नन्दगोपगृहे जाता (देवी की भावी अवतार-भविष्यवाणी) — Complete Lyrics
नन्दगोपगृहे जाता (देवी की भावी अवतार-भविष्यवाणी)
Sanskrit text with English transliteration and translation
Verse 1
देव्युवाच
वैवस्वतेऽन्तरे प्राप्ते अष्टाविंशतिमे युगे ।
शुम्भो निशुम्भश्चैवान्यावुत्पत्स्येते महासुरौ ॥
devyuvāca
vaivasvate'ntare prāpte aṣṭāviṃśatime yuge
śumbho niśumbhaścaivānyāvutpatsyete mahāsurau
देवी बोलीं — 'वैवस्वत मन्वन्तर में अट्ठाईसवें युग के आने पर शुम्भ और निशुम्भ नामक दो अन्य महान् असुर उत्पन्न होंगे। तब नन्द गोप के घर में, यशोदा के गर्भ से उत्पन्न होकर, और विन्ध्याचल पर निवास करती हुई मैं उन दोनों का नाश करूँगी। और फिर अत्यन्त रौद्र रूप से पृथ्वीतल पर अवतीर्ण होकर मैं वैप्रचित्त दानवों का वध करूँगी; और उन उग्र महान् असुरों को खाते समय मेरे दाँत अनार के फूलों के समान लाल हो जाएँगे। तब स्वर्ग में देवता और मर्त्यलोक में मनुष्य मेरी स्तुति करते हुए मुझे सदा रक्तदन्तिका कहकर पुकारेंगे। और फिर जब सौ वर्ष तक पृथ्वी पर अनावृष्टि (जल-रहित सूखा) होगी, तब मुनियों द्वारा स्मरण की जाकर मैं अयोनिजा रूप में पृथ्वी पर प्रकट होऊँगी। तब मैं सौ नेत्रों से मुनियों को देखूँगी; इसीलिए मनुष्य मुझे शताक्षी कहकर कीर्तन करेंगे। तब हे देवगण! मैं अपने ही शरीर से उत्पन्न, प्राणधारण कराने वाली शाक-सब्जियों से वर्षा होने तक समस्त लोक का पालन करूँगी; तब मैं पृथ्वी पर शाकम्भरी नाम से विख्यात होऊँगी, और वहीं दुर्गम नामक महान् असुर का वध करूँगी।'
Verse 2
नन्दगोपगृहे जाता यशोदागर्भसम्भवा ।
ततस्तौ नाशयिष्यामि विन्ध्याचलनिवासिनी ॥
nandagopagṛhe jātā yaśodāgarbhasambhavā
tatastau nāśayiṣyāmi vindhyācalanivāsinī
Verse 3
पुनरप्यतिरौद्रेण रूपेण पृथिवीतले ।
अवतीर्य हनिष्यामि वैप्रचित्तांश्च दानवान् ॥
punarapyatiraudreṇa rūpeṇa pṛthivītale
avatīrya haniṣyāmi vaipracittāṃśca dānavān
Verse 4
भक्षयन्त्याश्च तानुग्रान् वैप्रचित्तान् महासुरान् ।
रक्ता दन्ता भविष्यन्ति दाडिमीकुसुमोपमाः ॥
bhakṣayantyāśca tānugrān vaipracittān mahāsurān
raktā dantā bhaviṣyanti dāḍimīkusumopamāḥ
Verse 5
ततो मां देवताः स्वर्गे मर्त्यलोके च मानवाः ।
स्तुवन्तो व्याहरिष्यन्ति सततं रक्तदन्तिकाम् ॥
tato māṃ devatāḥ svarge martyaloke ca mānavāḥ
stuvanto vyāhariṣyanti satataṃ raktadantikām
Verse 6
भूयश्च शतवार्षिक्यामनावृष्ट्यामनम्भसि ।
मुनिभिः संस्मृता भूमौ सम्भविष्याम्ययोनिजा ॥
bhūyaśca śatavārṣikyāmanāvṛṣṭyāmanambhasi
munibhiḥ saṃsmṛtā bhūmau sambhaviṣyāmyayonijā
Verse 7
ततः शतेन नेत्राणां निरीक्षिष्याम्यहं मुनीन् ।
कीर्तयिष्यन्ति मनुजाः शताक्षीमिति मां ततः ॥
tataḥ śatena netrāṇāṃ nirīkṣiṣyāmyahaṃ munīn
kīrtayiṣyanti manujāḥ śatākṣīmiti māṃ tataḥ
Verse 8
ततोऽहमखिलं लोकमात्मदेहसमुद्भवैः ।
भरिष्यामि सुराः शाकैरावृष्टेः प्राणधारकैः ॥
tato'hamakhilaṃ lokamātmadehasamudbhavaiḥ
bhariṣyāmi surāḥ śākairāvṛṣṭeḥ prāṇadhārakaiḥ
Verse 9
शाकम्भरीति विख्यातिं तदा यास्याम्यहं भुवि ।
तत्रैव च वधिष्यामि दुर्गमाख्यं महासुरम् ॥
śākambharīti vikhyātiṃ tadā yāsyāmyahaṃ bhuvi
tatraiva ca vadhiṣyāmi durgamākhyaṃ mahāsuram
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