किमेकं दैवतं लोके PDF
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युधिष्ठिर उवाच — किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम् । स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम् ॥ को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः । किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात् ॥
Yudhishthira uvacha — Kimekam daivatam loke kim vapyekam parayanam Stuvantah kam kamarchantah prapnuyurmanavah shubham Ko dharmah sarvadharmanam bhavatah paramo matah Kim japanmuchyate janturjanmasamsarabandhanat
युधिष्ठिर ने पूछा — इस लोक में एक देव कौन है? एकमात्र परम आश्रय क्या है? किसकी स्तुति और अर्चना करके मनुष्य कल्याण प्राप्त करते हैं? समस्त धर्मों में आपके मत से श्रेष्ठतम धर्म कौन-सा है? और किसका जप करने से प्राणी जन्म-संसार के बन्धन से मुक्त होता है?
भीष्म उवाच — जगत्प्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम् । स्तुवन् नामसहस्रेण पुरुषः सततोत्थितः ॥ एष मे सर्वधर्माणां धर्मोऽधिकतमो मतः । यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्नरः सदा ॥
Bhishma uvacha — Jagatprabhum devadevamanantam purushottamam Stuvan namasahasrena purushah satatotthitah Esha me sarvadharmanam dharmodhikatamo matah Yadbhaktya pundarikaksham stavairarchennarah sada
भीष्म ने उत्तर दिया — जो सदा उद्यत रहकर जगत्प्रभु, देवों के देव, अनन्त पुरुषोत्तम की सहस्रनाम से स्तुति करता है — मेरे मत में यही समस्त धर्मों में श्रेष्ठतम धर्म है कि मनुष्य भक्तिपूर्वक सदा कमलनयन (विष्णु) की स्तुतियों से अर्चना करे।