नृसिंह नख स्तुतिः PDF
नृसिंह नख स्तुतिः की पूरी लिरिक्स — संस्कृत, रोमन व अर्थ सहित। एक क्लिक में PDF सेव करें या प्रिंट करें।
पान्त्वस्मान् पुरुहूतवैरिबलवन्मातङ्गमाद्यद्घटा- कुम्भोच्चाद्रिविपाटनाधिकपटुप्रत्येकवज्रायिताः । श्रीमत्कण्ठीरवास्यप्रततसुनखरा दारितारातिदूर- प्रध्वस्तध्वान्तशान्तप्रविततमनसा भाविता भूरिभागैः ॥ १ ॥
Pantvasman puruhutavairibalavanmatangamadyadghata- kumbhoccadrivipatanadhikapatupratyekavajrayitah | Shrimatkanthiravasyapratatasunakhara daritaratidura- pradhvastadhvantashantapravitatamanasa bhavita bhuribhagaih || 1 ||
श्री लक्ष्मीकान्त (नृसिंह) के उन दीर्घ, सुन्दर नखों की पंक्ति हमारी रक्षा करे — जिनमें से प्रत्येक नख, इन्द्र के बलवान् शत्रु (हिरण्यकशिपु) रूपी मतवाले गजसमूह के पर्वत-समान ऊँचे गण्डस्थलों (कुम्भों) को चीर डालने में वज्र से भी अधिक तीक्ष्ण एवं समर्थ था। वे नख, जिन्होंने शत्रु को विदीर्ण कर समस्त अन्धकार का नाश किया, शान्त एवं विस्तृत मन से परम भाग्यशाली जनों द्वारा ध्याए जाते हैं।
लक्ष्मीकान्त समन्ततोऽपि कलयन्नैवेशितुस्ते समं पश्याम्युत्तमवस्तु दूरतरतोऽपास्तं रसो योऽष्टमः । यद्रोषोत्करदक्षनेत्रकुटिलप्रान्तोत्थिताग्निस्फुरत्- खद्योतोपमविस्फुलिङ्गभसिता ब्रह्मेशशक्रोत्कराः ॥ २ ॥
Lakshmikanta samantato'pi kalayannaiveshituste samam Pashyamyuttamavastu duratarato'pastam raso yo'shtamah | Yadroshotkaradakshanetrakutilaprantotthitagnisphurat- khadyotopamavisphulingabhasita brahmeshashakrotkarah || 2 ||
हे लक्ष्मीकान्त! चारों ओर खोजने पर भी मैं कहीं आप प्रभु के समान कोई उत्तम वस्तु नहीं देखता — आप ही वह परम 'अष्टम रस' हैं, जो शेष सब से अत्यन्त दूर श्रेष्ठ है। आपके क्रोध से भरे नेत्र के कुटिल कोने से उठी हुई प्रज्वलित अग्नि से ब्रह्मा, शिव और इन्द्र के समूह जुगनू के समान चिनगारियों में भस्म हो गए।