लक्ष्मीनृसिंह पञ्चरत्नम् — Complete Lyrics
लक्ष्मीनृसिंह पञ्चरत्नम्
Sanskrit text with English transliteration and translation
Verse 1
त्वत्प्रभुजीवप्रियमिच्छसि चेन्
नरहरिपूजां कुरु सततं
प्रतिबिम्बालङ्कृतिधृतिकुशलो
बिम्बालङ्कृतिमातनुते ।
चेतोभृङ्ग भ्रमसि वृथा
भवमरुभूमौ विरसायां
भज भज लक्ष्मीनरसिंहा-
नघपदसरसिजमकरन्दम् ॥ १ ॥
Tvatprabhujivapriyamicchasi cen
naraharipujam kuru satatam
Pratibimbalankritidhritikushalo
bimbalankritimatanute |
Cetobhringa bhramasi vritha
bhavamarubhumau virasayam
Bhaja bhaja lakshminarasimha-
naghapadasarasijamakarandam || 1 ||
यदि तू अपने स्वामी (प्रभु) का प्रेम पाना चाहता है, तो निरन्तर नरहरि (नृसिंह) की पूजा कर। जो केवल प्रतिबिम्ब को सजाने में निपुण है, वह वास्तव में मूल बिम्ब को ही अलंकृत करता है। हे मनरूपी भ्रमर! तू इस नीरस संसाररूपी मरुभूमि में व्यर्थ क्यों भटकता है? भज, भज — लक्ष्मीनृसिंह के निष्पाप चरणकमलों के मकरन्द (मधु) का सेवन कर!
Verse 2
शुक्तौ रजतप्रतिभा जाता
कटकाद्यर्थसमर्था चेत्
दुःखमयी ते संसृतिरेषा
निर्वृतिदाने निपुणा भवति ।
चेतोभृङ्ग भ्रमसि वृथा
भवमरुभूमौ विरसायां
भज भज लक्ष्मीनरसिंहा-
नघपदसरसिजमकरन्दम् ॥ २ ॥
Shuktau rajatapratibha jata
katakadyarthasamartha cet
Duhkhamayi te samsritiresha
nirvritidane nipuna bhavati |
Cetobhringa bhramasi vritha
bhavamarubhumau virasayam
Bhaja bhaja lakshminarasimha-
naghapadasarasijamakarandam || 2 ||
जैसे सीप में चाँदी की झलक दिखती है — पर क्या वह कभी कंगन आदि बन सकती है? — वैसे ही तेरा यह दुःखमय संसार कभी सच्चा सुख नहीं दे सकता। हे मनरूपी भ्रमर! तू नीरस संसार-मरुभूमि में व्यर्थ क्यों भटकता है? भज, भज — लक्ष्मीनृसिंह के निष्पाप चरणकमलों का मकरन्द!
Verse 3
आकृतिसाम्याच्छाल्मलिकुसुमे
स्थलनलिनत्वभ्रममकरोः
गन्धरसाविह किमु विद्यते
विकच सरोरुहपरिमलमिलिते ।
चेतोभृङ्ग भ्रमसि वृथा
भवमरुभूमौ विरसायां
भज भज लक्ष्मीनरसिंहा-
नघपदसरसिजमकरन्दम् ॥ ३ ॥
Akritisamyacchalmalikusume
sthalanalinatvabhramamakaroh
Gandharasaviha kimu vidyate
vikacha saroruhaparimalamilite |
Cetobhringa bhramasi vritha
bhavamarubhumau virasayam
Bhaja bhaja lakshminarasimha-
naghapadasarasijamakarandam || 3 ||
केवल आकृति की समानता से तूने (गन्धहीन) सेमल के फूल को सुगन्धित स्थलकमल समझ लिया! भला यहाँ वह गन्ध और रस कहाँ, जो खिले हुए सुगन्धित कमल में होता है? हे मनरूपी भ्रमर! तू व्यर्थ क्यों भटकता है? भज, भज — लक्ष्मीनृसिंह के निष्पाप चरणकमलों का मकरन्द!
Verse 4
स्रक्चन्दनवनितादीन्
विषयानसुखाय भुङ्क्ष्व किमु मूढ
सर्वम् इदं रजनीकर-
किरणवियद्वारिविभ्रमं चलितम् ।
चेतोभृङ्ग भ्रमसि वृथा
भवमरुभूमौ विरसायां
भज भज लक्ष्मीनरसिंहा-
नघपदसरसिजमकरन्दम् ॥ ४ ॥
Srakchandanavanitadin
vishayanasukhaya bhunkshva kimu mudha
Sarvam idam rajanikara-
kiranaviyadvarivibhramam chalitam |
Cetobhringa bhramasi vritha
bhavamarubhumau virasayam
Bhaja bhaja lakshminarasimha-
naghapadasarasijamakarandam || 4 ||
हे मूढ़! माला, चन्दन, स्त्री आदि विषयों को सुख के लिए तू क्यों भोगता है? यह सब चन्द्रकिरणों से आकाश में जल के भ्रम (मृगतृष्णा) के समान चंचल एवं मिथ्या है। हे मनरूपी भ्रमर! तू व्यर्थ क्यों भटकता है? भज, भज — लक्ष्मीनृसिंह के निष्पाप चरणकमलों का मकरन्द!
Verse 5
तव हितमेकं वचनं वक्ष्ये
शृणु सुखकामो यदि सततं
स्वप्ने दृष्टं सकलं हि मृषा
जाग्रति च स्मर तदिति मतिमान् ।
चेतोभृङ्ग भ्रमसि वृथा
भवमरुभूमौ विरसायां
भज भज लक्ष्मीनरसिंहा-
नघपदसरसिजमकरन्दम् ॥ ५ ॥
Tava hitamekam vachanam vakshye
shrinu sukhakamo yadi satatam
Svapne drishtam sakalam hi mrisha
jagrati cha smara taditi matiman |
Cetobhringa bhramasi vritha
bhavamarubhumau virasayam
Bhaja bhaja lakshminarasimha-
naghapadasarasijamakarandam || 5 ||
यदि तू सदा सुख चाहता है तो सुन, मैं तेरे हित का एक वचन कहता हूँ — स्वप्न में देखा हुआ सब कुछ मिथ्या होता है; हे बुद्धिमान्! इसी सत्य का जाग्रत अवस्था में भी स्मरण कर। हे मनरूपी भ्रमर! तू व्यर्थ क्यों भटकता है? भज, भज — लक्ष्मीनृसिंह के निष्पाप चरणकमलों का मकरन्द!
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