कृष्णकर्णामृतम् (चयनिका) PDF
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चिन्तामणिर्जयति सोमगिरिर्गुरुर्मे शिक्षागुरुश्च भगवान् शिखिपिञ्छमौलिः । यत्पादकल्पतरुपल्लवशेखरेषु लीलास्वयंवररसं लभते जयश्रीः ॥ १॥
cintāmaṇir jayati somagirir gurur me śikṣā-guruś ca bhagavān śikhi-piñcha-mauliḥ | yat-pāda-kalpataru-pallava-śekhareṣu līlā-svayaṁvara-rasaṁ labhate jaya-śrīḥ || 1||
मेरे गुरु सोमगिरि की जय हो, जो चिन्तामणि के समान हैं, और मेरे शिक्षागुरु स्वयं भगवान् की जय हो, जिनके मुकुट पर मयूरपंख है — जिनके कल्पवृक्ष-सदृश चरणकमलों के नवीन पल्लवों पर जयश्री (लक्ष्मी/राधा) लीलापूर्ण स्वयंवर के रस को प्राप्त करती हैं।
अस्ति स्वस्तरुणीकराग्रविगलत्कल्पप्रसूनापित- स्वच्छन्दोच्चलमन्दमारुतचलत्प्रालम्बलोलालकम् । आलोलाधरबिम्बफाण्टमधुरं वक्त्रं स्मरामि प्रभोः ॥ २॥
asti svastaruṇī-karāgra-vigalat-kalpa-prasūnārpita- svacchandoccala-manda-māruta-calat-prālamba-lolālakam | āloolādhara-bimba-phāṇṭa-madhuraṁ vaktraṁ smarāmi prabhoḥ || 2||
मैं प्रभु के उस मुख का स्मरण करता हूँ — जो सुन्दर तरुणियों के करकमलों से अर्पित कल्पवृक्ष के पुष्पों से सज्जित है, जिसकी लटें मन्द पवन से स्वच्छन्द रूप से झूल रही हैं, और जो बिम्बफल-सदृश अधरों के मधुर रस से युक्त है।
चातुर्यैकनिधानसीमचपलापाङ्गच्छटामन्थरं लावण्यामृतवीचिलोलितदृशं लक्ष्मीकटाक्षाश्रितम् । कालिन्दीपुलिनाङ्गणप्रणयिनं कामावतारांकुरं बालं नीलममी विलोचनचमत्कारं वहन्तश्चिरम् ॥ ३॥
cāturyaika-nidhāna-sīma-capalāpāṅga-cchaṭā-mantharaṁ lāvaṇyāmṛta-vīci-lolita-dṛśaṁ lakṣmī-kaṭākṣāśritam | kālindī-pulināṅgaṇa-praṇayinaṁ kāmāvatārāṅkuraṁ bālaṁ nīlam amī vilocana-camatkāraṁ vahantaś ciram || 3||
मेरे ये नेत्र उस श्याम बालक के दर्शन का चमत्कार चिरकाल तक धारण करें — जो समस्त चातुर्य (सौन्दर्य) का एकमात्र निधान है, जिसके चंचल कटाक्षों की छटा से मन्थर है, जिसके नेत्र लावण्य के अमृत-सागर की तरंगों के समान लहराते हैं, जो लक्ष्मी के कटाक्ष का आश्रय है, जो कालिन्दी (यमुना) के पुलिन-प्रांगण का प्रेमी है, और जो स्वयं कामदेव के अवतार का अंकुर है।
मधुरं मधुरं वपुरस्य विभोर् मधुरं मधुरं वदनं मधुरम् । मधुगन्धि मृदुस्मितमेतदहो मधुरं मधुरं मधुरं मधुरम् ॥ ४॥
madhuraṁ madhuraṁ vapur asya vibhor madhuraṁ madhuraṁ vadanaṁ madhuram | madhu-gandhi mṛdu-smitam etad aho madhuraṁ madhuraṁ madhuraṁ madhuram || 4||
इस प्रभु का शरीर मधुर-मधुर है, मुख मधुर-मधुर है, और अहो! मधु की गन्ध से युक्त यह उनकी मृदु मुस्कान मधुर-मधुर-मधुर-मधुर है!