महालक्ष्मी कवचम् PDF
महालक्ष्मी कवचम् की पूरी लिरिक्स — संस्कृत, रोमन व अर्थ सहित। एक क्लिक में PDF सेव करें या प्रिंट करें।
इन्द्र उवाच — समस्तकवचं ब्रूहि समस्तार्थप्रसाधनम्। रक्षाकरं तु जगतां येन रक्षामि देवताः॥
Indra Uvacha — Samasta Kavacham Bruhi Samastartha Prasadhanam Rakshakaram Tu Jagatam Yena Rakshami Devatah
इन्द्र बोले— मुझे वह सम्पूर्ण कवच बताइए जो समस्त अर्थों को सिद्ध करने वाला और जगत् का रक्षक है, जिससे मैं देवताओं की रक्षा कर सकूँ।
ब्रह्मोवाच — शृणु वक्ष्यामि विप्रेन्द्र कवचं परमाद्भुतम्। महालक्ष्म्यास्तु यद्दिव्यं सर्वसम्पत्प्रदायकम्॥
Brahma Uvacha — Shrinu Vakshyami Viprendra Kavacham Paramadbhutam Mahalakshmyastu Yad Divyam Sarva Sampat Pradayakam
ब्रह्मा बोले— हे विप्रश्रेष्ठ, सुनो; मैं महालक्ष्मी का परम अद्भुत कवच कहता हूँ, जो दिव्य और समस्त सम्पत्ति प्रदान करने वाला है।
ॐ अस्य श्रीमहालक्ष्मीकवचमन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः। गायत्री छन्दः। महालक्ष्मीर्देवता। श्रीमहालक्ष्मीप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः॥
Om Asya Shri Mahalakshmi Kavacha Mantrasya Brahma Rishih Gayatri Chhandah Mahalakshmir Devata Shri Mahalakshmi Prityarthe Jape Viniyogah
ॐ। इस श्रीमहालक्ष्मी-कवच-मन्त्र के ऋषि ब्रह्मा हैं, छन्द गायत्री है, देवता महालक्ष्मी हैं; श्रीमहालक्ष्मी की प्रसन्नता हेतु जप में इसका विनियोग है।
शिरो मे विष्णुपत्नी च ललाटममृतोद्भवा। कर्णौ च श्रीकरी पातु नेत्रे श्रीनिवासप्रिया॥
Shiro Me Vishnupatni Cha Lalatam Amritodbhava Karnau Cha Shrikari Patu Netre Shrinivasapriya
विष्णुपत्नी मेरे सिर की रक्षा करें, अमृतोद्भवा ललाट की; श्रीकरी कानों की और श्रीनिवासप्रिया नेत्रों की रक्षा करें।
घ्राणं पातु वराहाङ्की जिह्वां पातु हरिप्रिया। मुखं पातु महालक्ष्मीः कण्ठं वैकुण्ठवासिनी॥
Ghranam Patu Varahanki Jihvam Patu Haripriya Mukham Patu Mahalakshmih Kantham Vaikunthavasini
वराहाङ्की नासिका की और हरिप्रिया जिह्वा की रक्षा करें; महालक्ष्मी मुख की और वैकुण्ठवासिनी कण्ठ की रक्षा करें।
स्कन्धौ खड्गधरा पातु भुजौ भार्गवनन्दिनी। हस्तौ च चक्रिणी पातु वक्षः पातु हरिप्रिया॥
Skandhau Khadgadhara Patu Bhujau Bhargavanandini Hastau Cha Chakrini Patu Vakshah Patu Haripriya
खड्गधरा कन्धों की और भार्गवनन्दिनी भुजाओं की रक्षा करें; चक्रिणी हाथों की और हरिप्रिया वक्षःस्थल की रक्षा करें।
नाभिं च पद्ममालिनी कटिं पातु सुरेश्वरी। ऊरू च पद्मनिलया जानुनी जनकात्मजा॥
Nabhim Cha Padmamalini Katim Patu Sureshvari Uru Cha Padmanilaya Januni Janakatmaja
पद्ममालिनी नाभि की और सुरेश्वरी कटि की रक्षा करें; पद्मनिलया ऊरुओं की और जनकात्मजा घुटनों की रक्षा करें।
जङ्घे पातु जगन्माता पादौ पातु करालिका। सर्वाङ्गं पातु मे लक्ष्मीः सर्वत्र विजयप्रदा॥
Janghe Patu Jaganmata Padau Patu Karalika Sarvangam Patu Me Lakshmih Sarvatra Vijayaprada
जगन्माता जंघाओं की और करालिका चरणों की रक्षा करें; सर्वत्र विजय देने वाली लक्ष्मी मेरे समस्त अंगों की रक्षा करें।
इति ते कथितं विप्र सर्वसम्पत्करं परम्। त्रिकालं पठते यस्तु महालक्ष्म्याः प्रसादतः॥
Iti Te Kathitam Vipra Sarva Sampatkaram Param Trikalam Pathate Yastu Mahalakshmyah Prasadatah
इस प्रकार हे विप्र, मैंने तुम्हें यह समस्त सम्पत्ति देने वाला परम कवच कहा। जो इसे त्रिकाल (तीनों समय) पढ़ता है, महालक्ष्मी की कृपा से—
धनधान्यसमृद्धिः स्यात्पुत्रपौत्रादिवर्धिनी। भूतप्रेतपिशाचाश्च न बाधन्ते कदाचन॥
Dhana Dhanya Samriddhih Syat Putra Pautradi Vardhini Bhuta Preta Pishachashcha Na Badhante Kadachana
उसे धन-धान्य की समृद्धि प्राप्त होती है, पुत्र-पौत्र आदि की वृद्धि होती है; और भूत, प्रेत, पिशाच उसे कभी बाधा नहीं पहुँचाते।
इदं रहस्यं परमं न देयं यस्य कस्यचित्। धारणाद्वाचनादस्य सर्वान्कामानवाप्नुयात्॥
Idam Rahasyam Paramam Na Deyam Yasya Kasyachit Dharanad Vachanad Asya Sarvan Kamanavapnuyat
यह परम रहस्य है, किसी भी अनधिकारी को नहीं देना चाहिए। इसके धारण या पाठ से मनुष्य अपनी समस्त कामनाओं को प्राप्त कर लेता है।