मुचुकुन्द स्तुति — Complete Lyrics
मुचुकुन्द स्तुति
Sanskrit text with English transliteration and translation
Verse 1
लब्ध्वा जनो दुर्लभमत्र मानुषं
कथञ्चिदव्यङ्गमयत्नतोऽनघ ।
पादारविन्दं न भजत्यसन्मति-
र्गृहान्धकूपे पतितो यथा पशुः ॥ ४६ ॥
labdhvā jano durlabham atra mānuṣaṃ
kathañcid avyaṅgam ayatnato 'nagha |
pādāravindaṃ na bhajaty asan-matir
gṛhāndha-kūpe patito yathā paśuḥ || 46 ||
हे निष्पाप प्रभो! इस दुर्लभ एवं पूर्ण मनुष्य-शरीर को अनायास पाकर भी जो मूढ़बुद्धि मनुष्य आपके चरणकमलों का भजन नहीं करता, वह गृहस्थी के अन्धे कुएँ में गिरे पशु के समान है।
Verse 2
ममैष कालोऽजित निष्फलो गतो
राज्यश्रियोन्नद्धमदस्य भूपतेः ।
मर्त्यात्मबुद्धेः सुतदारकोशभूष्व्
आसज्जमानस्य दुरन्तचिन्तया ॥ ४७ ॥
mamaiṣa kālo 'jita niṣphalo gato
rājya-śriyonnaddha-madasya bhū-pateḥ |
martyātma-buddheḥ suta-dāra-kośa-bhūṣv
āsajjamānasya duranta-cintayā || 47 ||
हे अजित! मेरा यह समय व्यर्थ बीत गया; क्योंकि राज्य-लक्ष्मी के मद से उन्मत्त, इस मर्त्य देह को ही आत्मा मानने वाला मैं, पुत्र, स्त्री, कोश और भूमि में आसक्त रहकर अनन्त चिन्ता से ग्रस्त रहा।
Verse 3
कलेवरेऽस्मिन्घटकुड्यसन्निभे
निरूढमानो नरदेव इत्यहम् ।
वृतो रथेभाश्वपदात्यनीकपै-
र्गां पर्यटंस्त्वागणयन्सुदुर्मदः ॥ ४८ ॥
kalevare 'smin ghaṭa-kuḍya-sannibhe
nirūḍha-māno nara-deva ity aham |
vṛto rathebhāśva-padāty-anīkapair
gāṃ paryaṭaṃs tvāgaṇayan su-durmadaḥ || 48 ||
घड़े या मिट्टी की दीवार के समान इस शरीर में 'मैं नरदेव (राजा) हूँ' — ऐसा मिथ्या अभिमान करके, रथ, हाथी, घोड़े, पैदल सेना और सेनापतियों से घिरा हुआ अत्यन्त उन्मत्त मैं आपकी अवहेलना करते हुए पृथ्वी पर विचरता रहा।
Verse 4
प्रमत्तमुच्चैरितिकृत्यचिन्तया
प्रवृद्धलोभं विषयेषु लालसम् ।
त्वमप्रमत्तः सहसाभिपद्यसे
क्षुल्लेलिहानोऽहिरिवाखुमन्तकः ॥ ४९ ॥
pramattam uccair iti-kṛtya-cintayā
pravṛddha-lobhaṃ viṣayeṣu lālasam |
tvam apramattaḥ sahasābhipadyase
kṣul-lelihāno 'hir ivākhum antakaḥ || 49 ||
जब मनुष्य अपने कर्तव्यों की चिन्ता में प्रमत्त, बढ़ते लोभ वाला और विषयों में लालायित रहता है, तब आप अप्रमत्त रहकर सहसा उस पर आ पड़ते हैं — जैसे भूखा, जीभ लपलपाता सर्प चूहे को पकड़ लेता है, वैसे ही काल (मृत्यु) उसे पकड़ लेता है।
Verse 5
पुरा रथैर्हेमपरिष्कृतैश्चरन्
मतंगजैर्वा नरदेवसंज्ञितः ।
स एव कालेन दुरत्ययेन ते
कलेवरो विट्कृमिभस्मसंज्ञितः ॥ ५० ॥
purā rathair hema-pariṣkṛtaiś caran
mataṃ-gajair vā nara-deva-saṃjñitaḥ |
sa eva kālena duratyayena te
kalevaro viṭ-kṛmi-bhasma-saṃjñitaḥ || 50 ||
जो शरीर पहले स्वर्ण-मण्डित रथों और मतवाले हाथियों पर 'राजा' कहलाता हुआ विचरता था, वही आपके दुरत्यय काल से विष्ठा, कृमि अथवा भस्म नामधारी हो जाता है।
Verse 6
निर्जित्य दिक्चक्रमभूतविग्रहो
वरासनस्थः समराजवन्दितः ।
गृहेषु मैथुन्यसुखेषु योषितां
क्रीडामृगः पूरुष ईश नीयते ॥ ५१ ॥
nirjitya dik-cakram abhūta-vigraho
varāsana-sthaḥ sama-rāja-vanditaḥ |
gṛheṣu maithunya-sukheṣu yoṣitāṃ
krīḍā-mṛgaḥ pūruṣa īśa nīyate || 51 ||
समस्त दिशाओं को जीतकर, निष्कण्टक होकर, श्रेष्ठ सिंहासन पर बैठकर समान राजाओं से वन्दित होता हुआ भी, हे ईश! पुरुष घर में स्त्रियों के मैथुन-सुख के लिए पालतू पशु (खिलौने) की भाँति इधर-उधर ले जाया जाता है।
Verse 7
करोति कर्माणि तपःसुनिष्ठितो
निवृत्तभोगस्तदपेक्षयाददत् ।
पुनश्च भूयासमहं स्वराडिति
प्रवृद्धतर्षो न सुखाय कल्पते ॥ ५२ ॥
karoti karmāṇi tapaḥ-suniṣṭhito
nivṛtta-bhogas tad-apekṣayādadat |
punaś ca bhūyāsam ahaṃ sva-rāḍ iti
pravṛddha-tarṣo na sukhāya kalpate || 52 ||
तपस्या में सुनिष्ठित होकर, भोग त्यागकर, भविष्य के फल की अपेक्षा से कर्म करता हुआ, 'मैं पुनः-पुनः स्वराट् (स्वतन्त्र) बनूँ' — इस बढ़ती तृष्णा से वह कभी सुख को प्राप्त नहीं होता।
Verse 8
भवापवर्गो भ्रमतो यदा भवे-
ज्जनस्य तर्ह्यच्युत सत्समागमः ।
सत्सङ्गमो यर्हि तदैव सद्गतौ
परावरेशे त्वयि जायते मतिः ॥ ५३ ॥
bhavāpavargo bhramato yadā bhavej
janasya tarhy acyuta sat-samāgamaḥ |
sat-saṅgamo yarhi tadaiva sad-gatau
parāvareśe tvayi jāyate matiḥ || 53 ||
हे अच्युत! भटकते हुए जीव को जब संसार से मुक्ति का समय आता है, तभी उसे सत्पुरुषों का संग प्राप्त होता है; और जब सत्संग होता है, उसी क्षण सन्तों के गन्तव्य, पर-अवर के स्वामी आप में उसकी मति उत्पन्न होती है।
Verse 9
मन्ये ममानुग्रह ईश ते कृतो
राज्यानुबन्धापगमो यदृच्छया ।
यः प्रार्थ्यते साधुभिरेकचर्यया
वनं विविक्षद्भिरखण्डभूमिपैः ॥ ५४ ॥
manye mamānugraha īśa te kṛto
rājyānubandhāpagamo yadṛcchayā |
yaḥ prārthyate sādhubhir eka-caryayā
vanaṃ vivikṣadbhir akhaṇḍa-bhūmi-paiḥ || 54 ||
हे ईश! मैं मानता हूँ कि आपने मुझ पर अनुग्रह किया है, क्योंकि आपकी ही इच्छा से मेरा राज्य का बन्धन छूट गया — वही मुक्ति, जिसकी प्रार्थना अखण्ड राज्य वाले साधु राजा वन में एकाकी जाने की इच्छा से करते हैं।
Verse 10
न कामयेऽन्यं तव पादसेवना-
दकिञ्चनप्रार्थ्यतमाद्वरं विभो ।
आराध्य कस्त्वां ह्यपवर्गदं हरे
वृणीत आर्यो वरमात्मबन्धनम् ॥ ५५ ॥
na kāmaye 'nyaṃ tava pāda-sevanād
akiñcana-prārthyatamād varaṃ vibho |
ārādhya kas tvāṃ hy apavarga-daṃ hare
vṛṇīta āryo varam ātma-bandhanam || 55 ||
हे विभो! मैं आपके चरणों की सेवा के अतिरिक्त और कोई वर नहीं चाहता — वही वर जो निष्किंचन (निरीह) भक्तों द्वारा सर्वाधिक प्रार्थित है। हे हरे! मुक्तिदाता आपकी आराधना करके कौन आर्य ऐसा वर माँगेगा जो उसे और बाँध दे?
Verse 11
तस्माद्विसृज्याशिष ईश सर्वतो
रजस्तमःसत्त्वगुणानुबन्धनाः ।
निरञ्जनं निर्गुणमद्वयं परं
त्वां ज्ञाप्तिमात्रं पुरुषं व्रजाम्यहम् ॥ ५६ ॥
tasmād visṛjyāśiṣa īśa sarvato
rajas-tamaḥ-sattva-guṇānubandhanāḥ |
nirañjanaṃ nirguṇam advayaṃ paraṃ
tvāṃ jñāpti-mātraṃ puruṣaṃ vrajāmy aham || 56 ||
इसलिए, हे ईश! रज, तम और सत्त्व — इन गुणों से बँधे समस्त आशीर्वादों को त्यागकर, मैं निरंजन, निर्गुण, अद्वितीय, परम, ज्ञानमात्र-स्वरूप आप परमपुरुष की शरण में आता हूँ।
Verse 12
चिरमिह वृजिनार्तस्तप्यमानोऽनुतापै-
रवितृषषडमित्रोऽलब्धशान्तिः कथञ्चित् ।
शरणद समुपेतस्त्वत्पदाब्जं परात्मन्
अभयमृतमशोकं पाहि मापन्नमीश ॥ ५७ ॥
ciram iha vṛjinārtas tapyamāno 'nutāpair
avitṛṣa-ṣaḍ-amitro 'labdha-śāntiḥ kathañcit |
śaraṇa-da samupetas tvat-padābjaṃ parātman
abhayam ṛtam aśokaṃ pāhi māpannam īśa || 57 ||
बहुत काल तक मैं इस लोक में पापजनित दुःखों से पीड़ित, पश्चातापों से सन्तप्त, छह अजेय शत्रुओं (काम-क्रोध आदि) से ग्रस्त रहा और कहीं भी शान्ति न पा सका। हे शरणदाता परमात्मन्! अब मैं आपके चरणकमल में आया हूँ — अभय, सत्य और शोकरहित। हे ईश! शरणागत मेरी रक्षा कीजिए।
Want to understand every word?
Read Word-by-Word Meaning →