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कुन्ती स्तुति PDF

कुन्ती स्तुति की पूरी लिरिक्स — संस्कृत, रोमन व अर्थ सहित। एक क्लिक में PDF सेव करें या प्रिंट करें।

नमस्ये पुरुषं त्वाद्यमीश्वरं प्रकृतेः परम् । अलक्ष्यं सर्वभूतानामन्तर्बहिरवस्थितम् ॥

namasye puruṣaṃ tvādyam īśvaraṃ prakṛteḥ param | alakṣyaṃ sarva-bhūtānām antar bahir avasthitam ||

मैं आपको नमस्कार करती हूँ — आप आदिपुरुष हैं, परमेश्वर हैं, प्रकृति से परे हैं, समस्त प्राणियों के भीतर और बाहर स्थित होते हुए भी सबके लिए अदृश्य रहते हैं।

मायाजवनिकाच्छन्नमज्ञाधोक्षजमव्ययम् । न लक्ष्यसे मूढदृशा नटो नाट्यधरो यथा ॥

māyā-javanikācchannam ajñādhokṣajam avyayam | na lakṣyase mūḍha-dṛśā naṭo nāṭyadharo yathā ||

हे अव्यय अधोक्षज! माया के पर्दे से ढके होने के कारण मूढ़ दृष्टि वाले आपको नहीं देख पाते, जैसे रंगमंच पर वेश धारण किए नट को दर्शक पहचान नहीं पाते।

तथा परमहंसानां मुनीनाममलात्मनाम् । भक्तियोगविधानार्थं कथं पश्येम हि स्त्रियः ॥

tathā paramahaṃsānāṃ munīnām amalātmanām | bhakti-yoga-vidhānārthaṃ kathaṃ paśyema hi striyaḥ ||

जब निर्मल हृदय वाले परमहंस मुनि भी भक्तियोग के द्वारा ही आपके दर्शन कर पाते हैं, तब हम स्त्रियाँ आपको कैसे देख सकती हैं?

कृष्णाय वासुदेवाय देवकीनन्दनाय च । नन्दगोपकुमाराय गोविन्दाय नमो नमः ॥

kṛṣṇāya vāsudevāya devakī-nandanāya ca | nanda-gopa-kumārāya govindāya namo namaḥ ||

इसलिए मैं वसुदेवपुत्र कृष्ण को, देवकीनन्दन को, नन्द गोप के बालक को, गोविन्द को बारम्बार नमस्कार करती हूँ।

नमः पङ्कजनाभाय नमः पङ्कजमालिने । नमः पङ्कजनेत्राय नमस्ते पङ्कजाङ्घ्रये ॥

namaḥ paṅkaja-nābhāya namaḥ paṅkaja-māline | namaḥ paṅkaja-netrāya namas te paṅkajāṅghraye ||

कमलनाभ को नमस्कार, कमल की माला धारण करने वाले को नमस्कार, कमलनयन को नमस्कार, तथा कमल-चिह्नित चरणों वाले आपको नमस्कार है।

यथा हृषीकेश खलेन देवकी कंसेन रुद्धातिचिरं शुचार्पिता । विमोचिताहं च सहात्मजा विभो त्वयैव नाथेन मुहुर्विपद्गणात् ॥

yathā hṛṣīkeśa khalena devakī kaṃsena ruddhāti-ciraṃ śucārpitā | vimocitāhaṃ ca sahātmajā vibho tvayaiva nāthena muhur vipad-gaṇāt ||

हे हृषीकेश! जैसे दुष्ट कंस द्वारा बहुत समय तक बन्दी और दुःखी की गई देवकी को आपने मुक्त किया, वैसे ही, हे प्रभो! आपने मुझे और मेरे पुत्रों को बार-बार अनेक विपत्तियों से बचाया है।

विपदः सन्तु ताः शश्वत्तत्र तत्र जगद्गुरो । भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम् ॥

vipadaḥ santu tāḥ śaśvat tatra tatra jagad-guro | bhavato darśanaṃ yat syād apunar-bhava-darśanam ||

हे जगद्गुरो! वे विपत्तियाँ बार-बार आती रहें, जिससे हमें आपके दर्शन होते रहें — क्योंकि आपके दर्शन का अर्थ है पुनर्जन्म से मुक्ति।

जन्मैश्वर्यश्रुतश्रीभिरेधमानमदः पुमान् । नैवार्हत्यभिधातुं वै त्वामकिञ्चनगोचरम् ॥

janmaiśvarya-śruta-śrībhir edhamāna-madaḥ pumān | naivārhaty abhidhātuṃ vai tvām akiñcana-gocaram ||

जन्म, ऐश्वर्य, विद्या और सौन्दर्य के मद में बढ़ता हुआ मनुष्य आपका नाम सच्चे हृदय से नहीं ले सकता, क्योंकि आप तो अकिंचन (निर्धन-निरभिमान) भक्तों को ही प्राप्त होते हैं।

नमोऽकिञ्चनवित्ताय निवृत्तगुणवृत्तये । आत्मारामाय शान्ताय कैवल्यपतये नमः ॥

namo 'kiñcana-vittāya nivṛtta-guṇa-vṛttaye | ātmārāmāya śāntāya kaivalya-pataye namaḥ ||

हे दीन-निर्धनों के धन! आप तीनों गुणों की वृत्ति से रहित, आत्माराम, शान्त, कैवल्य के स्वामी हैं — आपको बार-बार नमस्कार है।