मुक्तिमिच्छसि चेत्तात (अष्टावक्र गीता १.११) PDF
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मुक्तिमिच्छसि चेत्तात विषयान्विषवत्त्यज। क्षमार्जवदयातोषसत्यं पीयूषवद्भज॥
muktim icchasi cet tāta viṣayān viṣavat tyaja | kṣamārjava-dayā-toṣa-satyaṃ pīyūṣavad bhaja ||
हे तात! यदि तुम मुक्ति चाहते हो, तो विषयों (इन्द्रिय-भोगों) को विष के समान त्याग दो, और क्षमा, सरलता, दया, संतोष तथा सत्य का अमृत के समान सेवन करो।