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मन्दोदरी स्तुति PDF

मन्दोदरी स्तुति की पूरी लिरिक्स — संस्कृत, रोमन व अर्थ सहित। एक क्लिक में PDF सेव करें या प्रिंट करें।

व्यक्तमेष महायोगी परमात्मा सनातनः। अनादिमध्यनिधनो महतः परमो महान्॥

vyaktam-eṣa mahā-yogī paramātmā sanātanaḥ | anādi-madhya-nidhano mahataḥ paramo mahān ||

अब मुझे स्पष्ट हो गया है — यह राम महायोगी हैं, सनातन परमात्मा हैं, जिनका न आदि है, न मध्य, न अन्त; जो महान् से भी परे परम महान् हैं।

तमसः परमो धाता शङ्खचक्रगदाधरः। श्रीवत्सवक्षा नित्यश्रीरजय्यः शाश्वतो ध्रुवः॥

tamasaḥ paramo dhātā śaṅkha-cakra-gadā-dharaḥ | śrīvatsa-vakṣā nitya-śrīr-ajayyaḥ śāśvato dhruvaḥ ||

वे अन्धकार (अज्ञान) से परे परम धाता हैं, शङ्ख-चक्र-गदा धारण करने वाले हैं, जिनके वक्षःस्थल पर श्रीवत्स है, जो नित्य श्री से युक्त, अजेय, शाश्वत और ध्रुव हैं।

मानुषं रूपमास्थाय विष्णुः सत्यपराक्रमः। सर्वैः परिवृतो देवैर्वानरत्वमुपागतैः॥

mānuṣaṃ rūpam-āsthāya viṣṇuḥ satya-parākramaḥ | sarvaiḥ parivṛto devair-vānaratvam-upāgataiḥ ||

मनुष्य रूप धारण करके वे सत्यपराक्रमी विष्णु ही हैं, जिन्हें सहायता हेतु वानर रूप धारण किए समस्त देवताओं ने घेर रखा था।

सर्वलोकेश्वरः श्रीमान् लोकानां हितकाम्यया। सराक्षसपरीवारं हतवांस्त्वां महाद्युतिः॥

sarva-lokeśvaraḥ śrīmān lokānāṃ hita-kāmyayā | sa-rākṣasa-parīvāraṃ hatavāṃs-tvāṃ mahā-dyutiḥ ||

वे श्रीमान् सर्वलोकेश्वर महातेजस्वी, लोकों के कल्याण की कामना से, तुम्हें तुम्हारे समस्त राक्षस-परिवार सहित मार चुके हैं।

इन्द्रियाणि पुरा जित्वा जितं त्रिभुवनं त्वया। स्मरद्भिरिव तद्वैरमिन्द्रियैरेव निर्जितः॥

indriyāṇi purā jitvā jitaṃ tri-bhuvanaṃ tvayā | smaradbhir-iva tad-vairam-indriyair-eva nirjitaḥ ||

पहले इन्द्रियों को जीतकर तुमने तीनों लोकों को जीत लिया था; अब मानो उसी पुराने वैर का स्मरण करती हुई उन्हीं इन्द्रियों के द्वारा तुम परास्त कर दिए गए।