श्रीमत्-कण्ठीरव-अस्य-प्रतत-सुनख-रा-दार-रित-अरि-श्रियो भक्त-उत्कम्प-विरोधि-दानव-वने-वह्नि-व्रजा-कृष्ट-कः॥
Pāntvasmān puruhūta-vairi-balavan-mātaṅga-mādyad-ghaṭā- kumbhoccādri-vipāṭana-adhika-paṭu-pratyeka-vajrāyitāḥ। Śrīmat-kaṇṭhīrava-asya-pratata-sunakha-rā-dāra-rita-ari-śriyo bhakta-utkampa-virodhi-dānava-vane-vahni-vrajā-kṛṣṭa-kaḥ॥
वे हमारी रक्षा करें — श्रीमान् नृसिंह भगवान के वे सुन्दर नख — जिनमें से प्रत्येक वज्र के समान होकर, इन्द्र के शत्रु दैत्यों के बलवान मदमत्त हाथियों के पर्वत-समान ऊँचे कुम्भस्थलों को विदीर्ण करने में अत्यन्त समर्थ थे; जिन फैले हुए नखों की शोभा ने शत्रु की श्री (सम्पदा) को छीन लिया, और जो भक्तों को कँपाने वाले दानवों के वन में अग्नि-समूह के समान भस्म करने वाले बने।
जय जय जगद्-एक-नाथ नित्य त्रिजगति यः परमेश्वर-एक-सुख्यः। हरि-गुरुर्-इति वायुर्-एक-वन्द्यो वर-गुण-पूर्ण-गुणैक-धाम धन्यः॥
Jaya jaya jagad-eka-nātha nitya trijagati yaḥ parameśvara-eka-sukhyaḥ। Hari-gurur-iti vāyur-eka-vandyo vara-guṇa-pūrṇa-guṇaika-dhāma dhanyaḥ॥
जय हो, जय हो, हे जगत् के एकमात्र नित्य नाथ! तीनों लोकों में वायु (मुख्यप्राण) ही परमेश्वर के एकमात्र प्रिय हैं, हरि की ओर ले जाने वाले गुरु हैं, एकमात्र वन्दनीय हैं, और श्रेष्ठ गुणों से पूर्ण — गुणों के एकमात्र धाम — धन्य हैं।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
Oṁ namo bhagavate vāsudevāya॥
ॐ वासुदेव को नमस्कार है।